गुरु ग्रंथ साहिब 1002 · Raag Maaroo · Guru Arjan Dev Ji
1हे नानक ! गुरु ने जिसे नाम-मंत्र रूपी औषधि प्रदान की है, वह गर्भ-योनि के संकट से छूट गया है। ५॥ २॥
2हे आदमी ! इस विधि से मुक्ति संभव है,
3द्वैतभाव को त्याग कर और जीवित ही अहम् को मारकर परमात्मा का ध्यान करो॥ रहाउ दूसरा। २॥ ११॥
4मारू महला ५॥
5गुरु ने हृदय-घर में ही परम-सत्य के दर्शन करवा दिए, जिससे ईश्वर को बाहर ढूँढने से छूट गया।
6मैंने परमात्मा का अद्भुत रूप देख लिया है, इसलिए उसे छोड़कर मेरा मन इधर-उधर नहीं जाता। १॥
7मैंने पूर्ण परमेश्वर रूपी माणिक्य को पा लिया है।
8गुरु की कृपा से परमात्मा रूपी माणिक्य की प्राप्ति हो सकी है, जो बड़ा अमूल्य है और जिसे किसी भी कीमत पर पाया नहीं जा सकता। १॥ रहाउ॥
9साधुओं के संग मिलकर अदृश्य, अगोचर, अकथनीय परब्रह्म का स्तुतिगान किया।
10जब दसम द्वार में अनाहत शब्द गूंजने लगा तो रसना में नामामृत टपकने लगा॥ २॥
11मन में अक्षय भण्डार समा गया है, जिससे तृष्णा बुझ गई है और किसी पदार्थ की कोई कमी नहीं।
12गुरु-चरणों की सेवा करने से अशिष्ट मन शिष्ट हो गया है, जिससे नामामृत का रस प्राप्त हो गया है॥ ३॥
13मैं सहज ही आता एवं जाता और सहज ही मन रमण कर रहा है।
14हे नानक ! जब गुरु ने भ्रम को मिटाया तो प्रभु चरणों में स्थान पा लिया। ४॥ ३॥ १२॥
15मारू महला ५॥
16जिस परमात्मा ने तुझे उत्पन्न करके गौरव प्रदान किया है, उससे तेरी कोई रुचि नहीं।
17यदि अन्य ऋतु में अन्य बीज बोया जाए तो उसे कोई फल-फूल नहीं लगता॥ १॥
18हे भोले मन ! यह मानव-जीवन नाम रूपी बीज बोने का सुअवसर है,
19मन लगाकर हृदय रूपी खेत में नाम-बोने के इस शुभ-समय का लाभ प्राप्त कर लो॥ १॥ रहाउ॥
20मन का भ्रम एवं हठ छोड़कर गुरु की शरण में जाओ।
21जिसकी तकदीर में विधाता ने लिखा होता है, वह वही कर्म करता है॥ २॥
22गोविन्द से ऐसा अटूट प्रेम लगा है कि सेवा भक्ति सफल हो गई है।
23मेरे हृदय-रूपी खेत में अक्षुण्ण नाम रूपी फसल तैयार हो चुकी है।॥३॥
24अब मुझे सत्य रूपी अमूल्य पदार्थ की प्राप्ति हुई है, जिसे मैं छोड़कर कहीं नहीं जाता।
25हे नानक ! मुझे सुख उपलब्ध हो गया है, जिससे में संतुष्ट एवं तृप्त रहता हूँ॥ ४॥ ४॥ १३॥
26मारू महला ५॥
27भ्रम का अण्डा फूट गया हैं एवं मेरे मन में सत्य का प्रकाश हो गया है।
28पैरों में पड़ी बन्धनों की बेड़ काटकर गुरु ने (माया की) कैद से मुक्ति कर दी हैं॥ १॥
29मेरा जन्म-मरण का चक्र मिट गया है।
30जब गुरु ने शान्ति उत्पन्न करने वाला हरि-नाम प्रदान किया तो मन में से तृष्णाग्नि की जलती हुई कड़ाही बुझ गई॥ १॥ रहाउ |
31जब से साधुओं का संग मिला है, तब से मुझ पर निगाह रखने वाले यमदूत मेरा साथ छोड़ गए हैं।
32जिसने बन्धन में डाला था, जब उससे ही छूट गया तो कोतवाल यमराज मेरा क्या बिगाड़ सकता है॥ २॥
33मेरे पाप-कर्मों का भार सिर से उतर गया है और निष्कर्म हो गया हैं।
34गुरु ने मुझ पर बड़ा उपकार किया है, जिस कारण मैं संसार-सागर से निकल कर तट पर पहुँच गया हैं॥ ३॥
35अब सत्संग रूपी सच्चा स्थान मिल गया है, सच्चा स्थान ही उठने-बैठने-रहने का ठिकाना हैं और सत्य ही मेरा जीवन-उद्देश्य बन गया है।
36हे नानक ! सत्य ही मेरी पूंजी एवं व्यापार का सौदा हैं, जिसे हृदय-घर में ही पा लिया है| ४॥ ५॥१४॥
37मारू महला ५॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं