गुरु ग्रंथ साहिब 1001 · Raag Maaroo · Guru Arjan Dev Ji
1अरे मूर्ख ! तूने मन से राम को भुला दिया है।
2तू मालिक का नमक खाकर हरामखोरी करता है, लोगों की आँखों के देखते ही तुझे जलाकर नाश कर दिया जाएगा। १॥ रहाउ॥
3तन में असाध्य रोग पैदा हो गया है, जिसका किसी विधि से कोई उपचार नहीं है।
4नानक ने तो इस बात पर विचार किया है कि प्रभु को विस्मृत करने से महा दुख ही प्राप्त होता है। २॥ ८॥
5मारू महला ५॥
6प्रभु के चरण-कमल मन में बसा लो,
7नित्य ही उसके गुण गाते रहो।
8उसके अलावा जग में कोई बड़ा नहीं है।
9सृष्टि के आदि, मध्य एवं अन्त में केवल उसका ही अस्तित्व है। १॥
10वह स्वयं ही संतजनों का आसरा है। १ । रहाउ ।
11जिसके वश में समूचा संसार है,
12वह निराकार स्वयं ही सबकुछ है।
13हे नानक ! जिसने परमसत्य का सहारा ले लिया है,
14उसे ही सच्चा सुख हासिल हुआ है और फिर वह कभी दुखी नहीं होता। २॥ ९॥
15मारू महला ५ घरु ३
16ੴ सतिगुर प्रसादि॥
17हे ज्ञानहीन मानव ! प्राणों एवं आत्मा को सुख प्रदान करने वाले ईश्वर को तूने क्यों भुला दिया है।
18माया का तुच्छ नशा सेवन करके तू बावला हो गया है, जिस कारण तेरा दुर्लभ जन्म व्यर्थ जा रहा है। १ ।
19हे नर ! तू बड़ी मूर्खता कर रहा है,
20भगवान् को त्याग कर भ्रम में भूला हुआ है और माया दासी के संग नाता बनाया हुआ है। १॥ रहाउ ।
21तू ईश्वर को छोड़कर नीच कुल की सेवा में मग्न है और मैं-मैं करके पूरी जिंदगी अहंकार में गुजर रही है।
22हे अज्ञानी ! तू निकम्मे कर्म करता है, इसलिए तू मनमुखी एवं अंधा कहलाता है। २॥
23जो (मृत्यु) सत्य है, उसे असत्य समझ लिया है, जो (जीवन) नाशवान् है, उसे निश्चल मान लिया है।
24जो (धन) पराया है, उसे अपना समझ कर पकड़ा हुआ है और तू ऐसी भूल में भूला हुआ है॥ ३॥
25क्षत्रिय, ब्राह्मण, वैश्य, एवं शूद्र-ये सब एक हरि-नाम से मोक्ष पाते हैं।
26गुरु नानक उपदेश कहते हैं, जो इसे सुनता है, उसकी मुक्ति हो जाती है। ४॥ १॥ १०॥
27मारू महला ५॥
28मनुष्य छिप-छिप कर बुरे काम करता है, मगर साथ रहने वाले प्रभु को उसकी हरकत पता है, वह केवल दुनिया को ही धोखा दे सकता है।
29ईश्वर को भुलाकर विषय-विकारों एवं काम-भोग में लिप्त जीव गर्म स्तम्भ के दण्ड का पात्र बनता है। १ ।
30हे आदमी ! क्यों पराई नारी के घर जाते हो।
31हे मलिन, निर्दयी, कामी गधे ! क्या तूने यमराज का नाम नहीं सुना ?॥ १॥ रहाउ ।
32तूने पाप रूपी पत्थर गले से बाँध लिया है और निंदा रूपी गठरी सिर पर रख ली है।
33तूने महासागर संसार समुद्र से पार होना है, तुझे इस में से पार होना असंभव हो जाएगा।॥ २॥
34काम, क्रोध, लोभ, मोह में फँसकर तूने अपनी ऑखें फेर रखी हैं।
35तुझे कभी भी अपना शीश ऊपर उठाने का अवसर नहीं मिलना, माया-मोह का सागर पार करना बड़ा कठिन है। ३॥
36जैसे सूर्य एवं चन्द्रमा निर्लिप्त रहते हैं और जैसे अपने स्वभावानुसार अग्नि भी सदा अलिप्त एवं निर्मल रहती है, वैसे ही ब्रह्मज्ञानी भी निर्लिप्त रहता है।
37सूर्य, चन्द्रमा एवं अग्नि अच्छे-बुरे सब जीवों को अपना प्रकाश एवं सुख देते हैं, वैसे ही ब्रह्मज्ञानी जीवों को उपदेश देकर परमात्मा से जोड़ते हैं॥ ४॥
38जिसका भाग्योदय हुआ, जिसने सहज स्वभाव गुरु में पूर्ण आस्था धारण की है, उसका भ्रम का पद उतर गया है।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं