इस्लाम
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98. अल-बय्यिना

1अह्ले किताब के काफ़िर और मुश्रिक लोग ईमान लाने वाले नहीं थे जब तक कि उनके पास खुला प्रमाम न आ जाये।

2अर्थात अल्लाह का एक रसूल, जो पवित्र ग्रन्थ पढ़कर सुनाये।

3जिसमें उचित आदेश है।

4और जिन लोगों को ग्रन्थ दिये गये, उन्होंने इस खुले प्रमाण के आ जाने के पश्चात ही मतभेद किया।

5और उन्हें केवल यही आदेश दिया गया था कि वे धर्म को शुध्द रखें और सबको तज कर केवल अल्लाह की उपासना करें, नमाज़ अदा करें और ज़कात दें और यही शाश्त धर्म है।

6निःसंदेह, जो लोग अह्ले किताब में से काफ़िर हो गये तथा मुश्रिक (मिश्रणवादी), तो वे सदा नरक की आग में रहेंगे और वही दुष्टतम जन हैं।

7जो लोग ईमान लाये तथा सदाचार करते रहे, तो वही सर्वश्रेष्ठ जन हैं।

8उनका प्रतिफल उनके पालनहार की ओर से सदा रहने वाले बाग़ हैं। जिनके नीचे नहरें बहती होंगी। वे उनमें सदा निवास करेंगे। अल्लाह उनसे प्रसन्न हुआ और वे अल्लाह से प्रसन्न हुए। ये उसके लिए है, जो अपने पालनहार से डरा।

स्रोत: Maulana Azizul Haque Al Umari

WEBREATH · 11:11

«यदि तुम कृतज्ञ बनोगे, तो तुम्हें और अधिक दूँगा» — क़ुरआन 14:7

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं