गुरु ग्रंथ साहिब 1000 · Raag Maaroo
1मारू महला ५॥
2मान-मोह और लोभ-विकार को अपने चित में आने नहीं दिया।
3नाम-रत्न एवं हरि-गुणों का व्यापार कर उसकी सामग्री लादकर जगत् से चल पड़ा हूँ। १॥
4सेवक की प्रभु से प्रीति अंत तक निभ गई है।
5जीवित रहते मालिक की उपासना करता रहा और अब जग से चलते समय भी मन में उसे ही याद किया है। १॥ रहाउ ।
6मेरे ठाकुर जी ने जैसी आज्ञा की, उससे कभी विमुख नहीं हुआ।
7अगर उसने घर में रखा तो सहज ही आनंद प्राप्त करता रहा। अगर उसने उठने का आदेश किया तो मैं उधर ही दौड़ पड़ा। २॥
8अगर भूख ने तंग किया तो उसकी आज्ञा में उसे ही सुख माना और खुशी-गम को कभी समझा ही नहीं।
9मालिक का जो जो हुक्म हुआ, उसे सहर्ष स्वीकार किया। ३ ।
10जब ठाकुर जी अपने सेवक पर कृपालु हो गए तो उसका लोक-परलोक दोनों ही संवर गए।
11हे नानक ! जिसने अपने मालिक को पहचान लिया है, वह सेवक धन्य है, उसका जन्म सफल हो गया है॥ ४॥ ५॥
12मारू महला ५॥
13मेरा भाग्य खुल गया, ठाकुर जी की कृपा हो गई, इसके फलस्वरूप प्रभु का ही कीर्तिगान किया है।
14श्रम की थकावट दूर होकर आराम मिल गया है और सारी भटकन मिट गई है॥ १॥
15अब मुझे जीवन-पद प्राप्त हो गया है।
16संतजनों की शरण में आकर मन में विधाता ही याद आया है॥ १॥ रहाउ॥
17काम, क्रोध, लोभ एवं मोह का निवारण कर दिया है और सब वैरी नष्ट हो गए हैं।
18मुझे तो ईश्वर साक्षात् प्रत्यक्ष हीं लगता है, वह कहीं दूर नजर नहीं आता॥ २॥
19संतों की मदद से सारी श्रद्धा पूरी हो गई हैं और मन को सुख-शान्ति उपलब्ध हुई हैं।
20जिसने क्षण में ही पतित जीवों को पावन कर दिया है, उसकी महिमा कथन नहीं की जा सकती॥ ३॥
21प्रभु-चरणों की ओट लेने से सारे भय निवृत्त हो गए हैं और में निर्भय हो गया हूँ ।
22हे नानक ! अब तो लगन लगाकर रात-दिन ठाकुर जी का ही यशगान करता रहता हूँ॥ ४॥ ६॥
23मारू महला ५॥
24हे जीव ! जो सर्वकला समर्थ, सर्व-गुणों का स्वामी है, उस ईश्वर का कभी स्तुतिगान नहीं करते ।
25परन्तु जिस माया को हर कोई एक क्षण में छोड़ जाता है, उसके लिए बार-बार दौड़ते रहते हो॥ १॥
26अरे नादान ! अपने प्रभु को क्यों न स्मरण करते।
27काम, क्रोध, मोह रूपी वैरियों के संग रंगरलियों में लीन रहते हो, उनके संग अपना दिल क्यों जला रहे हो॥ १॥ रहाउ॥
28अरे भोले ! जिसका नाम सुनकर यम भी छोड़ जाता है, उसकी शरण क्यों नहीं लेते।
29अपने मन में से बेचारे गीदड़ रूपी भय को निकाल दो और परमात्मा का सहारा बसा लो॥ २।
30जिसका यश सुनकर संसार-सागर से छुटकारा हो जाता है, उसकी स्मृति में लीन नहीं होते।
31छोटे सपने की तरह (माया की प्रीति) थोड़ी सी बात है परन्तु पुनः पुनः उस में ही मन फँसा रहे हो॥ ३॥
32कृपानिधि ठाकुर जी की कृपा से संतों का संग पाकर शोभा प्राप्त हुई है।
33हे नानक ! जब प्रभु सहायक बन जाता है तो त्रिगुणात्मक माया का भ्र्म छूट जाता है॥ ४॥ ७॥
34मारू महला ५॥
35जब अन्तर्यामी ईश्वर सब युक्तियाँ जानता है, तो उससे क्या छिपाया जा सकता है।
36आदमी के हाथ-पाँव इत्यादि अंग क्षण में खत्म हो जाते हैं और उन्हें अग्नि में जला दिया जाता है।१॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं