इस्लाम
वापस

63. अल-मुनाफिकून

1जब आते हैं आपके पास मुनाफ़िक़, तो कहते हैं कि हम साक्ष्य (गवाही) देते हैं कि वास्तव में आप अल्लाह के रसूल हैं तथा अल्लाह जानता है कि वास्तव में आप अल्लाह के रसूल हैं और अल्लाह गवाही देता है कि मुनाफ़िक़ निश्चय झूठे[1] हैं।

2उन्होंने बना रखा है अपनी शपथों को एक ढाल और रुक गये अल्लाह की राह से। वास्तव में, वे बड़ा दुष्कर्म कर रहे हैं।

3ये सब कुछ इस कारण है कि वे ईमान लाये, फिर कुफ़्र कर गये, तो मुहर लगा दी अल्लाह ने उनके दिलों पर, अतः, वे समझते नहीं।

4और यदि आप उन्हें देखें, तो आपको भा जायें उनके शरीर और यदि वे बात करें, तो आप सुनने लगें उनकी बात, जैसे कि वे लकड़ियाँ हों दीवार के सहारे लगायी[1] हुईं। वे प्रत्येक कड़ी ध्वनि को अपने विरुध्द[2] समझते हैं। वही शत्रु हैं, आप उनसे सावधान रहें। अल्लाह उन्हें नाश करे, वे किधर फिरे जा रहे हैं

5जब उनसे कहा जाता है कि आओ, ताकि क्षमा की प्रार्थना करें तुम्हारे लिए अल्लाह के रसूल, तो मोड़ लेते हैं अपने सिर तथा आप उन्हें देखते हैं कि वे रुक जाते हैं अभिमान (घमंड) करते हुए।

6हे नबी! उनके समीप समान है कि आप क्षमा की प्रार्थना करें उनके लिए अथवा क्षमा की प्रार्थना न करें उनके लिए। कदापि नहीं क्षमा करेगा अल्लाह उन्हें। वास्तव में अल्लाह सुपथ नहीं दिखाता है अवज्ञाकारियों को।

7यही वो लोग हैं, जो कहते हैं कि मत ख़र्च करो उनपर, जो अल्लाह के रसूल के पास रहते हैं, ताकि वे बिखर जायें। जबकि अल्लाह ही के अधिकार में हैं आकाशों तथा धरती के सभी कोष (ख़ज़ाने)। परन्तु मुनाफ़िक़ समझते नहीं हैं।

8वे कहते हैं कि यदि हम वापस पहुँच गये मदीना तक, तो निकाल[1] देगा सम्मानित उससे अपमानित को। जबकि अल्लाह ही के लिए सम्मान हैं एवं उसके रसूल तथा ईमान वालों के लिए। परन्तु मुनाफ़िक़ जानते नहीं।

9हे ईमान वालो! तुम्हें अचेत न करें तुम्हारे धन तथा तुम्हारी संतान अल्लाह के स्मर्ण (याद) से और जो ऐसा करेंगे, वही क्षति ग्रस्त हैं।

10तथा दान करो उसमें से, जो प्रदान किया है हमने तुम्हें, इससे पूर्व कि आ जाये तुममें से किसी के मरण का[1] समय, तो कहे कि मेरे पालनहार! क्यों नहीं अवसर दे दिया मुझे कुछ समय का। ताकि मैं दान करता तथा सदाचारियों में हो जाता।

11और कदापि अल्लाह अवसर नहीं देता किसी प्राणी को, जब आ जाये उसका निर्धारित समय और अल्लाह भली-भाँति सूचित है उससे, जो कुछ तुम कर रहे हो।

स्रोत: Maulana Azizul Haque Al Umari

WEBREATH · 11:11

«यदि तुम कृतज्ञ बनोगे, तो तुम्हें और अधिक दूँगा» — क़ुरआन 14:7

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं