इस्लाम
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19. मरियम

1काफ़, हा, या, ऐन, स़ाद।

2ये आपके पालनहार की दया की चर्चा है, अपने भक्त ज़करिय्या पर।

3जबकि उसने अपने पालनहार से विनय की, गुप्त विनय।

4उसने कहाः मेरे पालनहार! मेरी अस्थियाँ निर्बल हो गयीं, सिर बुढ़ापे से सफेद[1] हो गया है तथा मेरे पालनहार! कभी ऐसा नहीं हुआ कि तुझसे प्रार्थना करके निष्फल हुआ हूँ।

5और मुझे अपने भाई-बंदों से भय[1] है, अपने (मरण) के पश्चात् तथा मेरी पत्नी बाँझ है, अतः मुझे अपनी ओर से एक उत्तराधिकारी प्रदान कर दे।

6वह मेरा उत्तराधिकारी हो तथा याक़ूब के वंश का उत्तराधिकारी[1] हो और हे मेरे पालनहार! उसे प्रिय बना दे।

7हे ज़करिय्या! हम तुझे एक बालक की शुभ सूचना दे रहे हैं, जिसका नाम यह़्या होगा। हमने नहीं बनाया है, इससे पहले उसका कोई समनाम।

8उसने (आश्यर्य से) कहाः मेरे पालनहार! कहाँ से मेरे यहाँ कोई बालक होगा, जबकि मेरी पत्नि बाँझ है और मैं बुढ़ापे की चरम सीमा को जा पहुँचा हूँ।

9उसने कहाः ऐसा ही होगा, तेरे पालनहार ने कहा हैः ये मेरे लिए सरल है, इससे पहले मैंने तेरी उत्पत्ति की है, जबकि तू कुछ नहीं था।

10उस (ज़करिय्या) ने कहाः मेरे पालनहार! मेरे लिए कोई लक्षण (चिन्ह) बना दे। उसने कहाः तेरा लक्षण ये है कि तू बोल नहीं सकेगा, लोगों से निरंतर तीन रातें[1]।

11फिर वह मेह़राब (चाप) से निकलकर अपनी जाति के पास आया और उन्हें संकेत द्वारा आदेश दिया कि उस (अल्लाह) की पवित्रता का वर्णन करो, प्रातः तथा संध्या।

12हे यह़्या[1]! इस पुस्तक (तौरात) को थाम ले और हमने उसे बचपन ही में ज्ञान (प्रबोध) प्रदान किया।

13तथा अपनी ओर से प्रेम भाव तथा पवित्रता (प्रदान की) और वह बड़ा संयमी (सदाचारी) था।

14तथा अपनी माता-पिता के साथ सुशील था। वह क्रुर तथा अवज्ञाकारी नहीं था।

15उसपर शान्ति है, जिस दिन उसने जन्म लिया और जिस दिन मरेगा और जिस दिन पुनः जीवित किया जायेगा।

16तथा आप, इस पुस्तक (क़ुर्आन) में मर्यम[1] की चर्चा करें, जब वह अपने परिजनों से अलग होकर एक पूर्वी स्थान की ओर आयीं।

17फिर उनकी ओर से पर्दा कर लिया, तो हमने उसकी ओर अपनी रूह़ (आत्मा)[1] को भेजा, तो उसने उसके लिए एक पूरे मनुष्य का रूप धारण कर लिया।

18उसने कहाः मैं शरण माँगती हूँ अत्यंत कृपाशील की तुझ से, यदि तुझे अल्लाह का कुछ भी भय हो।

19उसने कहाः मैं तेरे पालनहार का भेजा हुआ हूँ, ताकि तुझे एक पुनीत बालक प्रदान कर दूँ।

20वह बोलीः ये कैसे हो सकता है कि मेरे बालक हों, जबकि किसी पुरुष ने मुझे स्पर्श भी नहीं किया है और न मैं व्यभिचारिणी हूँ

21फ़रिश्ते ने कहाः ऐसा ही होगा, तेरे पालनहार का वचन है कि वह मेरे लिए अति सरल है और ताकि हम उसे लोगों के लिए एक लक्षण (निशानी)[1] बनायें तथा अपनी विशेष दया से और ये एक निश्चित बात है।

22फिर वह गर्भवती हो गई तथा उस (गर्भ को लेकर) दूर स्थान पर चली गयी।

23फिर प्रसव पीड़ा उसे एक खजूर के तने तक लायी, कहने लगीः क्या ही अच्छा होता, मैं इससे पहले ही मर जाती और भूली-बिसरी हो जाती।

24तो उसके नीचे से पुकारा[1] कि उदासीन न हो, तेरे पालनहार ने तेरे नीचे[2] एक स्रोत बहा दिया है।

25और हिला दे अपनी ओर खजूर के तने को, तुझपर गिरायेगा वह ताज़ी पकी खजूरें[1]।

26अतः, खा, पी तथा आँख ठण्डी कर। फिर यदि किसी पुरुष को देखे, तो कह देः वास्तव में, मैंने मनौती मान रखी है, अत्यंत कृपाशील के लिए व्रत की। अतः, मैं आज किसी मनुष्य से बात नहीं करूँगी।

27फिर उस (शिशु ईसा) को लेकर अपनी जाति में आयी, सबने कहाः हे मर्यम! तूने बहुत बुरा किया।

28हे हारून की बहन[1]! तेरा पिता कोई बुरा व्यक्ति न था और न तेरी माँ व्यभिचारिणी थी।

29मर्यम ने उस (शिशु) की ओर संकेत किया। लोगों ने कहाः हम कैसे उससे बात करें, जो गोद में पड़ा हुआ एक शिशु है

30वह (शिशु) बोल पड़ाः मैं अल्लाह का भक्त हूँ। उसने मुझे पुस्तक (इन्जील) प्रदान की है तथा मुझे नबी बनाया है[1]।

31तथा मुझे शुभ बनाया है, जहाँ रहूँ और मुझे आदेश दिया है नमाज़ तथा ज़कात का, जब तक जीवित रहूँ।

32तथा आपनी माँ का सेवक (बनाया है) और उसने मुझे क्रूर तथा अभागा[1] नहीं बनाया है।

33तथा शान्ति है मुझपर, जिस दिन मैंने जन्म लिया, जिस दिन मरूँगा और जिस दिन पुनः जीवित किया जाऊँगा।

34ये है ईसा मर्यम का सुत, यही सत्य बात है, जिसके विषय में लोग संदेह कर रहे हैं।

35अल्लाह का ये काम नहीं कि अपने लिए कोई संतान बनाये, वह पवित्र है! जब वह किसी कार्य का निर्णय करता है, तो उसके सिवा कुछ नहीं होता कि उसे आदेश दे किः "हो जा" और वह हो जाता है।

36और (ईसा ने कहाः) वास्तव में, अल्लाह मेरा पालनहार तथा तुम्हारा पालनहार है, अतः, उसी की इबादत (वंदना) करो, यही सुपथ (सीधी राह) है।

37फिर सम्प्रदायों[1] ने आपस में विभेद किया, तो विनाश है उनके लिए, जो काफ़िर हो गये, एक बड़े दिन के आ जाने के कारण।

38वे भली-भाँति सुनेंगे और देखेंगे, जिस दिन हमारे पास आयेंगे, परन्तु अत्याचारी आज खुले कुपथ में हैं।

39और (हे नबी!) आप उन्हें संताप के दिन से सावधान कर दें, जब निर्णय[1] कर दिया जायेगा, जबकि वे अचेत हैं तथा ईमान नहीं ला रहे हैं।

40निश्चय हम ही उत्तराधिकारी होंगे धरती के तथा जो उसके ऊपर है और हमारी ही ओर सब प्रत्यागत किये जायेंगे।

41तथा आप चर्चा कर दें इस पुस्तक (क़ुर्आन) में इब्राहीम की। वास्तव में, वह एक सत्यवादी नबी था।

42जब उसने कहा अपने पिता सेः हे मेरे प्रिय पिता! क्यों आप उसे पूजते हैं, जो न सुनता है, न देखता है और न आपके कुछ काम आता

43हे मेरे पिता! मेरे पास वह ज्ञान आ गया है, जो आपके पास नहीं आया, अतः आप मेरा अनुसरण करें, मैं आपको सीधी राह दिखा दूँगा।

44हे मेरे प्रिय पिता! शैतान की पूजा न करें, वास्तव में, शैतान अत्यंत कृपाशील (अल्लाह) का अवज्ञाकारी है।

45हे मेरे पिता! वास्तव में, मुझे भय हो रहा है कि आपको अत्यंत कृपाशील की कोई यातना आ लगे, तो आप शैतान के मित्र हो जायेंगे[1]।

46उसने कहाः क्या तू हमारे पूज्यों से विमुख हो रहा है? हे इब्राहीम! यदि तू (इससे) नहीं रुका, तो मैं तुझे पत्थरों से मार दूँगा और तू मुझसे विलग हो जा, सदा के लिए।

47(इब्राहीम) ने कहाः सलाम[1] है आपको! मैं क्षमा की प्रार्थना करता रहूँगा आपके लिए अपने पालनहार से, मेरा पालनहार मेरे प्रति बड़ा करुणामय है।

48तथा मैं तुम सभीको छोड़ता हूँ और जिसे तुम पुकारते हो अल्लाह के सिवा और प्रार्थना करता रहूँगा अपने पालनहार से। मुझे विश्वास है कि मैं अपने पालनहार से प्रार्थना करके असफल नहीं हूँगा।

49फिर जब उन्हें छोड़ दिया तथा जिन्हें वे अल्लाह के सिवा पुकार रहे थे, तो हमने उसे प्रदान कर दिया इस्ह़ाक़ तथा याक़ूब, और हमने प्रत्येक को नबी बना दिया।

50तथा हमने प्रदान की, उन सबको, अपनी दया में से और हमने बना दी, उनकी शुभ चर्चा सर्वोच्च।

51और आप इस पुस्तक में मूसा की चर्चा करें। वास्तव में, वह चुना हुआ तथा रसूल एवं नबी था।

52और हमने उसे पुकारा तूर पर्वत के दायें किनारे से तथा उसे समीप कर लिया रहस्य की बात करते हूए।

53और हमने प्रदान किया उसे अपनी दया में से, उसके भाई हारून को नबी बनाकर।

54तथा इस पुस्तक में इस्माईल[1] की चर्चा करो, वास्तव में, वह वचन का पक्का तथा रसूल-नबी था।

55और आदेश देता था अपने परिवार को नमाज़ तथा ज़कात का और अपने पालनहार के यहाँ प्रिय था।

56तथा इस पुस्तक में इद्रीस की चर्चा करो, वास्तव में, वह सत्यवादी नबी था।

57तथा हमने उसे उठाया उच्च स्थान पर।

58यही वो लोग हैं, जिनपर अल्लाह ने पुरस्कार किया, नबियों में से, आदम की संतति में से तथा उनमें से, जिन्हें हमने (नाव पर) सवार किया नूह़ के साथ तथा इब्राहीम और इस्राईल की संतति में से तथा उनमें से जिन्हें हमने मार्गदर्शन दिया और चुन लिया, जब इनके समक्ष पढ़ी जाती थी अत्यंत कृपाशील की आयतें, तो वे गिर जाया करते थे सज्दा करते हुए तथा रोते हुए।

59फिर इनके पश्चात् ऐसै कपूत पैदा हुए, जिन्होंने गंवा दिया नमाज़ को तथा अनुसरण किया मनोकांक्षाओं का, तो वे शीघ्र ही कुपथ (के परिणाम) का सामना करेंगे।

60परन्तु जिन्होंने क्षमा माँग ली तथा ईमान लाये और सदाचार किये, तो वही स्वर्ग में प्रवेश करेंगे और उनपर तनिक अत्याचार नहीं किया जायेगा।

61स्थायी बिन देखे स्वर्ग, जिनका परोक्षतः वचन अत्यंत कृपाशील ने अपने भक्तों को दिया है, वास्तव में, उसका वचन पूरा होकर रहेगा।

62वे नहीं सुनेंगे, उसमें कोई बक्वास, सलाम के सिवा तथा उनके लिए उसमें जीविका होगी प्रातः और संध्या।

63यही वो स्वर्ग है, जिसका हम उत्तराधिकारी बना देंगे, अपने भक्तों में से उसे, जो आज्ञाकारी हो।

64और हम[1] नहीं उतरते, परन्तु आपके पालनहार के आदेश से, उसी का है, जो हमारे आगे तथा पीछे है और जो इसके बीच है और आपका पालनहार भूलने वाला नहीं है।

65आकाशों तथा धरती का पालनहार तथा जो उन दोनों के बीच है। अतः उसी की इबादत (वंदना) करें तथा उसकी इबादत पर स्थित रहें। क्या आप उसके समक्ष किसी को जानते हैं

66तथा मनुष्य कहता है कि क्या जब मैं मर जाऊँगा, तो फिर निकाला जाऊँगा जीवित होकर

67क्या मनुष्य याद नहीं रखता कि हम ही ने उसे इससे पूर्व उत्पन्न किया है, जबकि वह कुछ (भी) न था

68तो आपके पालनहार की शपथ! हम उन्हें अवश्य एकत्र कर देंगे और शैतानों को, फिर उन्हें अवश्य उपस्थित कर देंगे, नरक के किनारे मुँह के बल गिरे हुए।

69फिर हम अलग कर लेंगे, प्रत्येक समुदाय से, उनमें से उसे, जो अत्यंत कृपाशील का अधिक अवज्ञाकारी था।

70फिर हम ही भली-भाँति जानते हैं कि कौन अधिक योग्य है उसमें झोंक दिये जाने के।

71और नहीं है तुममें से कोई, परन्तु वहाँ गुज़रने वाला[1] है, ये आपके पालनहार पर अनिवार्य है, जो पूरा होकर रहेगा।

72फिर हम उन्हें बचा लेंगे, जो डरते रहे तथा उसमें छोड़ देंगे अत्याचारियों को मुँह के बल गिरे हुए।

73तथा जब उनके समक्ष हमारी खुली आयतें पढ़ी जाती हैं, तो काफ़िर ईमान वालों से कहते हैं कि (बताओ) दोनों सम्प्रदायों में किसकी दशा अच्छी है और किसकी मज्लिस (सभा) अधिक भव्य है

74जबकि हम ध्वस्त कर चुके हैं, इनसे पहले बहुत-सी जातियों को, जो इनमें उत्तम थीं संसाधन तथा मान-सम्मान में।

75(हे नबी!) आप कह दें कि जो कुपथ में ग्रस्त होता है, अत्यंत कृपाशील उसे अधिक अवसर देता है। यहाँ तक कि जब उसे देख लें, जिसका वचन दिये जाते हैं; या तो यातना को अथवा प्रलय को, उस समय उन्हें ज्ञान हो जायेगा कि किसकी दशा बुरी और किसका जत्था अधिक निर्बल है।

76और अल्लाह उन्हें, जो सुपथ हों, मार्गदर्शन में आधिक कर देता है और शेष रह जाने वाले सदाचार ही उत्तम हैं, आपके पालनहार के समीप कर्म-फल में तथा उत्तम हैं परिणाम के फलस्वरूप।

77(हे नबी!) क्या आपने उसे देखा, जिसने हमारी आयतों के साथ कुफ़्र (अविश्वास) किया तथा कहाः मैं अवश्य धन तथा संतान दिया जाऊँगा

78क्या वह अवगत हो गया है परोक्ष से अथवा उसने अत्यंत दयाशील से कोई वचन ले रखा है

79कदापि नहीं, हम लिख लेंगे, जो वह कहता है और हम अधिक करते जायेंगे उसकी यातना को अत्यधिक।

80और हम ले लेंगे जिसकी वह बात कर रहा है और वह हमारे पास अकेला[1] आयेगा।

81तथा उन्होंने बना लिए हैं अल्लाह के सिवा बहुत-से पूज्य, ताकि वे उनके सहायक हों।

82ऐसा कदापि नहीं होगा, वे सब इसकी पूजा (उपासना) का अस्वीकार कर[1] देंगे और उनके विरोधी हो जायेंगे।

83क्या आपने नहीं देखा कि हमने भेज दिया है शैतानों को काफ़िरों पर, जो उन्हें बराबर उकसाते रहते हैं

84अतः शीघ्रता न करें उनपर[1], हम तो केवल उनके दिन गिन रहे हैं।

85जिस दिन हम एकत्र कर देंगे, आज्ञाकारियों को, अत्यंत कृपाशील की ओर अतिथि बनाकर।

86तथा हांक देंगे पापियों को नरक की ओर प्यासे पशुओं के समान।

87वह (काफ़िर) अभिस्तावना का अधिकार नहीं रखेंगे, परन्तु जिसने बना लिया हो अत्यंत कृपाशील के पास कोई वचन[1]।

88तथा उन्होंने कहा कि बना लिया है अत्यंत कृपाशील ने अपने लिए एक पुत्र[1]।

89वास्तव में, तुम एक भारी बात घड़ लाये हो।

90समीप है कि इस कथन के कारण आकाश फट पड़े तथा धरती चिर जाये और गिर जायेँ पर्वत कण-कण होकर।

91कि वे सिध्द करने लगे अत्यंत कृपाशील के लिए संतान।

92तथा नहीं योग्य है अत्यंत कृपाशील के लिए कि वह कोई संतान बनाये।

93प्रत्येक जो आकाशों तथा धरती में हैं, आने वाले हैं, अत्यंत कृपाशील की सेवा में दास बनकर।

94उसने उन्हें नियंत्रण में ले रखा है तथा उन्हें पूर्णतः गिन रखा है।

95और प्रत्येक उसके समक्ष आने वाला है, प्रलय के दिन, अकेला[1]।

96निश्चय जो ईमान वाले हैं तथा सदाचार किये हैं, शीघ्र बना देगा, उनके लिए अत्यंत कृपाशील (दिलों में)[1] प्रेम।

97अतः (हे नबी!) हमने सरल बना दिया है, इस (क़ुर्आन) को आपकी भाषा में, ताकि आप इसके द्वारा शुभ सूचना दें संयमियों (आज्ञाकारियों) को तथा सतर्क कर दें विरोधियों को।

98तथा हमने ध्वस्त कर दिया है, इनसे पहले बहुत सी जातियों को, तो क्या आप देखते हैं, उनमें किसी को अथवा सुनते हैं, उनकी कोई ध्वनि

स्रोत: Maulana Azizul Haque Al Umari

WEBREATH · 11:11

«यदि तुम कृतज्ञ बनोगे, तो तुम्हें और अधिक दूँगा» — क़ुरआन 14:7

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं