इस्लाम
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76. अल-इंसान

1क्या व्यतीत हुआ मनुष्य पर युग का एक समय, जब वह कोई विचर्चित[1] वस्तु न था

2हमने ही पैदा किया मनुष्य को मिश्रित (मिले हुए) वीर्य[1] से, ताकि उसकी परीक्षा लें और बनाया उसे सुनने तथा देखने वाला।

3हमने उसे राह दर्शा दी।[1] (अब) वह चाहे तो कृतज्ञ बने अथवा कृतघ्न।

4निःसंदेह, हमने तैयार की काफ़िरों (कृतघ्नों) के लिए ज़ंजीर तथा तौक़ और दहकती अग्नि।

5निश्चय सदाचारी (कृतज्ञ) पियेंगे ऐसे प्याले से जिसमें कपूर मिश्रित होगा।

6ये एक स्रोत होगा, जिससे अल्लाह के भक्त पियेंगे। उसे बहा ले जायेंगे (जहाँ चाहेंगे)।

7जो (संसार में) पूरी करते रहे मनोतियाँ[1] और डरते रहे उस दिन से[2] जिसकी आपदा चारों ओर फैली हुई होगी।

8और भोजन कराते रहे उस (भोजन) को प्रेम करने के बावजूद, निर्धन, अनाथ और बंदी को।

9(अपने मन में ये सोचकर) हम तुम्हें भोजन कराते हैं केवल अल्लाह की प्रसन्नता के लिए। तुमसे नहीं चाहते हैं कोई बदला और न कोई कृतज्ञता।

10हम डरते हैं अपने पालनहार से, उस दिन से, जो अति भीषण तथा घोर होगा।

11तो बचा लिया अल्लाह ने उन्हें उस दिन की आपदा से और प्रदान कर दिया प्रफुल्लता तथा प्रसन्नता।

12और उन्हें प्रतिफल दिया उनके धैर्य के बदले स्वर्ग तथा रेशमी वस्त्र।

13वे तकिये लगाये उसमें तख़्तों पर बैठे होंगे। न उसमें धूप देखेंगे न कड़ा शीत।

14और झुके होंगे उनपर उस (स्वर्ग) के साये और बस में किये होंगे उसके फलों के गुच्छे पूर्णतः।

15तथा फिराये जायेंगे उनपर चाँदी के बर्तन तथा प्याले जो शीशों के होंगे।

16चाँदी के शीशों के, जो एक अनुमान से भरेंगे।

17और पिलाये जायेंगे उसमें ऐसे भरे प्याले, जिसमें सोंठ मिली होगी।

18ये एक स्रोत है उस (स्वर्ग) में, जिसका नाम सलसबील है।

19और (सेवा के लिए) फिर रहे होंगे उनपर सदावासी बालक, जब तुम उन्हें देखोगे, तो उन्हें समझोगे कि बिखरे हुए मोती हैं।

20तथा जब तुम वहाँ देखोगे, तो देखोगे बड़ा सुख तथा भारी राज्य।

21उनके ऊपर रेशमी हरे महीन तथा दबीज वस्त्र होंगे और पहनाये जायेंगे उन्हें चाँदी के कंगन और पिलायेगा उन्हें उनका पालनहार पवित्र पेय।

22(तथा कहा जायेगाः) यही है तुम्हारे लिए प्रतिफल और तुम्हारे प्रयास का आदर किया गया।

23वास्तव में, हमने ही उतारा है आपपर क़ुर्आन थोड़ा-थोड़ा करके।

24अतः, आप धैर्य से काम लें अपने पालनहार के आदेशानुसार और बात न मानें, उनमें से किसी पापी तथा कृतघ्न की।

25तथा स्मरण करें अपने पालनहार के नाम का, प्रातः तथा संध्या (के समय)।

26तथा रात्रि में सज्दा करें उसके समक्ष और उसकी पवित्रता का वर्णन करें, रात्रि के लम्बे समय तक।

27वास्तव में, ये लोग मोह रखते हैं संसार से और छोड़ रहे हैं अपने पीछे एक भारी दिन[1] को।

28हमने ही उन्हें पैदा किया है और सुदृढ़ किये हैं उनके जोड़-बंद तथा जब हम चाहें बदला दें उनके[1] जैसे (दूसरों को)।

29निश्चय ये (सूरह) एक शिक्षा है। अतः, जो चाहे अपने पालनहार की ओर (जाने की) राह बना ले।

30और तुम अल्लाह की इच्छा के बिना कुछ भी नहीं चाह सकते।[1] वास्तव में, अल्लाह सब चीज़ों और गुणों को जानने वाला है।

31वह प्रवेश देता है जिसे चाहे अपनी दया में और अत्याचारियों के लिए उसने तैयार की है दुःखदायी यातना।

स्रोत: Maulana Azizul Haque Al Umari

WEBREATH · 11:11

«यदि तुम कृतज्ञ बनोगे, तो तुम्हें और अधिक दूँगा» — क़ुरआन 14:7

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं