इस्लाम
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56. अल-वाक़िया

1जब होने वाली, हो जायेगी।

2उसका होना कोई झूठ नहीं है।

3नीचा-ऊँचा करने[1] वाली।

4जब धरती तेज़ी से डोलने लगेगी।

5और चूर-चूर कर दिये जायेंगे पर्वत।

6फिर हो जायेंगे बिखरी हुई धूल।

7तथा तुम हो जाओगे तीन समूह।

8तो दायें वाले, तो क्या हैं दायें वाले

9और बायें वाले, तो क्या हैं बायें वाले

10और अग्रगामी तो अग्रगामी ही हैं।

11वही समीप किये[1] हुए हैं।

12वे सुखों के स्वर्गों में होंगे।

13बहुत-से अगले लोगों में से।

14तथा कुछ पिछले लोगों में से होंगे।

15स्वर्ण से बुने हुए तख़्तों पर।

16तकिये लगाये उनपर, एक-दूसरे के सम्मुख (आसीन) होंगे।

17फिरते होंगे उनकी सेवा के लिए बालक, जो सदा (बालक) रहेंगे।

18प्याले तथा सुराह़ियाँ लेकर तथा मदिरा के छलकते प्याले।

19न तो सिर चकरायेगा उनसे, न वे निर्बोध होंगे।

20तथा जो फल वे चाहेंगे।

21तथा पक्षी का जो मांस वे चाहेंगे।

22और गोरियाँ बड़े नैनों वाली।

23छुपाकर रखी हुईं मोतियों के समान।

24उसके बदले, जो वे (संसार में) करते रहे।

25नहीं सुनेंगे उनमें व्यर्थ बात और न पाप की बात।

26केवल सलाम ही सलाम की ध्वनि होगी।

27और दायें वाले, क्या (ही भाग्यशाली) हैं दायें वाले

28बिन काँटे की बैरी में होंगे।

29तथा तह पर तह केलों में।

30फैली हुई छाया[1] में।

31और प्रवाहित जल में।

32तथा बहुत-से फलों में।

33जो न समाप्त होंगे, न रोके जायेंगे।

34और ऊँचे बिस्तर पर।

35हमने बनाया है (उनकी) पत्नियों को एक विशेष रूप से।

36हमने बनाय है उन्हें कुमारियाँ।

37प्रेमिकायें समायु।

38दाहिने वालों के लिए।

39बहुत-से अगलों में से होंगे।

40तथा बहुत-से पिछलों में से।

41और बायें वाले, तो क्या हैं बायें वाले

42वे गर्म वायु तथा खौलते जल में (होंगे)।

43तथा काले धुवें की छाया में।

44जो न शीतल होगा और न सुखद।

45वास्तव में, वे इससे पहले (संसार में) सम्पन्न (सुखी) थे।

46तथा दुराग्रह करते थे महा पापों पर।

47तथा कहा करते थे कि क्या जब हम मर जायेंगे तथा हो जायेंगे धूल और अस्थियाँ, तो क्या हम अवश्य पुनः जीवित होंगे

48और क्या हमारे पूर्वज (भी)

49आप कह दें कि निःसंदेह सब अगले तथा पिछले।

50अवश्य एकत्र किये जायेंगे एक निर्धारित दिन के समय।

51फिर तुम, हे कुपथो! झुठलाने वालो

52अवश्य खाने वाले हो ज़क़्क़ूम (थोहड़) के वृक्ष से।

53तथा भरने वाले हो उससे (अपने) उदर।

54तथा पीने वाले हो उसपर से खौलता जल।

55फिर पीने वाले हो प्यासे[1] ऊँट के समान।

56यही उनका अतिथि सत्कार है, प्रतिकार (प्रलय) के दिन।

57हमने ही उत्पन्न किया है तुम्हें, फिर तुम विश्वास क्यों नहीं करते

58क्या तुमने ये विचार किया कि जो वीर्य तुम (गर्भाशयों में) गिराते हो।

59क्या तुम उसे शिशु बनाते हो या हम बनाने वाले हैं

60हमने निर्धारित किया है तुम्हारे बीच मरण को तथा हम विवश होने वाले नहीं हैं।

61कि बदल दें तुम्हारे रूप और तुम्हें बना दें उस रूप में, जिसे तुम नहीं जानते।

62तथा तुमने तो जान लिया है प्रथम उत्पत्ति को फिर तुम शिक्षा ग्रहण क्यों नहीं करते

63फिर क्या तुमने विचार किया कि उसमें जो तुम बोते हो

64क्या तुम उसे उगाते हो या हम उसे उगाने वाले हैं

65यदि हम चाहें, तो उसे भुस बना दें, फिर तुम बातें बनाते रह जाओ।

66वस्तुतः, हम दण्डित कर दिये गये।

67बल्कि हम (जीविका से) वंचित कर दिये गये।

68फिर तुमने विचार किया उस पानी में, जो तुम पीते हो

69क्या तुमने उसे बरसाया है बादल से अथवा हम उसे बरसाने वाले हैं।

70यदि हम चाहें, तो उसे खारी कर दें, फिर तुम आभारी (कृतज्ञ) क्यों नहीं होते

71क्या तुमने उस अग्नि को देखा, जिसे तुम सुलगाते हो।

72क्या तुमने उत्पन्न किया है उसके वृक्ष को या हम उत्पन्न करने वाले हैं

73हमने ही बनाया उसे शिक्षाप्रद तथा यात्रियों के लाभदायक।

74अतः, (हे नबी!) आप पवित्रता का वर्णन करें अपने महा पालनहार के नाम की।

75मैं शपथ लेता हूँ सितारों के स्थानों की

76और ये निश्चय एक बड़ी शपथ है, यदि तुम समझो।

77वास्तव में, ये आदरणीय[1] क़ुर्आन है।

78सुरक्षित[1] पुस्तक में।

79इसे पवित्र लोग ही छूते हैं।

80अवतरित किया गया है सर्वलोक के पालनहार की ओर से।

81फिर क्या तुम इस वाणि (क़ुर्आन) की अपेक्षा करते हो

82तथा बनाते हो अपना भाग कि इसे तुम झुठलाते हो

83फिर क्यों नहीं जब प्राण गले को पहुँचते हैं।

84और तुम उस समय देखते रहते हो।

85तथा हम अधिक समीप होते हैं उसके तुमसे, परन्तु तुम नहीं देख सकते।

86तो यदि तुम किसी के आधीन न हो।

87तो उस (प्राण) को फेर क्यों नहीं लाते, यदि तुम सच्चे हो

88फिर यदि वह (प्राणी) समीपवर्तियों में है।

89तो उसके लिए सुख तथा उत्तम जीविका तथा सुख भरा स्वर्ग है।

90और यदि वह दायें वालों में से है।

91तो सलाम है तेरे लिए दायें वालों में होने के कारण।

92और यदि वह है झुठलाने वाले कुपथों में से।

93तो अतिथि सत्कार है खौलते पानी से।

94तथा नरक में प्रवेश।

95वास्तव में, यही निश्चय सत्य है।

96अतः, (हे नबी!) आप पवित्रता का वर्णन करें अपने महा पालनहार के नाम की।

स्रोत: Maulana Azizul Haque Al Umari

WEBREATH · 11:11

«यदि तुम कृतज्ञ बनोगे, तो तुम्हें और अधिक दूँगा» — क़ुरआन 14:7

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं