इस्लाम
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18. अल-काहफ

1सब प्रशंसा उस अल्लाह के लिए है, जिसने अपने भक्त पर ये पुस्तक उतारी और उसमें कोई टेढ़ी बात नहीं रखी।

2अति सीधी (पुस्तक), ताकि वह अपने पास की कड़ी यातना से सावधान कर दे और ईमान वालों को जो सदाचार करते हों, शुभ सूचना सुना दे कि उन्हीं के लिए अच्छा बदला है।

3जिसमें वे नित्य सदावासी होंगे।

4और उन्हें सावधान करे, जिन्होंने कहा कि अल्लाह ने अपने लिए कोई संतान बना ली है।

5उन्हें इसका कुछ ज्ञान है और न उनके पूर्वजों को। बहुत बड़ी बात है, जो उनके मुखों से निकल रही है, वे सरासर झूठ ही बोल रहे हैं।

6तो संभवतः आप इसके पीछे अपना प्राण खो देंगे, संताप के कारण, यदि वे इस ह़दीस (क़ुर्आन) पर ईमान न लायें।

7वास्तव में, जो कुछ धरती के ऊपर है, उसे हमने उसके लिए शोभा बनाया है, ताकि उनकी परीक्षा लें कि उनमें कौन कर्म में सबसे अच्छा है

8और निश्चय हम कर देने[1] वाले हैं, जो उस (धरती) के ऊपर है, उसे (बंजर) धूल।

9(हे नबी!) क्या आपने समझा है कि गुफा तथा शिला लेख वाले[1], हमारे अद्भुत लक्षणों (निशानियों) में से थे

10जब नवयुवकों ने गुफा की ओर शरण ली[1] और प्रार्थना कीः हे हमारे पालनहार! हमें अपनी विशेष दया प्रदान कर और हमारे लिए प्रबंध कर दे हमारे विषय के सुधार का।

11तो हमने उन्हें गुफा में सुला दिया कई वर्षों तक।

12फिर हमने उन्हें जगा दिया, ताकि हम ये जान लें कि दो समुदायों में से किसने उनके ठहरे रहने की अवधि को अधिक याद रखा है

13हम आपको उनकी सत्य कथा सुना रहे हैं। वास्तव में, वे कुछ नवयुवक थे, जो अपने पालनहार पर ईमान लाये और हमने उन्हें मार्गदर्शन में अधिक कर दिया।

14और हमने उनके दिलों को सुदृढ़ कर दिया, जब वे खड़े हुए, फिर कहाः हमारा पालनहार वही है, जो आकाशों तथा धरती का पालनहार है। हम उसके सिवा कदापि किसी पूज्य को नहीं पुकारेंगे। (यदि हमने ऐसा किया) तो (सत्य से) दूर की बात होगी।

15ये हमारी जाति है, जिसने अल्लाह के सिवा बहुत-से पूज्य बना लिए। क्यों वे उनपर कोई खुला प्रमाण प्रस्तुत नहीं करते? उससे बड़ा अत्याचारी कौन होगा, जो अल्लाह पर मिथ्या बात बनाये

16और जब तुम उनसे विलग हो गये तथा अल्लाह के अतिरिक्त उनके पूज्यों से, तो अब अमुक गुफा की ओर शरण लो, अल्लाह तुम्हारे लिए अपनी दया फैला देगा तथा तुम्हारे लिए तुम्हारे विषय में जीवन के साधनों का प्रबंध करेगा।

17और तुम सूर्य को देखोगे कि जब निकलता है, तो उनकी गूफा से दायें झुक जाता है और जब डूबता है, तो उनसे बायें कतरा जाता है और वे उस (गुफा) के एक विस्तृत स्थान में हैं। ये अल्लाह की निशानियों में से है और जिसे अल्लाह मार्ग दिखा दे, वही सुपथ पाने वाला है और जिसे कुपथ कर दे, तो तुम कदापि उसके लिए कोई सहायक मार्गदर्शक नहीं पाओगे।

18और तुम[1] उन्हें समझोगे कि जाग रहे हैं, जबकि वे सोये हुए हैं और हम उन्हें दायें तथा बायें पार्शव पर फिराते रहते हैं और उनका कुत्ता गुफा के द्वार पर अपनी दोनों बाहें फैलाये पड़ा है। यदि तुम झाँककर देख लेते, तो पीठ फेरकर भाग जाते और उनसे भयपूर्ण हो जाते।

19और इसी प्रकार, हमने उन्हें जगा दिया, ताकि वे आपस में प्रश्न करें। तो एक ने उनमें से कहाः तुम कितने (समय) रहे हो? सबने कहाः हम एक दिन रहे हैं अथवा एक दिन के कुछ (समय)। (फिर) सबने कहाः अल्लाह अधिक जानता है कि तुम कितने (समय) रहे हो, तुम अपने में से किसी को, अपना ये सिक्का देकर नगर में भेजो, फिर देखे कि किसके पास अधिक स्वच्छ (पवित्र) भोजन है और उसमें से कुछ जीविका (भोजन) लाये और चाहिए कि सावधानी बरते। ऐसा न हो कि तुम्हारा किसी को अनुभव हो जाये।

20क्योंकि यदि वे तुम्हें जान जायेंगे तो तुम्हें पथराव करके मार डालेंगे या तुम्हें अपने धर्म में लौटा लेंगे और तब तुम कदापि सफल नहीं हो सकोगे।

21इसी प्रकार, हमने उनसे अवगत करा दिया, ताकि उन (नागरिकों) को ज्ञान हो जाये कि अल्लाह का वचन सत्य है और ये कि प्रलय (होने) में कोई संदेह[1] नहीं। जब वे[2] आपस में विवाद करने लगे, तो कुछ ने कहाः उनपर कोई निर्माण करा दो, अल्लाह ही उनकी दशा को भली-भाँति जानता है। परन्तु उन्होंने कहा जो अपना प्रभुत्व रखते थे, हम अवश्य उन (की गुफा के स्थान) पर एक मस्जिद बनायेंगे।

22कुछ[1] कहेंगे कि वे तीन हैं और चौथा उनका कुत्ता है और कुछ कहेंगे कि पाँच हैं और छठा उनका कुत्ता है। ये अंधेरे में तीर चलाते हैं और कहेंगे कि सात हैं और आठवाँ उनका कुत्ता है। (हे नबी!) आप कह दें कि मेरा पालनहार ही उनकी संख्या भली-भाँति जानता है, जिसे कुछ लोगों के सिवा कोई नहीं जानता[2]। अतः आप उनके संबन्ध में कोई विवाद न करें, सिवाय सरसरी बात के और न उनके विषय में किसी से कुछ पूछें[3]।

23और कदापि किसी विषय में न कहें कि मैं इसे कल करने वाला हूँ।

24परन्तु ये कि अल्लाह[1] चाहे तथा अपने पालनहार को याद करें, जब भूल जायेँ और कहें: संभव है, मेरा पालनहार मुझे इससे समीप सुधार का मार्ग दर्शा दे।

25और वे गुफा में तीन सौ वर्ष रहे और नौ वर्ष अधिक[1] और।

26आप कह दें कि अल्लाह उनके रहने की अवधि से सर्वाधिक अवगत है। आकाशों तथा धरती का परोक्ष वही जानता है। क्या ही ख़ूब है वह देखने वाला और सुनने वाला। नहीं है उनका उसके सिवा कोई सहायक और न वह अपने शासन में किसी को साझी बनाता है।

27और आप उसे सुना दें, जो आपकी ओर वह़्यी (प्रकाशना) की गयी है, आपके पालनहार की पुस्तक में से, उसकी बातों को कोई बदलने वाला नहीं है और आप कदापि नहीं पायेंगे उसके सिवा कोई शरण स्थान।

28और आप उनके साथ रहें, जो अपने पालनहार की प्रातः-संध्या बंदगी करते हैं। वे उसकी प्रसन्नता चाहते हैं और आपकी आँखें सांसारिक जीवन की शोभा के लिए[1] उनसे न फिरने पायें और उसकी बात न मानें, जिसके दिल को हमने अपनी याद से निश्चेत कर दिया और उसने मनमानी की और जिसका काम ही उल्लंघन (अवज्ञा करना) है।

29आप कह दें कि ये सत्य है, तुम्हारे पालनहार की ओर से, तो जो चाहे, ईमान लाये और जो चाहे कुफ़्र करे, निश्चय हमने अत्याचारियों के लिए ऐसी अग्नि तैयार कर रखी है, जिसकी प्राचीर[1] ने उन्हें घेर लिया है और यदि वे जल के लिए गुहार करेंगे, तो उन्हें तेल की तलछट के समान जल दिया जायेगा, जो मुखों को भून देगा, वह क्या ही बुरा पेय है और वह क्या ही बुरा विश्राम स्थान है

30निश्चय जो ईमान लाये तथा सदाचार किये, तो हम उनका प्रतिफल व्यर्थ नहीं करेंगे, जो सदाचारी हैं।

31यही हैं, जिनके लिए स्थायी स्वर्ग हैं, जिनमें नहरें प्रवाहित हैं, उसमें उन्हें सोने के कंगन पहनाये जायेंगे।[1] तथा (वे) महीन और गाढ़े रेशम के हरे वस्त्र पहनेंगे, उसमें सिंहासनों के ऊपर आसीन होंगे। ये क्या ही अच्छा प्रतिफल और क्या ही अच्छा विश्राम स्थान है।

32और (हे नबी!) आप उन्हें एक उदाहरण दो वयक्तियों का दें; हमने जिनमें से एक को दो बाग़ दिये अंगूरों के और घेर दिया दोनों को खजूरों से और दोनों के बीच खेती बना दी।

33दोनों बाग़ों ने अपने पूरे फल दिये और उसमें कुछ कमी नहीं की और हमने जारी कर दी दोनों के बीच एक नहर।

34और उसे लाभ प्राप्त हुआ, तो एक दिन उसने अपने साथी से कहा जबकि वह उससे बात कर रहा थाः मैं तुझसे अधिक धनी हूँ तथा स्वजनों में भी अधिक[1] हूँ।

35और उसने अपने बाग़ में प्रवेश किया, अपने ऊपर अत्याचार करते हुए, उसने कहाः मैं नहीं समझता कि इसका विनाश हो जायेगा कभी।

36और न ये समझता हूँ कि प्रलय होगी और यदि मुझे अपने पालनहार की ओर पुनः ले जाया गया, तो मैं अवश्य ही इससे उत्तम स्थान पाऊँगा।

37उससे, उसके साथी ने कहा और वह उससे बात कर रहा थाः क्या तूने उसके साथ कुफ़्र कर दिया, जिसने तुझे मिट्टी से उत्पन्न किया, फिर वीर्य से, फिर तुझे बना दिया एक पूरा पुरुष

38रहा मैं, तो वही अल्लाह मेरा पालनहार है और मैं साझी नहीं बनाऊँगा अपने पालनहार का किसी को।

39और क्यों नहीं जब तुमने अपने बाग़ में प्रवेश किया, तो कहा कि "जो अल्लाह चाहे, अल्लाह की शक्ति के बिना कुछ नहीं हो सकता।" यदि तू मुझे देखता है कि मैं तुझसे कम हूँ धन तथा संतान में

40तो आशा है कि मेरा पालनहार मुझे प्रदान कर दे, तेरे बाग़ से अच्छा और इस बाग़ पर आकाश से कोई आपदा भेज दे और वह चिकनी भूमि बन जाये।

41अथवा उसका जल भीतर उतर जाये, फिर तू उसे पा न सके।

42(अन्ततः) उसके फलों को घेर[1] लिया गया, फिर वह अपने दोनों हाथ मलता रह गया उसपर, जो उसमें खर्च किया था और वह अपने छप्परों सहित गिरा हुआ था और कहने लगाः क्या ही अच्छा होता कि मैं किसी को अपने पालनहार का साझी न बनाता।

43और नहीं रह गया उसके लिए कोई जत्था, जो उसकी सहायता करता और न स्वयं अपनी सहायता कर सका।

44यहीं सिध्द हो गया कि सब अधिकार सत्य अल्लाह को है, वही अच्छा है प्रतिफल प्रदान करने में तथा अच्छा है परिणाम लाने में।

45और (हे नबी!) आप उन्हें सांसारिक जीवन का उदाहरण दें, उस जल से, जिसे हमने आकाश से बरसाया। फिर उसके कारण मिल गई धरती की उपज, फिर चूर हो गई, जिसे वायु उड़ाये फिरती[1] है और अल्लाह प्रत्येक चीज़ पर सामर्थ्य रखने वाला है।

46धन और पुत्र सांसारिक जीवन की शोभा हैं और शेष रह जाने वाले सत्कर्म ही अच्छे हैं, आपके पालनहार के यहाँ प्रतिफल में तथा अच्छे हैं, आशा रखने के लिए।

47तथा जिस दिन हम पर्वतों को चलायेंगे तथा तुम धरती को खुला चटेल[1] देखोगे और हम उन्हें एकत्र कर देंगे, फिर उनमें से किसी को नहीं छोड़ेंगे।

48और सभी आपके पालनहार के समक्ष पंक्तियों में प्रस्तुत किये जायेंगे, तुम हमारे पास आ गये, जैसे हमने तुम्हारी उत्पत्ति प्रथम बार की थी, बल्कि तुमने समझा था कि हम तुम्हारे लिए कोई वचन का समय निर्धारित ही नहीं करेंगे।

49और कर्म लेख[1] (सामने) रख दिये जायेंगे, तो आप अपराधियों को देखेंगे कि उससे डर रहे हैं, जो कुछ उसमें (अंकित) है तथा कहेंगे कि हाय हमारा विनाश! ये कैसी पुस्तक है, जिसने किसी छोटे और बड़े कर्म को नहीं छोड़ा है, परन्तु उसे अंकित कर रखा है? और जो कर्म उन्होंने किये हैं, उन्हें वह सामने पायेंगे और आपका पालनहार किसी पर अत्याचार नहीं करेगा।

50तथा (याद करो) जब आपके पालनहार ने फ़रिश्तों से कहाः आदम को सज्दा करो, तो सबने सज्दा किया, इब्लीस के सिवा। वह जिन्नों में से था, अतः उसने उल्लंघन किया अपने पालनहार की आज्ञा का, तो क्या तुम उसे और उसकी संतति को सहायक मित्र बनाते हो, मुझे छोड़कर जबकि वे तुम्हारे शत्रु हैं? अत्याचारियों के लिए बुरा बदला है।

51मैंने उन्हें उपस्थित नहीं किया, आकाशों तथा धरती की उतपत्ति के समय और न स्वयं उनकी उत्पत्ति के समय और न मैं कुपथों को सहायक[1] बनाने वाला हूँ।

52जिस दिन वह (अल्लाह) कहेगा कि मेरे साझियों को पुकारो, जिन्हें (तुम मेरे साझी) समझ रहे थे। वह उन्हें पुकारेंगे, तो वे उनका कोई उत्तर नहीं देंगे और हम बना देंगे उनके बीच एक विनाशकारी खाई।

53और अपराधी नरक को देखेंगे, तो उन्हें विश्वास जो जायेगा कि वे उसमें गिरने वाले हैं और उससे फिरने का कोई स्थान नहीं पायेंगे।

54और हमने इस क़ुर्आन में प्रत्येक उदाहरण से लोगों को समझाया है। और मनुष्य बड़ा ही झगड़ालू है।

55और नहीं रोका लोगों को कि ईमान लायें, जब उनके पास मार्गदर्शन आ गया और अपने पालनहार से क्षमा याचना करें, किन्तु इसीने कि पिछली जातियों की दशा उनकी भी हो जाये अथवा उनके समक्ष यातना आ जाये।

56तथा हम रसूलों को नहीं भेजते, परन्तु शुभ सूचना देने वाले और सावधान करने वाले बनाकर और जो काफ़िर हैं, असत्य (अनृत) के सहारे विवाद करते हैं, ताकि उसके द्वारा वे सत्य को नीचा[1] दिखायें और उन्होंने बनाया हमारी आयतों को तथा जिस बात की उन्हें चेतावनी दी गई, परिहास।

57और उससे बड़ा अत्याचारी कौन है, जिसे उसके पालनहार की आयतें सुनाई जायेँ, फिर (भी) उनसे मुँह फेर ले और अपने पहले किये हुए करतूत भूल जाये? वास्तव में, हमने उनके दिलों पर ऐसे आवरण (पर्दे) बना दिये हैं कि उसे[1] समझ न पायें और उनके कानों में बोझ। और यदि आप उन्हें सीधी राह की ओर बुलायें, तब (भी) कभी सीधी राह नहीं पा सकेंग।

58और आपका पालनहार अति क्षमी दयावान् है। यदि वह उन्हें उनके करतूतों पर पकड़ता, तो तुरन्त यातना दे देता। बल्कि उनके लिए एक निश्चित समय का वचन है और वे उसके सिवा कोई बचाव का स्थान नहीं पायेंगे।

59तथा ये बस्तियाँ हैं। हमने उन (के निवासियों) का विनाश कर दिया, जब उन्होंने अत्याचार किया और हमने उनके विनाश के लिए एक निर्धारित समय बना दिया था।

60तथा (याद करो) जब मूसा ने अपने सेवक से कहाः मैं बराबर चलता रहूँगा, यहाँ तक कि दोनों सागरों के संगम पर पहुँच जाऊँ अथवा वर्षों चलता[1] रहूँ।

61तो जब दोनों उनके संगम पर पहुँचे, तो दोनों अपनी मछली भूल गये और उसने सागर में अपनी राह बना ली, सुरंग के समान।

62फिर, जब दोनों आगे चले गये, तो उस (मूसा) ने अपने सेवक से कहा कि हमारा दिन का भोजन लाओ। हम अपनी इस यात्रा से थक गये हैं।

63उसने कहाः क्या आपने देखा? जब हमने उस शिला खण्ड के पास शरण ली थी, तो मैं मछली भूल गया और मुझे उसे शैतान ही ने भुला दिया कि मैं उसकी चर्चा करूँ और उसने अपनी राह सागर में अनोखे तरीक़े से बना ली।

64मूसा ने कहाः वही है, जो हम चाहते थे। फिर दोनों अपने पद्चिन्हों को देखते हुए वापिस हुए।

65और दोनों ने पाया हमारे भक्तों में से एक भक्त[1] को, जिसे हमने अपनी विशेष दया प्रदान की थी और उसे अपने पास से कुछ विशेष ज्ञान दिया था।

66मूसा ने उससे कहाः क्या मैं आपका अनुसरण करूँ, ताकि मुझे भी उस भलाई में से कुछ सिखा दें, जो आपको सिखाई गई है

67उसने कहाः तुम मेरे साथ धैर्य नहीं कर सकोगे।

68और कैसे धैर्य करोगे उस बात पर, जिसका तुम्हें पूरा ज्ञान नहीं

69उसने कहाः यदि अल्लाह ने चाहा, तो आप मुझे सहनशील पायेंगे और मैं आपकी किसी आज्ञा का उल्लंघन नहीं करूँगा।

70उसने कहाः यदि तुम्हें मेरा अनुसरण करना है, तो मुझसे किसी चीज़ के बारे में प्रश्न न करना, जब तक मैं स्वयं तुमसे उसकी चर्चा न करूँ।

71फिर दोनों चले, यहाँ तक कि जब दोनों नौका में सवार हुए, तो उस (ख़िज़्र) ने उसमें छेद कर दिया। मूसा ने कहाः क्या आपने इसमें छेदकर दिया, ताकि उसके सवारों को डुबो दें, आपने अनुचित काम कर दिया।

72उसने कहाः क्या मैंने तुमसे नहीं कहा था कि तुम मेरे साथ सहन नहीं कर सकोगे

73कहाः मुझे आप मेरी भूल पर न पकड़े और मेरी बात के कारण मुझे असुविधा में न डालें।

74फिर दोनों चले, यहाँ तक कि एक बालक से मिले, तो उस (ख़िज़्र) ने उसे वध कर दिया। मूसा ने कहाः क्या आपने एक निर्दोष प्राण ले लिया, वह भी किसी प्राण के बदले[1] नहीं? आपने बहुत ही बुरा काम किया।

75उसने कहाः क्या मैंने तुमसे नहीं कहा कि वास्तव में, तुम मेरे साथ धैर्य नहीं कर सकोगे

76मूसा ने कहाः यदि मैं आपसे प्रश्न करूँ, किसी विषय में इसके पश्चात्, तो मुझे अपने साथ न रखें। निश्चय आप मेरी ओर से याचना को पहुँच[1] चुके।

77फिर दोनो चले, यहाँ तक कि जब एक गाँव के वासियों के पास आये, तो उनसे भोजन माँगा। उन्होंने उनका अतिथि सत्कार करने से इन्कार कर दिया। वहाँ उन्होंने एक दीवार पायी, जो गिरा चाहती थी। उसने उसे सीधा कर दिया। कहाः यदि आप चाहते, तो इसपर पारिश्रमिक ले लेते।

78उसने कहाः ये मेरे तथा तुम्हारे बीच वियोग है। मैं तुम्हें उसकी वास्तविक्ता बताऊँगा, जिसे तुम सहन नहीं कर सके।

79रही नाव, तो वह कुछ निर्धनों की थी, जो सागर में काम करते थे। तो मैंने चाहा कि उसे छिद्रित[1] कर दूँ और उनके आगे एक राजा था, जो प्रत्येक (अच्छी) नाव का अपहरण कर लेता था।

80और रहा बालक, तो उसके माता-पिता ईमान वाले थे, अतः हम डरे कि उन्हें अपनी अवज्ञा और अधर्म से दुःख न पहुँचाये।

81इसलिए हमने चाहा कि उन दोनों को उनका पालनहार, इसके बदले उससे अधिक पवित्र और अधिक प्रेमी प्रदान करे।

82और रही दीवार, तो वह दो अनाथ बालकों की थी और उसके भीतर उनका कोष था और उनके माता-पिता पुनीत थे, तो तेरे पालनहार ने चाहा कि वे दोनों अपनी युवा अवस्था को पहुँचें और अपना कोष निकालें, तेरे पालनहार की दया से और मैंने ये अपने विचार तथा अधिकार से नहीं किया[1]। ये उसकी वास्तविक्ता है, जिसे तुम सहन नहीं कर सके।

83और (हे नबी!) वे आपसे ज़ुलक़रनैन[1] के विषय में प्रश्न करते हैं। आप कह दें कि मैं उनकी कुछ दशा तुम्हें पढ़कर सुना देता हूँ।

84हमने उसे धरती में प्रभुत्व प्रदान किया तथा उसे प्रत्येक प्रकार का साधन दिया।

85तो वह एक राह के पीछे लगा।

86यहाँ तक कि जब सूर्यास्त के स्थान तक[1] पहुँचा, तो उसने पाया कि वह एक काली कीचड़ के स्रोत में डूब रहा है और वहाँ एक जाति को पाया। हमने कहाः हे ज़ुलक़रनैन! तू उन्हें यातना दे अथवा उनमें अच्छा व्यवहार बना।

87उसने कहाः जो अत्याचार करेगा, हम उसे दण्ड देंगे। फिर वह अपने पालनहार की ओर फेरा[1] जायेगा, तो वह उसे कड़ी यातना देगा।

88परन्तु जो ईमान लाये तथा सदाचार करे, तो उसी के लिए अच्छा प्रतिफल (बदला) है और हम उसे अपना सरल आदेश देंगे।

89फिर वह एक (अन्य) राह की ओर लगा।

90यहाँ तक कि सूर्य़ोदय के स्थान तक पहुँचा। तो उसे पाया कि ऐसी जाति पर उदय हो रहा है, जिससे हमने उनके लिए कोई आड़ नहीं बनायी है।

91उनकी दशा ऐसी ही थी और उस (ज़ुलक़रनैन) के पास जो कुछ था, हम उससे पूर्णतः सूचित हैं।

92फिर वह एक दूसरी राह की ओर लगा।

93यहाँ तक कि जब दो पर्वतों के बीच पहुँचा, तो उन दोनों की उस ओर एक जाति को पाया, जो नहीं समीप थी कि किसी बात को समझे[1]।

94उन्होंने कहाः हे ज़ुलक़रनैन! वास्तव में, याजूज तथा माजूज उपद्रवी हैं, इस देश में। तो क्या हम निर्धारित कर दें आपके लिए कुछ धन। इसलिए कि आप हमारे और उनके बीच कोई रोक (बन्ध) बना दें

95उसने कहाः जो कुछ मुझे मेरे पालनहार ने प्रदान किया है, वह उत्तम है। तो तुम मेरी सहायता बल और शक्ति से करो, मैं बना दूँगा तुम्हारे और उनके मध्य एक दृढ़ भीत।

96मुझे लोहे की चादरें ला दो और जब दोनों पर्वतों के बीच दीवार तैयार कर दी, तो कहा कि आग दहकाओ, यहाँतक कि जब उस दीवार को आग (के समान लाल) कर दिया, तो कहाः मेरे पास लाओ, इसपर पिघला हुआ ताँबा उंडेल दूँ।

97फिर वह उसपर चढ़ नहीं सकते थे और न उसमें कोई सेंध लगा सकते थे।

98उस (ज़ुलक़रनैन) ने कहाः ये मेरे पालनहार की दया है। फिर जब मेरे पालनहार का वचन[1] आयेगा, तो वह इसे खण्ड-खण्ड कर देगा और मेरे पालनहार का वचन सत्य है।

99और हम छोड़ देंगे उस[1] दिन लोगों को एक-दूसरे में लहरें लेते हुए तथा निरसिंघा में फूंक दिया जायेगा और हम सबको एकत्र कर देंगे।

100और हम सामने कर देंगे उस दिन नरक को काफ़िरों के समक्ष।

101जिनकी आँखें मेरी याद से पर्दे में थीं और कोई बात सुन नहीं सकते थे।

102तो क्या उन्होंने सोचा है जो काफ़िर हो गये कि वे बना लेंगे मेरे दासों को मेरे सिवा सहायक? वास्तव में, हमने काफ़िरों के आतिथ्य के लिए नरक तैयार कर दी है।

103आप कह दें कि क्या हम तुम्हें बता दें कि कौन अपने कर्मों में सबसे अधिक क्षतिग्रस्त हैं

104वह हैं, जिनके सांसारिक जीवन के सभी प्रयास व्यर्थ हो गये तथा वे समझते रहे कि वे अच्छे कर्म कर रहे हैं।

105यही वे लोग हैं, जिन्होंने नहीं माना अपने पालनहार की आयतों तथा उससे मिलने को, अतः हम प्रलय के दिन उनका कोई भार निर्धारित नहीं करेंगे[1]।

106उन्हीं का बदला नरक है, इस कारण कि उन्होंने कुफ़्र किया और मेरी आयतों और मेरे रसूलों का उपहास किया।

107निश्चय जो ईमान लाये और सदाचार किये, उन्हीं के आतिथ्य के लिए फ़िरदौस[1] के बाग़ होंगे।

108उसमें वे सदावासी होंगे, उसे छोड़कर जाना नहीं चाहेंगे।

109(हे नबी!) आप कह दें कि यदि सागर मेरे पालनहार की बातें लिखने के लिए स्याही बन जायेँ, तो सागर समाप्त हो जायें इससे पहले कि मेरे पालनहार की बातें समाप्त हों, यद्यपि उतनी ही स्याही और ले आयें।

110आप कह देः मैंतो तुम जैसा एक मनुष्य पुरुष हूँ, मेरी ओर प्रकाशना (वह़्यी) की जाती है कि तुम्हारा पूज्य बस एक ही पूज्य है। अतः, जो अपने पालनहार से मिलने की आशा रखता हो, उसे चाहिए कि सदाचार करे और साझी न बनाये अपने पालनहार की इबादत (वंदना) में किसी को।

स्रोत: Maulana Azizul Haque Al Umari

WEBREATH · 11:11

«यदि तुम कृतज्ञ बनोगे, तो तुम्हें और अधिक दूँगा» — क़ुरआन 14:7

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं