इस्लाम
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40. ग़ाफिर

1ह़ा मीम।

2इस पुस्तक का उतरना अल्लाह की ओर से है, जो सब चीज़ों और गुणों को जानने वाला है।

3पाप क्षमा करने, तौबा स्वीकार करने, क्षमायाचना का स्वीकारी, कड़ी यातना देने वाला, समाई वाला, जिसके सिवा कोई ( सच्चा) वंदनीय नहीं। उसी की ओर (सबको) जाना है।

4नहीं झगड़ते हैं अल्लाह की आयतों में उनके सिवा, जो काफ़िर हो गये। अतः, धोखे में न डाल दे आपको उनकी यातायात देशों में।

5झुठलाया इनसे पूर्व, नूह़ की जाति ने तथा बहुत-से समुदायों ने उनके पश्चात् तथा विचार किया प्रत्येक समुदाय ने अपने रसूल को बंदी बना लेने का तथा विवाद किया असत्य के सहारे, ताकि असत्य बना दें सत्य को। तो हमने उन्हें पकड़ लिया। फिर कैसी रही हमारी यातना

6और इसी प्रकार, सिध्द हो गई आपके पालनहार की बात उनपर, जो काफ़िर हो गये कि वही नारकी हैं।

7वे (फ़रिश्ते) जो अपने ऊपर उठाये हुए हैं अर्श (सिंहासन) को तथा जो उसके आस-पास हैं, वे पवित्रता गान करते रहते हैं अपने पालनहार की प्रशंसा के साथ तथा उसपर ईमान रखते हैं और क्षमा याचना करते रहते हैं उनके लिए, जो ईमान लाये हैं।[1] हे हमारे पालनहार! तूने घेर रखा है प्रत्येक वस्तु को (अपनी) दया तथा ज्ञान से। अतः, क्षमा कर दे उनको जो क्षमा माँगें तथा चलें तेरे मार्ग पर तथा बचा ले उन्हें, नरक की यातना से।

8हे हमारे पालनहार! तथा प्रवेश कर दे उन्हें ,उन स्थायी स्वर्गों में, जिनका तूने उन्हें वचन दिया है तथा जो सदाचारी हैं, उनके पूर्वजों, पत्नियों और उनकी संतानों में से। निश्चय तू सब चीज़ों और गुणों को जानने वाला है।

9तथा उन्हें सुरक्षित रख दुष्कर्मों से तथा तूने जिसे बचा लिया दुष्कर्मों से उस दिन, तो दया कर दी उसपर और यही बड़ी सफलता है।

10जिन लोगों ने कुफ़्र किया है, उन्हें (प्रलय के दिन) पुकारा जायेगा कि अल्लाह का क्रोध तुमपर उससे अधिक था, जितना तुम्हें आज अपने ऊपर क्रोध आ रहा है, जब तुम संसार में ईमान की ओर बुलाये[1] जा रहे थे।

11वे कहेंगेः हे हमारे पालनहार! तूने हमें दो बार मारा[1] तथा जीवित (भी) दो बार किया। अतः, हमने मान लिया अपने पापों को। तो क्या (यातना से) निकलने की कोई राह (उपाय) है

12(ये यातना) इस कारण है कि जब तुम्हें (संसार में) बुलाया गया अकेले अल्लाह की ओर, तो तुमने कुफ़्र कर दिया और यदि शिर्क किया जाता उसके साथ, तो तुम मान लेते थे। तो आदेश देने का अधिकार अल्लाह को है, जो सर्वोच्च, सर्वमहान् है।

13वही दिखाता है तुम्हें अपनी निशानियाँ तथा उतारता है तुम्हारे लिए आकाश से जीविका और शिक्षा ग्रहण नहीं करता, परन्तु वही, जो (उसकी ओर) ध्यान करता है।

14तो तुम पुकारो अल्लाह को शुध्द करके उसके लिए धर्म को, यद्यपि बुरा लगे काफ़िरों को।

15वह उच्च श्रेणियों वाला अर्श का स्वामी है। वह उतारता है अपने आदेश से रूह़[1] (वह़्यी), जिसपर चाहता है, अपने भक्तों में से, ताकि वह सचेत करे, मिलने के दिन से।

16जिस दिन सब लोग (जीवित होकर) निकल पड़ेंगे। नहीं छुपी होगी अल्लाह पर उनकी कोई चीज़। किसका राज्य है आज?[1] अकेले प्रभुत्वशाली अल्लाह का।

17आज प्रतिकार दिया जायेगा प्रत्येक प्राणी को, उसके करतूत का। कोई अत्याचार नहीं है आज। वास्तव में, अल्लाह अति शीघ्र ह़िसाब लेने वाला है।

18तथा आप सावधान कर दें उन्हें आगामी समीप दिन से, जब दिल मुँह को आ रहे होंगे। लोग शोक से भरे होंगे। नहीं होगा अत्याचारियों का कोई मित्र, न कोई सिफ़ारिशी, जिसकी बात मानी जाये।

19वह जानता है आँखों की चोरी तथा जो (भेद) सीने छुपाते हैं।

20अल्लाह ही निर्णय करेगा सत्य के साथ तथा जिन्हें वे पुकारते हैं अल्लाह के अतिरिक्त, वे कोई निर्णय नहीं कर सकते। निश्चय अल्लाह ही भली-भाँति सुनने-देखने वाला है।

21क्या वह चले-फिरे नहीं धरती में, ताकि देखते कि कैसा रहा उनका परिणाम, जो इनसे पूर्व थे? वे इनसे अधिक थे बल में तथा अधिक चिन्ह छोड़ गये धरती में। तो पकड़ लिया अल्लाह ने उन्हें उनके पापों के कारण और नहीं था उनके लिए अल्लाह से कोई बचाने वाला।

22ये इस कारण हुआ कि उनके पास लाते थे हमारे रसूल खुली निशानियाँ, तो उन्होंने कुफ़्र किया। अन्ततः, पकड़ लिया उन्हें अल्लाह ने। वस्तुतः, वह अति शक्तिशाली, घोर यातना देने वाला है।

23तथा हमने भेजा मूसा को अपनी निशानियों और हर प्रकार के प्रमाण के साथ।

24फ़िरऔन और (उसके मंत्री) हामान तथा क़ारून के पास। तो उन्होंने कहाः ये तो बड़ा झूठा जादूगर है।

25तो जब वह उनके पास सत्य लाया हमारी ओर से, तो सबने कहाः वध कर दो उनके पुत्रों को, जो ईमान लोये हैं उसके साथ तथा जीवित रहने दो उनकी स्त्रियों को और काफ़िरों का षड्यंत्र निष्फल (व्यर्थ) ही हुआ।

26और कहा फ़िरऔन ने (अपने प्रमुखों सेः) मुझे छोड़ो, मैं वध कर दूँ मूसा को और उसे चाहिये कि पुकारे अपने पालनहार को। वास्तव में, मैं डरता हूँ कि वह बदल देगा तुम्हारे धर्म[1] को अथवा पैदा कर देगा इस धरती (मिस्र) में उपद्रव।

27तथा मूसा ने कहाः मैंने शरण ली है अपने पालनहार तथा तुम्हारे पालनहार की प्रत्येक अहंकारी से, जो ईमान नहीं रखता ह़िसाब के दिन पर।

28तथा कहा एक ईमान वाले व्यक्ति ने फ़िरऔन के घराने के, जो छुपा रहा था अपना ईमानः क्या तुम वध कर दोगे एक व्यक्ति को कि वह कह रहा हैः मेरा पालनहार अल्लाह है? जबकि वह तुम्हारे पास लाया है खुली निशानियाँ तुम्हारे पालनहार की ओर से? और यदि वह झूठा हो, तो उसी के ऊपर है उनका झूठ और यदि सच्चा हो, तो आ पड़ेगा वह कुछ, जिसकी तुम्हें धमकी दे रहा है। वास्तव में, अल्लाह मार्गदर्शन नहीं देता उसे, जो उल्लंघनकारी बहुत झूठा हो।

29हे मेरी जाति के लोगो! तुम्हारा राज्य है आज, तुम प्रभावशाली हो धरती में, तो कौन हमारी रक्षा करेगा अल्लाह की यातना से, यदि वह हमपर आ जाये? फ़िरऔन ने कहाः मैं तुम सब को वही समझा रहा हूँ, जिसे मैं उचित समझता हूँ और तुम्हें सीधी ही राह दिखा रहा हूँ।

30तथा उसने कहा, जो ईमान लायाः हे मेरी जाति! मैं तुमपर डरता हूँ (अगले) समुदायों के दिन जैसे (दिन)[1] से।

31नूह़ की जाति की जैसी दशा से तथा आद और समूद की एवं जो उनके पश्चात् हुए तथा अल्लाह नहीं चाहता कोई अत्याचार भक्तों के लिए।

32तथा हे मेरी जाति! मैं डर रहा हूँ तुमपर, एक-दूसरे को पुकारने के दिन[1] से।

33जिस दिन तुम पीछे फिरकर भागोगे, नहीं होगा तुम्हें अल्लाह से कोई बचाने वाला तथा जिसे अल्लाह कुपथ कर दे, तो उसका कोई पथ पर्दर्शक नहीं।

34तथा आये यूसुफ़ तुम्हारे पास इससे पूर्व खुले प्रमाणों के साथ, तो तुम बराबर संदेह में रहे उससे, जो तुम्हारे पास लाये। यहाँतक कि जब वे मर गये, तो तुमने कहा कि कदापि नहीं भेजेगा अल्लाह उनके पश्चात् कोई रसूल।[1] इसी प्रकार अल्लाह कुपथ कर देता है उसे, जो उल्लंघनकारी डाँवाडोल हो।

35जो झगड़ते हैं अल्लाह की आयतों में, बिना किसी ऐसे प्रमाण के, जो उनके पास आया हो। तो ये बड़े क्रोध की बात है अल्लाह के समीप तथा उनके समीप, जो ईमान लाये हैं। इसी प्रकार, अल्लाह मुहर लगा देता है प्रत्येक अहंकारी अत्याचारी के दिल पर।

36तथा कहा फ़िरऔन ने कि हे हामान! मेरे लिए बना दो एक उच्च भवन, संभवतः मैं उन मार्गों तक पहुच सकूँ।

37आकाश के मार्गों तक, मैं देखूँ मूसा के पूज्य (उपास्य) को और निश्चय मैं उसे झूठा समझ रहा हूँ और इसी प्रकार, शोभनीय बना दिया गया फ़िरऔन के लिए उसका दुष्कर्म तथा रोक दिया गया संमार्ग से और फ़िरऔन का षड्यंत्र विनाश ही में रहा।

38तथा उसने कहा जो ईमान लायाः हे मेरी जाति! मेरी बात मानो, मैं तुम्हें सीधी राह बता रहा हूँ।

39हे मेरी जाति! ये सांसारिक जीवन कुछ साम्यिक लाभ है तथा वास्तव में, परलोक ही स्थायी निवास है।

40जिसने दुष्कर्म किया, तो उसे उसी के समान प्रतिकार दिया जायेगा तथा जो सुकर्म करेगा; नर अथवा नारी में से और वह ईमान वाला (एकेश्वरवादी) हो, तो वही प्रवेश करेंगे स्वर्ग में। जीविका दिये जायेंगे उसमें अगणित।

41तथा हे मेरी जाति! क्या बात है कि मैं बुला रहा हूँ तुम्हें मुक्ति की ओर तथा तुम बुला रहे हो मुझे नरक की ओर

42तुम मुझे बुला रहे हो, ताकि मैं कुफ़्र करूँ अल्लाह के साथ और साझी बनाऊँ उसका उसे, जिसका मुझे कोई ज्ञान नहीं है तथा मैं बुला रहा हूँ तुम्हें, प्रभावशाली, अति क्षमी की ओर।

43निश्चित है कि तुम जिसकी ओर मूझे बुला[1] रहे हो, वह पुकारने योग्य नहीं है, न लोक में, न परलोक में तथा हमें जाना है अल्लाह ही की ओर तथा वास्तव में, अतिक्रमी ही नारकी हैं।

44तो तुम याद करोगे, जो मैं कह रहा हूँ तथा मैं समर्पित करता हूँ अपना मामला अल्लाह को। वास्तव में, अल्लाह देख रहा है भक्तों को।

45तो अल्लाह ने उसे सुरक्षित कर दिया, उनके षड्यंत्र की बुराईयों से और घेर लिया फ़िरऔनियों को बुरी यातना ने।

46वे[1] प्रस्तुत किये जाते हैं अग्नि पर, प्रातः तथा संध्या तथा जिस दिन प्रलय स्थापित होगी, (ये आदेश होगा) कि डाल दो फ़िरऔनियों को कड़ी यातना में।

47तथा जब वे झगड़ेंगे अग्नि में, तो कहेंगे निर्बल उनसे, जो बड़े बनकर रहेः हम तुम्हारे अनुयायी थे, तो क्या तुम, दूर करोगे हमसे अग्नि का कुछ भाग

48वे कहेंगे, जो बड़े बनकर रहेः हमसब इसीमें हैं। अल्लाह निर्णय कर चुका है भक्तों (बंदों) के बीच।

49तथा कहेंगे जो अग्नि में हैं, नरक के रक्षकों सेः अपने पालनहार से प्रार्थना करो कि हमसे हल्की कर दे किसी दिन, कुछ यातना।

50वे कहेंगेः क्या नहीं आये तुम्हारे पास, तुम्हारे रसूल, खुले प्रमाण लेकर? वे कहेंगेः क्यों नहीं? वे कहेंगेः तो तुम ही प्रार्थना करो और काफ़िरों की प्रार्थना व्यर्थ ही होगी।

51निश्चय हम सहायता करेंगे अपने रसूलों की तथा उनकी, जो ईमान लायें, सांसारिक जीवन में तथा जिस दिन[1] साक्षी खड़े होंगे।

52जिस दिन नहीं लाभ पहुँचायेगी अत्याचारियों को उनकी क्षमा याचना तथा उन्हीं के लिए धिक्कार और उन्हीं के लिए बुरा घर है।

53तथा हमने प्रदान किया मूसा को मार्गदर्शन और हमने उत्तराघिकारी बनाया इस्राईल की संतान को पुस्तक (तौरात) का।

54जो मार्गदर्शन तथा शिक्षा थी समझ वालों के लिए।

55तो (हे नबी!) आप धैर्य रखें। वास्तव में, अल्लाह का वचन[1] सत्य है तथा क्षमा माँगें अपने पाप[2] की तथा पवित्रता का वर्णन करते रहें अपने पालनहार की प्रशंसा के साथ, संध्या और प्रातः।

56वास्तव में, जो झगड़ते हैं अल्लाह की आयतों में, बिना किसी प्रमाण के, जो आया[1] हो उनके पास, तो उनके दिलों में बड़ाई के सिवा कुछ नहीं है, जिस तक वे पहुचने वाले नहीं हैं। अतः, आप अल्लाह की शरण लें। वास्तव में, वही सब कुछ सुनने-जानने वाला है।

57निश्चय आकाशों तथा धरती को पैदा करना, अधिक बड़ा है, मनुष्य को पैदा करने से। परन्तु, अधिक्तर लोग ज्ञान नहीं रखते।

58तथा समान नहीं होता अंधा तथा आँख वाला और न जो ईमान लाये और सत्कर्म किये हैं और दुष्कर्मी। तुम (बहुत) कम ही शिक्षा ग्रहण करते हो।

59निश्चय, प्रलय आनी ही है। जिसमें कोई संदेह नहीं। परन्तु, अधिक्तर लोग ईमान (विश्वास) नहीं रखते।

60तथा कहा है तुम्हारे पालनहार ने कि मुझीसे प्रार्थना[1] करो, मैं तुम्हारी प्रार्थना स्वीकार करूँगा। वास्तव में, जो अभिमान (अहंकार) करेंगे मेरी इबादत (वंदना-प्रार्थना) से, तो वे प्रवेश करेंगे नरक में अपमानित होकर।

61अल्लाह ही ने तुम्हारे लिए रात्रि बनाई, ताकि तुम विश्राम करो उसमें तथा दिन को प्रकाशमान बनाया।[1] वस्तुतः, अल्लाह बड़ा उपकारी है लोगों के लिए। किन्तु, अधिक्तर लोग कृतज्ञ नहीं होते।

62यही अल्लाह तुम्हारा पालनहार है, प्रत्येक वस्तु का रचयिता, उत्पत्तिकार। नहीं है कोई ( सच्चा) वंदनीय उसके सिवा, फिर तुम कहाँ बहके जाते हो

63इसी प्रकार, बहका दिये जाते हैं वे, जो अल्लाह की आयतों को नकारते हैं।

64अल्लाह ही है, जिसने बनाया तुम्हारे लिए धरती को निवास स्थान तथा आकाश को छत और तुम्हारा रूप बनाया, तो सुन्दर रूप बनाया तथा तुम्हें जीविका प्रदान की स्व्छ चीज़ों से। वही अल्लाह तुम्हारा पालनहार है, तो शुभ है अल्लाह, सर्वलोक का पालनहार।

65वह जीवित है, कोई ( सच्चा) वंदनीय नहीं है, उसके सिवा। अतः, विशेष रूप से उसकी इबादत करते हुए उसी को पुकारो। सब प्रशंसा सर्वलोक के पालनहार, अल्लाह के लिए हैं।

66आप कह दें: निश्चय मुझे रोक दिया गया है कि इबादत करूँ उनकी, जिन्हें तुम पुकारते हो अल्लाह के सिवा, जब आ गये मेरे पास खुले प्रमाण तथा मुझे आदेश दिया गया है कि मैं सर्वलोक के पालनहार का आज्ञाकारी रहूँ।

67वही है, जिसने तुम्हें पैदा किया मिट्टी से, फिर वीर्य से, फिर बंधे रक्त से, फिर तुम्हें निकालता है (गर्भाशयों से) शिशु बनाकर। फिर बड़ा करता है, ताकि तुम अपनी पूरी शक्ति को पहुँचो। फिर बूढ़े हो जाओ तथा तुममें कुछ इससे पहले ही मर जाते हैं और ये इसलिए होता है, ताकि तुम अपनी निश्चित आयु को पहुँच जाओ तथा ताकि तुम समझो।

68वही है, जो तुम्हें जीवन देता तथा मारता है, फिर जब वह किसी कार्य का निर्णय करता है, तो कहता हैः "हो जा", तो वह हो जाता है।

69क्या आपने नहीं देखा कि जो झगड़ते[1] हैं अल्लाह की आयतों में, वे कहाँ बहकाये जा रहे हैं

70जिन्होंने झुठला दिया पुस्तक को और उसे, जिसके साथ हमने भेजा अपने रसूलों को, तो शीघ्र ही वे जान लेंगे।

71जब तौक़ होंगे उनके गलों में तथा बेड़ियाँ, वे खींचे जायेंगे।

72खौलते पानी में, फिर अग्नि में झोंक दिये जायेंगे।

73फिर कहा जायेगा उनसेः कहाँ हैं वे, जिन्हें तुम साझी बना रहे थे।

74अल्लाह के सिवा? वे कहेंगे कि वे खो गये हम से, बल्कि, हम नहीं पुकारते थे इससे पूर्व, किसी चीज़ को। इसी प्रकार, अल्लाह कुपथ कर देता है काफ़िरों को।

75ये यातना इसलिए है कि तुम धरती में अवैध इतराते थे तथा इस कारण कि तुम अकड़ते थे।

76प्रवेश कर जाओ नरक के द्वारों में, सदावासी होकर उसमें। तो बुरा स्थान है अभिमानियों का।

77तो आप धैर्य रखें निश्चय अल्लाह का वचन सत्य है। फिर यदि आपको दिखा दें उस (यातना) में से, जिसका वचन उन्हें दे रहे हैं या आपका निधन कर दें, तो वह हमारी ओर ही फेरे जायेंगे।

78तथा (हे नबी!) हम भेज चुके हैं बहुत-से रसूलों को आपसे पूर्व, जिनमें से कुछ का वर्णन हम आपसे कर चुके हैं तथा कुछ का वर्णन आपसे नहीं किया है तथा किसी रसूल के (वश)[1] में ये नहीं था कि वह कोई आयत (चमत्कार) ले आये, परन्तु अल्लाह की अनुमति से। फिर जब आ जायेगा अल्लाह का आदेश, तो निर्णय कर दिया जायेगा सत्य के साथ और क्षति में पड़ जायेंगे वहाँ, क्षूठे लोग।

79अल्लाह ही है, जिसने बनाये तुम्हारे लिए चौपाये, ताकि सवारी करो कुछ पर और कुछ को खाओ।

80तथा तुम्हारे लिए उनमें बहुत लाभ हैं और ताकि तुम उनपर पहुँचो, उस आवश्यक्ता को, जो तुम्हारे[1] दिलों में है तथा उनपर और नावों पर तुम्हें सवार किया जाता है।

81तथा वह दिखाता है तुम्हें अपनी निशानियाँ। तो तुम अल्लाह की किन-किन निशानियों का इन्कार करोगे

82तो क्या वह चले-फिरे नहीं धरती में, ताकि देखते कि कैसा रहा उनका परिणाम, जो उनसे पूर्व थे? वे उनसे अधिक कड़े थे, शक्ति में और धरती में अधिक चिन्ह[1] छोड़ गये। तो नहीं आया उनके काम, जो वे कर रहे थे।

83जब आये उनके पास हमारे रसूल, निशानियाँ लेकर, तो वे इतराने लगे उस ज्ञान पर,[1] जो उनके पास था और घेर लिया उन्हें उसने जिसका वे उपहास कर रहे थे।

84तो जब उन्होंने देखा हमारी यातना को, तो कहने लगेः हम ईमान लाये अकेले अल्लाह पर तथा नकार दिया उसे, जिसे उसका साझी बना रहे थे।

85तो ऐसा नहीं हुआ कि उन्हें लाभ पहुँचाता उनका ईमान, जब उन्होंने देख लिया हमारी यातना को। यही अल्लाह का नियम है, जो उसके भक्तों में चला आ रहा है और क्षति में पड़ गये यहीं काफ़िर।

स्रोत: Maulana Azizul Haque Al Umari

WEBREATH · 11:11

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श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं