इस्लाम
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84. अल-इंशिकाक

1जब आकाश फट जायेगा।

2और अपने पालनहार की सुनेगा और यही उसे करना भी चाहिये।

3तथा जब धरती फैला दी जायेगी।

4और जो उसके भीतर है, फैंक देगी तथा ख़ाली हो जायेगी।

5और अपने पालनहार की सुनेगी और यही उसे करना भी चाहिये।

6हे इन्सान! वस्तुतः, तू अपने पालनहार से मिलने के लिए परिश्रम कर रहा है और तू उससे अवश्य मिलेगा।

7फिर जिस किसी को उसका कर्मपत्र दाहिने हाथ में दिया जायेगा।

8तो उसका सरल ह़िसाब लिया जायेगा।

9तथा वह अपनों में प्रसन्न होकर वापस जायेगा।

10और जिन्हें उनका कर्मपत्र बायें हाथ में दिया जायेगा।

11तो वह विनाश (मृत्यु) को पुकारेगा।

12तथा नरक में जायेगा।

13वह अपनों में प्रसन्न रहता था।

14उसने सोचा था कि कभी पलट कर नहीं आयेगा।

15क्यों नहीं? निश्चय उसका पालनहार उसे देख रहा था।

16मैं सन्ध्या लालिमा की शपथ लेता हूँ

17तथा रात की और जिसे वह एकत्र करे

18तथा चाँद की, जब वह पूरा हो जाये।

19फिर तुम अवश्य एक दशा से दूसरी दशा में सवार होगे।

20फिर क्यों वे विश्वास नहीं करते

21और जब उनके पास क़ुर्आन पढ़ा जाता है, तो सज्दा नहीं करते।

22बल्कि काफ़िर तो उसे झुठलाते हैं।

23और अल्लाह उनके विचारों को भली-भाँति जानता है।

24अतः, उन्हें दुःखदायी यातना की शुभ सूचना दे दो।

25परन्तु, जो ईमान लाये तथा सदाचार किये, उनके लिए समाप्त न होने वाला बदला है।

स्रोत: Maulana Azizul Haque Al Umari

WEBREATH · 11:11

«यदि तुम कृतज्ञ बनोगे, तो तुम्हें और अधिक दूँगा» — क़ुरआन 14:7

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं