90. अल-बलाद
1मैं इस नगर मक्का की शपथ लेता हूँ
2तथा तुम इस नगर में प्रवेश करने वाले हो।
3तथा सौगन्ध है पिता एवं उसकी संतान की
4हमने इन्सान को कष्ट में घिरा हुआ पैदा किया है।
5क्या वह समझता है कि उसपर किसी का वश नहीं चलेगा
6वह कहता है कि मैंने बहुत धन ख़र्च कर दिया।
7क्या वह समझता है कि उसे किसी ने देखा नहीं
8क्या हमने उसे दो आँखें नहीं दीं
9और एक ज़बान तथा दो होंट नहीं दिये
10और उसे दोनों मार्ग दिखा दिये।
11तो वह घाटी में घुसा ही नहीं।
12और तुम क्या जानो कि घाटी क्या है
13किसी दास को मुक्त करना।
14अथवा भूक के दिन (अकाल) में खाना खिलाना।
15किसी अनाथ संबंधी को।
16अथवा मिट्टी में पड़े निर्धन को।
17फिर वह उन लोगों में होता है जो ईमान लाये और जिन्होंने धैर्य (सहनशीलता) एवं उपकार के उपदेश दिये।
18यही लोग सौभाग्यशाली (दायें हाथ वाले) हैं।
19और जिन लोगों ने हमारी आयतों को नहीं माना, यही लोग दुर्भाग्य (बायें हाथ वाले) हैं।
20ऐसे लोग, हर ओर से आग में घिरे होंगे।
WEBREATH · 11:11
«यदि तुम कृतज्ञ बनोगे, तो तुम्हें और अधिक दूँगा» — क़ुरआन 14:7
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं