इस्लाम
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46. अल-अहक़ाफ़

1ह़ा मीम।

2इस पुस्तक का उतरना अल्लाह प्रभुत्वशाली, तत्वदर्शी की ओर से है।

3हमने नहीं उत्पन्न किया है आकाशों तथा धरती को और जो कुछ उनके बीच है, परन्तु सत्य के साथ, एक निश्चित अवधि तक के लिए तथा जो काफ़िर हैं, उन्हें जिस बात से सावधान किया जाता है, वे उससे मुँह मोड़े हुए हैं।

4आप कहें कि भला देखो कि जिसे तुम पुकारते हो अल्लाह के सिवा, तनिक मुझे दिखा दो कि उन्होंने क्या उत्पन्न किया है धरती में से? अथवा उनका कोई साझा है आकाशों में? मेरे पास कोई पुस्तक[1] प्रस्तुत करो इससे पूर्व की अथवा बचा हुआ कुछ[2] ज्ञान, यदि तुम सच्चे हो।

5तथा उससे अधिक बहका हुआ कौन हो सकता है, जो अल्लाह के सिवा उसे पुकारता हो, जो उसकी प्रार्थना स्वीकार न कर सके, प्रलय तक और वे उसकी प्रार्थना से निश्चेत (अनजान्) हों

6तथा जब लोग एकत्र किये जायेंगे, तो वे उनके शत्रु हो जायेंगे और उनकी इबादत का इन्हार कर[1] देंगे।

7और जब पढ़कर सुनाई गईं उन्हें हमारी खुली आयतें, तो काफ़िरों ने उस सत्य को, जो उनके पास आ चुका है, कह दिया कि ये तो खुला जादू है।

8क्या वे कहते हैं कि आपने इसे[1] स्वयं बना लिया है? आप कह दें कि यदि मैंने इसे स्वयं बना लिया है, तो तुम मुझे अल्लाह की पकड़ से बचाने का कोई अधिकार नहीं रखते।[2] वही अधिक ज्ञानि है उन बातों का, जो तुम बना रहे हो। वही पर्याप्त है गवाह के लिए मेरे तथा तुम्हारे बीच और वह बड़ा क्षमाशील, दयावान् है।

9आप कह दें कि मैं कोई नया रसूल नहीं हूँ और न मैं जानता हूँ कि मेरे साथ क्या होगा[1] और न तुम्हारे साथ। मैं तो केवल अनुसरण कर रहा हूँ उसका, जो मेरी ओर वह़्यी (प्रकाशना) की जा रही है। मैं तो केवल खुला सावधान करने वाला हूँ।

10आप कह दें: तुम बताओ यदि ये (क़ुर्आन) अल्लाह की ओर से हो और तुम उसे न मानो, जबकि गवाही दे चुका है एक गवाह, इस्राईल की संतान में से इसी बात[1] पर, फिर वह ईमान लाया तथा तुम घमंड कर गये? तो वास्तव में अल्लाह सुपथ नहीं दिखाता अत्याचारी जाति को।

11और काफ़िरों ने कहा, उनसे जो ईमान लाये, यदि ये (धर्म) उत्तम होता, तो वह पहले नहीं आते हमसे, उसकी ओर और जब नहीं पाया मार्गदर्शन उन्होंने इस (क़ुर्आन) से, तो अब यही कहेंगे कि ये तो पुराना झूठ है।

12जबकि इससे पूर्व मूसा की पुस्तक मार्गदर्शक तथा दया बनकर आ चुकी और ये पुस्तक (क़ुर्आन) सच[1] बताने वाली है अरबी भाषा में।[2] ताकि वह सावधान कर दे, अत्याचारियों को और शुभ सूचना हो, सदाचारियों के लिए।

13निश्चय जिन्होंने कहा कि हमारा पालनहार अल्लाह है। फिर उसपर स्थिर रह गये, तो कोई भय नहीं होगा उनपर और न वे[1] उदासीन होंगे।

14यही स्वर्गीय हैं, जो सदावासी होंगे उसमें, उन कर्मों के प्रतिफल (बदले) में, जो वे करते रहे।

15और हमने निर्देश दिया है मनुष्य को, अपने माता-पिता के साथ उपकार करने का। उसे गर्भ में रखा है उसकी माँ ने दुःख झेलकर तथा जन्म दिया उसे दुःख झेलकर तथा उसके गर्भ में रखने तथा दूध छुड़ाने की अवधि तीस महीने रही।[1] यहाँ तक कि जब वह अपनी पूरी शक्ति को पहुँचा और चालीस वर्ष का हुआ, तो कहने लागाः हे मेरे पालनहार! मुझे क्षमता दे कि कृतज्ञ रहूँ तेरे उस पुरस्कार का, जो तूने प्रदान किया है मुझे तथा मेरे माता-पिता को। तथा ऐसा सत्कर्म करूँ, जिससे तू प्रसन्न हो जाये तथा सुधार दे मेरे लिए मेरी संतान को, मैं ध्यानमग्न हो गया तेरी ओर तथा मैं निश्चय मुस्लिमों में से हूँ।

16वही हैं, स्वीकार कर लेंगे हम जिनसे, उनके सर्वोत्तम कर्मों को तथा क्षमा कर देंगे, उनके दुष्कर्मों को। (वे) स्वर्ग वासियों में से हैं, उस सत्य वचन के अनुसार, जो उनसे किया जाता था।

17तथा जिसने कहा अपने माता पिता सेः धिक है तुम दोनों पर! क्या मुझे डरा रहे हो कि मैं धरती से निकाला[1] जाऊँगा, जबकि बहुत-से युग बीत गये[2] इससे पूर्व? और वो दोनों दुहाई दे रहे थे अल्लाह कीः तेरा विनाश हो! तू ईमान ला! निश्चय अल्लाह का वचन सच है। तो वह कह रहा था कि ये अगलों की कहानियाँ हैं।

18यही वो लोग हैं, जिनपर अल्लाह की यातना का वचन सिध्द हो गया, उन समुदायों में, जो गुज़र चुके इनसे पूर्व, जिन्न तथा मनुष्यों में से। वास्तव में, वही क्षति में हैं।

19तथा प्रत्येक के लिए श्रेणियाँ हैं, उनके कर्मानुसार और उन्हें भरपूर बदला दिया जायेगा उनके कर्मों का तथा उनपर अत्याचार नहीं किया जायेगा।

20और जिस दिन सामने लाये जायेंगे, जो काफ़िर हो गये, अग्नि के। (उनसे कहा जायेगाः) तुम ले चुके अपना आन्नद अपने सांसारिक जीवन में और लाभान्वित हो चुके उनसे। तो आज तुम्हें अपमान की यातना दी जायेगी उसके बदले, जो तुम घमंड करते रहे धरती में अनुचित तथा उसके बदले, जो उल्लंघन करते रहे।

21तथा याद करो आद के भाई (हूद[1]) को। जब उसने अपनी जाति को सावधान किया, अह़्क़ाफ़[2] में, जबकि गुज़र चुके सावधान करने वाले (रसूल) उसके पहले और उसके पश्चात् कि इबादत (वंदना) न करो अल्लाह के अतिरिक्त की। मैं डरता हूँ तुमपर, एक बड़े दिन की यातना से।

22तो उन्होंने कहा कि क्या तुम हमें फेरने आये हो हमारे पूज्यों से? तो ले आओ हमारे पास, जिसकी हमें धमकी दे रहे हो, यदि तुम सच्चे हो।

23हूद ने कहाः उसका ज्ञान तो अल्लाह ही को है और मैं तुम्हें वही उपदेश पहुँचा रहा हूँ, जिसके साथ मैं भेजा गया हूँ। परन्तु, मैं देख रहा हूँ तुम्हें कि तुम अज्ञानता की बातें कर रहे हो।

24फिर जब उन्होंने देखा एक बादल आते हुए अपनी वादियों की ओर, तो कहाः ये एक बादल है हमपर बरसने वाला। बल्कि ये वही है, जिसकी तुमने जल्दी मचायी है। ये आँधी है, जिसमें दुःखदायी यातना है।

25वह विनाश कर देगी प्रत्येक वस्तु को अपने पालनहार के आदेश से, तो वे हो गये ऐसे कि नहीं दिखाई देता था कुछ, उनके घरों के अतिरिक्त। इसी प्रकार, हम बदला दिया करते हैं अपराधी लोगों को।

26तथा हमने उन्हें वह शक्ति दी थी, जो इन्हें[1] नहीं दी है। हमने बनाये थे उनके कान, आँखें और दिल, तो नहीं काम आये उनके कान, उनकी आँखें तथा न उनके दिल कुछ भी। क्योंकि वे इन्कार करते थे अल्लाह की आयतों का तथा घेर लिया उन्हें उसने, जिसका वे उपहास कर रहे थे।

27तथा हम ध्वस्त कर चुके हैं तुम्हारे आस-पास की बस्तियों को तथा हमने उन्हें अनेक प्रकार से आयतें सुना दीं, ताकि वे वापस आ जायें।

28तो क्यों नहीं सहायता की उनकी, उन्होंने जिन्हें बनाया था अल्लाह के अतिरिक्त (अल्लाह के) सामीप्य के लिए पूज्य (उपास्य)? बल्कि वे खो गये उनस और ये[1] उनका झूठ था तथा जिसे स्वयं वे घड़ रहे थे।

29तथा याद करें, जब हमने फेर दिया आपकी ओर जिन्नों के एक[1] गिरोह को, ताकि वे क़ुर्आन सुनें। तो जब वे उपस्थित हुए आपके पास, तो उन्होंने कहा कि चुप रहो और जब पढ़ लिया गया, तो वे फिर गये अपनी जाति की ओर सावधान करने वाले होकर।

30उन्होंने कहाः हे हमारी जाति! हमने सूनी है एक पुस्तक, जो उतारी गयी है मुसा के पश्चात्। वह अपने से पूर्व की किताबों की पुष्टि करती है और सत्य तथा सीधी राह दिखाती है।

31हे हमारी जाति! मान लो अल्लाह की ओर बुलाने वाले की बात तथा ईमान लाओ उसपर, वह क्षमा कर देगा तुम्हारे लिए तुम्हारे पापों को तथा बचा लेगा तुम्हें दुःखदायी यातना से।

32तथा जो मानेगा नहीं अल्लाह की ओर बुलाने वाले की बात, तो नहीं है वह विवश करने वाला धरती में और नहीं है उसके लिए अल्लाह के अतिरिक्त कोई सहायक। यही लोग खुले कुपथ में हैं।

33और क्या उन लोगों ने नहीं समझा कि अल्लाह, जिसने उत्पन्न किया है आकाशों तथा धरती को और नहीं थका उनको बनाने से, वह सामर्थ्वान है कि जीवीत कर दे मुर्दों को? क्यों नहीं? वास्तव में, वह जो चाहे, कर सकता है।

34और जिस दिन सामने लाये जायेंगे, जो काफ़िर हो गये, नरक के, (और उनसे कहा जायेगाः) क्या ये सच नहीं है? वे कहेंगे: क्यों नहीं? हमारे पालनहार की शपथ! वह कहेगाः तब चखो यातना, उस कुफ़्र के बदले, जो तुम कर रहे थे।

35तो (हे नबी!) आप सहन करें, जैसे साहसी रसूलों ने सहन किया तथा जल्दी न करें उन (की यातना) के लिए। जिस दिन वे देख लेंगे, जिसका उन्हें वचन दिया जा रहा है, तो समझेंगे कि जैसे वे नहीं रहे हैं, परन्तु दिन के कुछ[1] क्षण। बात पूहुँचा दी गयी है, तो अब उन्हीं का विनाश होगा, जो अवज्ञाकारी हैं।

स्रोत: Maulana Azizul Haque Al Umari

WEBREATH · 11:11

«यदि तुम कृतज्ञ बनोगे, तो तुम्हें और अधिक दूँगा» — क़ुरआन 14:7

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं