26. अश-शुअरा
1ता, सीन, मीम।
2ये प्रकाशमय पुस्तक की आयतें हैं।
3संभवतः, आप अपना प्राण[1] खो देने वाले हैं कि वे ईमान लाने वाले नहीं हैं
4यदि हम चाहें, तो उतार दें उनपर आकाश से ऐसी निशानी कि उनकी गर्दनें उसके आगे झुकी की झुकी रह जायें[1]।
5और नहीं आती है उनके पालनहार, अति दयावान् की ओर से कोई नई शिक्षा, परन्तु वे उससे मुख फेरने वाले बन जाते हैं।
6तो उन्होंने झुठला दिया! अब उनके पास शीघ्र ही उसकी सूचनाएँ आ जायेंगी, जिसका उपहास वे कर रहे थे।
7और क्या उन्होंने धरती की ओर नहीं देखा कि हमने उसमें उगाई हैं, बहुत-सी प्रत्येक प्रकार की अच्छी वनस्पतियाँ
8निश्चय ही, इसमें बड़ी निशानी (लक्षण)[1] है। फिर उनमें अधिक्तर ईमान लाने वाले नहीं हैं।
9तथा वास्तव में, आपका पालनहार ही प्रभुत्वशाली, अति दयावान् है।
10(उन्हें उस समय की कथा सुनाओ) जब पुकारा आपके पालनहार ने मूसा को कि जाओ अत्याचारी जाति[1] के पास
11फ़िरऔन की जाति के पास, क्या वे डरते नहीं
12उसने कहाः मेरे पालनहार! वास्तव में, मुझे भय है कि वे मुझे झुठला देंगे।
13और संकुचित हो रहा है मेरा सीना और नहीं चल रही है मेरी ज़ुबान, अतः वह़्यी भेज दे हारून की ओर (भी)।
14और उनका मुझपर एक अपराध भी है। अतः, मैं डरता हूँ कि वे मुझे मार डालेंगे।
15अल्लाह ने कहाः कदापि ऐसा नहीं होगा। तुम दोनों हमारी निशानियाँ लेकर जाओ, हम तुम्हारे साथ सुनने[1] वाले हैं।
16तो तुम दोनों जाओ और कहो कि हम विश्व के पालनहार के भेजे हुए (रसूल) हैं।
17कि तू हमारे साथ बनी इस्राईल को जाने दे।
18(फ़िरऔन ने) कहाः क्या हमने तेरा पालन नहीं किया है, अपने यहाँ बाल्यवस्था में और तू (नहीं) रहा है, हममें अपनी आयु के कई वर्ष
19और तू कर गया वह कार्य,[1] जो किया और तू कृतघनों में से है
20(मूसा ने) कहाः मैंने ऐसा उस समय कर दिया, जबकि मैं अनजान था।
21फिर मैं तुमसे भाग गया, जब तुमसे भय हुआ। फिर प्रदान कर दिया मुझे, मेरे पालनहार ने तत्वदर्शिता और मुझे बना दिया रसूलों में से।
22और ये कोई उपकार है, जो तू मुझे जता रहा है कि तूने दास बना लिया है, इस्राईल के पुत्रों को।
23फ़िरऔन ने कहाः विश्व का पालनहार क्या है
24(मूसा ने) कहाः आकाशों तथा धरती और उसका पालनहार, जो कुछ दोनों के बीच है, यदि तुम विश्वास रखने वाले हो।
25उसने उनसे कहा, जो उसके आस-पास थेः क्या तुम सुन नहीं रहे हो
26(मुसा ने) कहाः तुम्हारा पालनहार तथा तुम्हारे पूर्वोजों का पालनहार है।
27(फ़िरऔन ने) कहाः वास्तव में, तुम्हारा रसूल, जो तुम्हारी ओर भेजा गया है, पागल है।
28(मूसा ने) कहाः वह, पूर्व तथा पश्चिम तथा दोनों के मध्य जो कुछ है, सबका पालनहार है।
29(फ़िरऔन ने) कहाः यदि तूने कोई पूज्य बना लिया मेरे अतिरिक्त, तो तुझे बंदियों में कर दूँगा।
30(मूसा ने) कहाः क्या यद्यपि मैं ले आऊँ तेरे पास एक खुली चीज़
31उसने कहाः तू उसे ले आ, यदि सच्चा है।
32फिर उसने अपनी लाठी फेंक दी, तो अकस्मात वह एक प्रत्यक्ष अजगर बन गयी।
33तथा अपना हाथ निकाला, तो अकस्मात वह उज्ज्वल था, देखने वालों के लिए।
34उसने अपने प्रमुखों से कहा, जो उसके पास थेः वास्तव में, ये तो बड़ा दक्ष जादूगर है।
35ये चाहता है कि तुम्हें, तुम्हारी धरती से निकाल[1] दे, अपने जादू के बल से, तो अब तुम क्या आदेश देते हो
36सबने कहाः अवसर (समय) दो मूसा और उसके भाई (के विषय) को और भेज दो नगरों में एकत्र करने वालों को।
37वे तुम्हारे पास प्रत्येक बड़े दक्ष जादूगर को लायें।
38तो एकत्र कर लिए गये जादूगर एक निश्चित दिन के समय के लिए।
39तथा लोगों से कहा गया कि क्या तुम एकत्र होने वाले[1] हो
40ताकि हम पीछे चलें जादूगरों के यदि वही प्रभुत्वशाली (विजयी) हो जायें।
41और जब जादूगर आये, तो फ़िरऔन से कहाः क्या हमें कुछ पुरस्कार मिलेगा, यदि हम ही प्रभुत्वशाली होंगे
42उसने कहाः हाँ! और तुम उस समय (मेरे) समीपवर्तियों में हो जाओगे।
43मूसा ने उनसे कहाः फेंको, जो कुछ तुम फेंकने वाले हो।
44तो उन्होंने फेंक दी उपनी रस्सियाँ तथा अपनी लाठियाँ तथा कहाः फ़िरऔन के प्रभुत्व की शपथ! हम ही अवश्य प्रभुत्वशाली (विजयी) होंगे।
45अब मूसा ने फेंक दी अपनी लाठी, तो तत्क्षण वह निगलने लगी (उसे), जो झूठ वे बना रहे थे।
46तो गिर गये सभी जादूगर[1] सज्दा करते हुए।
47और सबने कह दियाः हम विश्व के पालनहार पर ईमान लाये।
48मूसा तथा हारून के पालनहार पर।
49(फ़िरऔन ने) कहाः तुम उसका विश्वास कर बैठे, इससे पहले कि मैं तुम्हें आज्ञा दूँ? वास्तव में, वह तुम्हारा बड़ा (गुरू) है, जिसने तुम्हें जादू सिखाया है, तो तुम्हें शीघ्र ज्ञान हो जायेगा, मैं अवश्य तुम्हारे हाथों तथा पैरों को विपरीत दिशा[1] से काट दूँगा तथा तुम सभी को फाँसी दे दूँगा
50सबने कहाः कोई चिन्ता नहीं, हमतो अपने पालनहार हीकी ओर फिरकर जाने वाले हैं।
51हम आशा रखते हैं कि क्षमा कर देगा, हमारे लिए, हमारा पालनहार, हमारे पापों को, क्योंकि हम सबसे पहले ईमान लाने वाले हैं।
52और हमने मूसा की ओर वह़्यी की कि रातों-रात निकल जा मेरे भक्तों को लेकर, तुम सबका पीछा किया जायेगा।
53तो फ़िरऔन ने भेज दिया नगरों में (सेना) एकत्र करने[1] वालों को।
54कि वे बहुत थोड़े लोग हैं।
55और (इसपर भी) वे हमें अति क्रोधित कर रहे हैं।
56और वास्तव में, हम एक गिरोह हैं सावधान रहने वाले।
57अन्ततः, हमने निकाल दिया उन्हें, बागों तथा स्रोतों से।
58तथा कोषों और उत्तम निवास स्थानों से।
59इसी प्रकार हुआ और हमने उनका उत्तराधिकारी बना दिया, इस्राईल की संतान को।
60तो उन्होंने उनका पीछा किया, प्रातः होते ही।
61और जब दोनों गिरोहों ने एक-दूसरे को देख लिया, तो मूसा के साथियों ने कहाः हमतो निश्चय ही पकड़ लिए[1] गये।
62(मूसा ने) कहाः कदापि नहीं, निश्चय मेरे साथ मेरा पालनहार है।
63तो हमने मूसा को वह़्यी की कि मार अपनी लाठी से सागर को, अकस्मात् सागर फट गया तथा प्रत्येक भाग, भारी पर्वत के समान[1] हो गया।
64तथा हमने समीप कर दिया उसी स्थान के, दूसरे गिरोह को।
65और मुक्ति प्रदान कर दी मूसा और उसके सब साथियों को।
66फिर हमने डुबो दिया दूसरों को।
67वास्तव में, इसमें बड़ी शिक्षा है और उनमें से अधिक्तर लोग ईमान वाले नहीं थे।
68तथा वास्तव में, आपका पालनहार निश्चय अत्यंत प्रभुत्वशाली, दयावान् है।
69तथा आप, उन्हें सुना दें, इब्राहीम का समाचार (भी)।
70जब उसने कहा, अपने बाप तथा अपनी जाति से कि तुम क्या पूज रहे हो
71उन्होंने कहाः हम मूर्तियों की पूजा कर रहे हैं और उन्हीं की सेवा में लगे रहते हैं।
72उसने कहाः क्या वे तुम्हारी सुनती हैं, जब तुम पुकारते हो
73या तुम्हें लाभ पहुँचाती या हानि पहुँचाती हैं
74उन्होंने कहाः बल्कि हमने अपने पूर्वोजों को ऐसा ही करते हुए पाया है।
75उसने कहाः क्या तुमने कभी (आँख खोलकर) उसे देखा, जिसे तुम पूज रहे हो।
76तुम तथा तुम्हारे पहले पूर्वज
77क्योंकि ये सब मेरे शत्रु हैं, पूरे विश्व के पालनहार के सिवा।
78जिसने मुझे पैदा किया, फिर वही मुझे मार्ग दर्शा रहा है।
79और जो मुझे खिलाता और पिलाता है।
80और जब रोगी होता हूँ, तो वही मुझे स्वस्थ करता है।
81तथा वही मुझे मारेगा, फिर[1] मुझे जीवित करेगा।
82तथा मैं आशा रखता हूँ कि क्षमा कर देगा, मेरे लिए, मेरे पाप, प्रतिकार (प्रलय) के दिन।
83हे मेरे पालनहार! प्रदान कर दे मुझे तत्वदर्शिता और मुझे सम्मिलित कर सदाचारियों में।
84और मुझे सच्ची ख्याति प्रदान कर, आगामी लोगों में।
85और बना दे मुझे, सुख के स्वर्ग का उत्तराधिकारी।
86तथा मेरे बाप को क्षमा कर दे,[1] वास्तव में, वह कुपथों में से है।
87तथा मुझे निरादर न कर, जिस दिन सब जीवित किये[1] जायेंगे।
88जिस दिन, लाभ नहीं देगा कोई धन और न संतान।
89परन्तु, जो अल्लाह के पास स्वच्छ दिल लेकर आयेगा।
90और समीप कर दी जायेगी स्वर्ग आज्ञाकारियों के लिए।
91तथा खोल दी जायेगी नरक कुपथों के लिए।
92तथा कहा जायेगाः कहाँ हैं वे, जिन्हें तुम पूज रहे थे
93अल्लाह के सिवा, क्या वे तुम्हारी सहायता करेंगे अथवा स्वयं अपनी सहायता कर सकते हैं
94फिर उसमें औंधे झोंक दिये जायेंगे वे और सभी कुपथ।
95और इब्लीस की सेना सभी।
96और वे उसमें आपस में झगड़ते हुए कहंगेः
97अल्लाह की शपथ! वास्तव में, हम खुले कुपथ में थे।
98जब हम तुम्हें, बराबर समझ रहे थे विश्व के पालनहार के।
99और हमें कुपथ नहीं किया, परन्तु अपराधियों ने।
100तो हमारा कोई अभिस्तावक (सिफ़ारिशी) नहीं रह गया।
101तथा न कोई प्रेमी मित्र।
102तो यदि हमें पुनः संसार में जाना होता,[1] तो हम ईमान वालों में हो जाते।
103निःसंदेह, इसमें बड़ी निशानी है और उनमें से अधिक्तर ईमान लाने वाले नहीं हैं।
104और वास्तव में, आपका पालनहार ही अति प्रभुत्वशाली,[1] दयावान् है।
105नूह़ की जाति ने भी रसूलों को झुठलाया।
106जब उनसे उनके भाई नूह़ ने कहाः क्या तुम (अल्लाह से) डरते नहीं हो
107वास्तव में, मैं तुम्हारे लिए एक[1] रसूल हूँ।
108अतः, तुम अल्लाह से डरो और मेरी बात मानो।
109मैं नहीं माँगता इसपर तुमसे कोई पारिश्रमिक (बदला), मेरा बदला तो बस सर्वलोक के पालनहार पर है।
110अतः, तुम अल्लाह से डरो और मेरी आज्ञा का पालन करो।
111उन्होंने कहाः क्या हम तुझे मान लें, जबकि तेरा अनुसरण पतित (नीच) लोग[1] कर रहे हैं
112(नूह़ ने) कहाः मूझे क्य ज्ञान कि वे क्या कर्म करते रहे हैं
113उनका ह़िसाब तो बस मेरे पालनहार के ऊपर है, यदि तुम समझो।
114और मैं धुतकारने वाला[1] नहीं हूँ, ईमान वालों को।
115मैं तो बस खुला सावधान करने वाला हूँ।
116उन्होंने कहाः यदि रुका नहीं, हे नूह़! तो तू अवश्य पथराव करके मारे हुओं में होगा।
117उसने कहाः मेरे पालनहार! मेरी जाति ने मुझे झुठला दिया।
118अतः, तू निर्णय कर दे मेरे और उनके बीच और मुक्त कर दे मुझे तथा उन्हें जो मेरे साथ हैं, ईमान वालों में से।
119तो हमने उसे मुक्त कर दिया तथा उन्हें जो उसके साथ भरी नाव में थे।
120फिर हमने डुबो दिया उसके पश्चात्, शेष लोगों को।
121वास्तव में, इसमें एक बड़ी निशानी (शिक्षा) है तथा उनमें से अधिक्तर ईमान लाने वाले नहीं।
122और निश्चय आपका पालनहार ही अति प्रभुत्वशाली, दयावान् है।
123झुठला दिया आद (जाति) ने (भी) रसूलों को।
124जब कहा उनसे, उनके भाई हूद[1] नेः क्या तुम डरते नहीं हो
125वस्तुतः, मैं तुम्हारे लिए एक न्यासिक (अमानतदार) रसूल हूँ।
126अतः, अल्लाह से डरो और मेरा अनुपालन करो।
127और मैं तुमसे कोई पारिश्रमिक (बदला) नहीं माँगता, मेरा बदला तो बस सर्वलोक के पालनहार पर है।
128क्यों तुम बना लेते हो, हर ऊँचे स्थान पर एक यादगार भवन, व्यर्थ में
129तथा बनाते हो, बड़े-बड़े भवन, जैसे कि तुम सदा रहोगे।
130और जबकिसी को पकड़ते हो, तो पकड़ते हो, महा अत्याचारी बनकर।
131तो अल्लाह से डरो और मेरी आज्ञा का पालन करो।
132तथा उससे भय रखो, जिसने तुम्हारी सहायता की है उससे, जो तुम जानते हो।
133उसने सहायता की है तुम्हारी चौपायों तथा संतान से।
134तथा बाग़ों (उद्यानो) तथा जल स्रोतों से।
135मैं तुमपर डरता हूँ, भीषण दिन की यातना से।
136उन्होंने कहाः नसीह़त करो या न करो, हमपर सब समान है।
137ये बात तो बस प्राचीन लोगों की नीति[1] है।
138और हम उनमें से नहीं हैं, जिन्हें यातना दी जायेगी।
139अन्ततः, उन्होंने हमें झुठला दिया, तो हमने उन्हें ध्वस्त कर दिया। निश्चय इसमें एक बड़ी निशानी (शिक्षा) है और लोगों में अधिक्तर ईमान लाने वाले नहीं हैं।
140और वास्तव में, आपका पालनहार ही अत्यंत प्रभुत्वशाली, दयावान् है।
141झुठला दिया समूद ने (भी)[1] रसूलों को।
142जब कहा उनसे उनके भाई सालेह़ नेः क्या तुम डरते नहीं हो
143वास्तव में, मैं तुम्हारा विश्वसनीय रसूल हूँ।
144तो तुम अल्लाह से डरो और मेरा कहा मानो।
145तथा मैं नहीं माँगता इसपर तुमसे कोई पारिश्रमिक, मेरा पारिश्रमिक तो बस सर्वलोक के पालनहार पर है।
146क्या तुम छोड़ दिये जाओगे उसमें, जो यहाँ हैं निश्चिन्त रहकर
147बाग़ों तथा स्रोतों में।
148तथा खेतों और खजूरों में, जिनके गुच्छे रस भरे हैं।
149तथा तुमपर्वतों को तराशकर घर बनाते हो, गर्व करते हुए।
150अतः, अल्लाह से डरो और मेरा अनुपालन करो।
151और पालन न करो उल्लंघनकारियों के आदेश का।
152जो उपद्रव करते हैं धरती में और सुधार नहीं करते।
153उन्होंने कहाः वास्तव में, तू उनमें से है, जिनपर जादू कर दिया गया है।
154तू तो बस हमारे समान एक मानव है। तो कोई चमत्कार ले आ, यदि तू सच्चा है।
155कहाः ये ऊँटनी है,[1] इसके लिए पानी पीने का एक दिन है और तुम्हारे लिए पानी लेने का निश्चित दिन है।
156तथा उसे हाथ न लगाना बुराई से, अन्यथा तुम्हें पकड़ लेगी एक भीषण दिन की यातना।
157तो उन्होंने वध कर दिया उसे, अन्ततः, पछताने वाले हो गये।
158और पकड़ लिया उन्हें यातना ने। वस्तुतः, इसमें बड़ी निशानी है और नहीं थे उनमें से अधिक्तर ईमान वाले।
159और निश्चय आपका पालनहार ही अत्यंत प्रभुत्वशाली, दयावान् है।
160झुठला दिया लूत की जाति ने (भी) रसूलों को।
161जब कहा उनसे उनके भाई लूत नेः क्या तुम डरते नहीं हो
162वास्तव में, मैं तुम्हारे लिए एक अमानतदार रसूल हूँ।
163अतः अल्लाह से डरो और मेरा अनुपालन करो।
164और मैं तुमसे प्रश्न नहीं करता, इसपर किसी पारिश्रमिक (बदले) का। मेरा बदला तो बस सर्वलोक के पालनहार पर है।
165क्या तुम जाते[1] हो पुरुषों के पास, संसार वासियों में से।
166तथा छोड़ देते हो उसे, जिसे पैदा किया है तुम्हारे पालनहार ने, अर्थात अपनी प्तनियों को, बल्कि तुम एक जाति हो, सीमा का उल्लंघन करने वाली।
167उन्होंने कहाः यदि तू नहीं रुका, हे लूत! तो अवश्य तेरा बहिष्कार कर दिया जायेगा।
168उसने कहाः वास्तव में, मैं तुम्हारे करतूत से बहुत अप्रसन्न हूँ।
169मेरे पालनहार! मुझे बचा ले तथा मेरे परिवार को उससे, जो वे कर रहे हैं।
170तो हमने उसे बचा लिया तथा उसके सभी परिवार को।
171परन्तु, एक बुढ़िया[1] को, जो पीछे रह जाने वालों में थी।
172फिर हमने विनाश कर दिया दूसरों का।
173और वर्षा की उनपर, एक घोर[1] वर्षा। तो बुरी हो गयी डराये हुए लोगों की वर्षा।
174वास्तव में, इसमें एक बड़ी निशानी (शिक्षा) है और उनमें से अधिक्तर ईमान लाने वाले नहीं थे।
175और निश्चय आपका पालनहार ही अत्यंत प्रभुत्वशाली, दयावान् है।
176झुठला दिया ऐय्का[1] वालों ने रसूलों को।
177जब कहा उनसे शोऐब नेः क्या तुम डरते नहीं हो
178मैं तुम्हारे लिए एक विश्वसनीय रसूल हूँ।
179अतः, अल्लाह से डरो तथा मेरी आज्ञा का पालन करो।
180और मैं नहीं माँगता तुमसे इसपर कोई पारिश्रमिक, मेरा पारिश्रमिक तो बस समस्त विश्व के पालनहार पर है।
181तुम नाप-तोल पूरा करो और न बनो कम देने वालों में।
182और तोलो सीधी तराज़ू से।
183और मत कम दो लोगों को उनकी चीज़ें और मत फिरो धरती में उपद्रव फैलाते।
184और डरो उससे, जिसने पैदा किया है तुम्हें तथा अगले लोगों को।
185उन्होंने कहाःवास्तव में, तू उनमें से है, जिनपर जादू कर दिया गया है।
186और तू तो बस एक पुरुष[1] है, हमारे समान और हम तो तुझे झूठों में समझते हैं।
187तो हमपर गिरा दे कोई खण्ड आकाश का, यदि तू सच्चा है।
188उसने कहाः मेरा पालनहार भली प्रकार जानता है उसे, जो कुछ तुम कर रहे हो।
189तो उन्होंने उसे झुठला दिया। अन्ततः, पकड़ लिया उन्हें छाया के[1] दिन की यातना ने। वस्तुतः, वह एक भीषण दिन की यातना थी।
190निश्चय ही, इसमें एक बड़ी निशानी (शिक्षा) है और नहीं थे उनमें अधिक्तर ईमान लाने वाले।
191और वास्तव में, आपका पालनहार ही अत्यंत प्रभुत्वशाली, दयावान् है।
192तथा निःसंदेह, ये (क़ुर्आन) पूरे विश्व के पालनहार का उतारा हुआ है।
193इसे लेकर रूह़ुल अमीन[1] उतरा।
194आपके दिल पर, ताकि आप हो जायें सावधान करने वालों में।
195खुली अरबी भाषा में।
196तथा इसकी चर्चा[1] अगले रसूलों की पुस्तकों में (भी) है।
197क्या और उनके लिए ये निशानी नहीं है कि इस्राईलियों के विद्वान[1] इसे जानते हैं।
198और यदि हम इसे उतार देते किसी अजमी[1] पर।
199और वह, इसे उनके समक्ष पढ़ता, तो वे उसपर ईमान लाने वाले न होते[1]।
200इसी प्रकार, हमने घुसा दिया है इस (क़ुर्आन के इन्कार) को पापियों के दिलों में।
201वे नहीं ईमान लायेंगे उसपर, जब तक देख नहीं लेंगे दुःखदायी यातना।
202फिर, वह उनपर सहसा आ जायेगी और वे समझ भी नहीं पायेंगे।
203तो कहेंगेः क्या हमें अवसर दिया जायेगा
204तो क्या वे हमारी यातना की जल्दी मचा रहे हैं
205(हे नबी!) तो क्या आपने विचार किया कि यदि हम लाभ पहुँचायें इन्हें वर्षों।
206फिर आ जाये उनपर वह, जिसकी उन्हें धमकी दी जा रही थी।
207तो कुछ काम नहीं आयेगा उनके, जो उन्हें लाभ पहुँचाया जाता रहा
208और हमने किसी बस्ती का विनाश नहीं किया, परन्तु उसके लिए सावधान करने वाले थे।
209शिक्षा देने के लिए और हम अत्याचारी नहीं हैं।
210तथा नहीं उतरे हैं (इस क़ुर्आन) को लेकर शैतान।
211और न योग्य है उनके लिए और न वे इसकी शक्ति रखते हैं।
212वास्तव में, वे तो (इसके) सुनने से भी दूर[1] कर दिये गये हैं।
213अतः, आप न पुकारें अल्लाह के साथ किसी अन्य पूज्य को, अन्यथा आप दण्डितों में हो जायेंगे।
214और आप सावधान कर दें अपने समीपवर्ती[1] संबंधियों को।
215और झुका दें अपना बाहु[1] उसके लिए, जो आपका अनुयायी हो, ईमान वालों में से।
216और यदि वे आपकी अवज्ञा करें, तो आप कह दें कि मैं निर्दोष हूँ उससे, जो तुम कर रहे हो।
217तथा आप भरोसा करें अत्यंत प्रभुत्वशाली, दयावान् पर।
218जो देखता है आपको, जिस समय (नमाज़) में खड़े होते हैं।
219और आपके फिरने को सज्दा करने[1] वालों में।
220निःसंदेह, वही सब कुछ सुनने-जानने वाला है।
221क्या मैं तुम सबको बताऊँ कि किसपर शैतान उतरते हैं
222वे उतरते हैं, प्रत्येक झूठे पापी[1] पर।
223वे पहुँचा देते हैं, सुनी सुनाई बातों को और उनमें अधिक्तर झूठे हैं।
224और कवियों का अनुसरण बहके हुए लोग करते हैं।
225क्या आप नहीं देखते कि वे प्रत्येक वादी में फिरते[1] हैं।
226और ऐसी बात कहते हैं, जो करते नहीं।
227परन्तु वो (कवि), जो[1] ईमान लाये, सदाचार किये, अल्लाह का बहुत स्मरण किया तथा बदला लिया इसके पश्चात् कि उनके ऊपर अत्याचार किया गया! तथा शीघ्र ही जान लेंगे, जिन्होंने अत्याचार किया है कि व किस दुष्परिणाम की ओर फिरते हैं
WEBREATH · 11:11
«यदि तुम कृतज्ञ बनोगे, तो तुम्हें और अधिक दूँगा» — क़ुरआन 14:7
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं