17. अल-इसरा
1पवित्र है वह जिसने रात्रि के कुछ क्षण में अपने भक्त[1] को मस्जिदे ह़राम (मक्का) से मस्जिदे अक़्सा तक यात्रा कराई। जिसके चतुर्दिग हमने सम्पन्नता रखी है, ताकि उसे अपनी कुछ निशानियों का दर्शन कराएँ। वास्तव में, वह सब कुछ सुनने-जानने वाला है।
2और हमने मूसा को पुस्तक प्रदान की और उसे बनी इस्राईल के लिए मार्गदर्शन का साधन बनाया कि मेरे सिवा किसी को कार्यसाधक[1] न बनाओ।
3हे उनकी संतति जिन्हें हमने नूह़ के साथ (नौका) में सवार किया। वास्तव में, वह अति कृतज्ञ[1] भक्त था।
4और हमने बनी इस्राईल को, उनकी पुस्तक में सूचित कर दिया था कि तुम इस[1] धरती में दो बार उपद्रव करोगे और बड़ा अत्याचार करोगे।
5तो जब प्रथम उपद्रव का समय आया, तो हमने तुमपर अपने प्रबल योध्दा भक्तों को भेज दिया, जो नगरों में घुस गये और इस वचन को पूरा होना ही[1] था।
6फिर हमने उनपर तुम्हें पुनः प्रभुत्व दिया तथा धनों और पुत्रों द्वारा तुम्हारी सहायता की और तुम्हारी संख्या बहुत अधिक कर दी।
7यदि तुम भला करोगे, तो अपने लिए और यदि बुरा करोगे, तो अपने लिए। फिर जब दूसरे उपद्रव का समय आया ताकि (शत्रु) तुम्हारे चेहरे बिगाड़ दें और मस्जिद (अक़्सा) में वैसे ही प्रवेश कर जायेँ, जैसे प्रथम बार प्रवेश कर गये और ताकि जो भी उनके हाथ आये, उसे पूर्णता नाश[1] कर दे।
8संभव है कि तुम्हारा पालनहार तुमपर दया करे और यदि तुम प्रथम स्थिति पर आ गये, तो हमभी फिर[1] आयेंगे और हमने नरक को काफ़िरों के लिए कारावास बना दिया है।
9वास्तव में, ये क़ुर्आन वह डगर दिखाता है, जो सबसे सीधी है और उन ईमान वालों को शुभ सूचना देता है, जो सदाचार करते हैं कि उन्हीं के लिए बहुत बड़ा प्रतिफल है।
10और जो आख़िरत (परलोक) पर ईमान नहीं लाते, हमने उनके लिए दुःखदायी यातना तैयार कर रखी है।
11और मनुष्य (क्षुब्ध होकर) अभिशाप करने लगता[1] है, जैसे भलाई के लिए प्रार्थना करता है और मनुष्य बड़ा ही उतावला है।
12और हमने रात्री तथा दिवस को दो प्रतीक बनाया, फिर रात्री के प्रतीक को हमने अन्धकार बनाया तथा दिवस के प्रतीक को प्रकाशयुक्त, ताकि तुम अपने पालनहार के अनुग्रह की (जीविका) की खोज करो और वर्षों तथा ह़िसाब की गिनती जानो तथा हमने प्रत्येक चीज़ का सविस्तार वर्णन कर दिया।
13और प्रत्येक मनुष्य के कर्मपत्र को हमने उसके गले का हार बना दिया है और हम उसके लिए प्रलय के दिन एक कर्मलेख निकालेंगे, जिसे वह खुला हुआ पायेगा।
14अपना कर्मलेख पढ़ लो, आज तू स्वयं अपना ह़िसाब लेने के लिए पर्याप्त है।
15जिसने सीधी राह अपनायी, उसने अपने ही लिए सीधी राह अपनायी और जो सीधी राह से विचलित हो गया, उसका (दुष्परिणाम) उसीपर है और कोई दूसरे का बोझ (अपने ऊपर) नहीं लादेगा[1] और हम यातना देने वाले नहीं हैं, जब तक कि कोई रसूल न भेजें[2]।
16और जब हम किसी बस्ती का विनाश करना चाहते हैं, तो उसके सम्पन्न लोगों को आदेश[1] देते हैं, फिर वे उसमें उपद्व करने लगते[2] हैं, तो उसपर यातना की बात सिध्द हो जाती है और हम उसका पूर्णता उनसूलन कर देते हैं।
17और हमने बहुत-सी जातियों का नूह़ के पश्चात् विनाश किया है और आपका पालनहार अपने दासों के पापों से सूचित होने-देखने को बहुत है।
18जो संसार ही चाहता हो, हम उसे यहीं दे देते हैं, जो हम चाहते हैं, जिसके लिए चाहते हैं। फिर हम उसका परिणाम (परलोक में) नरक बना देते हैं, जिसमें वह निंदित-तिरस्कृत होकर प्रवेश करेगा।
19तथा जो परलोक चाहता हो और उसके लिए प्रयास करता हो और वह एकेश्वरवादी हो, तो वही हैं, जिनके प्रयास का आदर सम्मान किया जायेगा।
20हम प्रत्येक की सहायता करते हैं, इनकी भी और उनकी भी और आपके पालनहार का प्रदान (किसी से) निषेधित (रोका हुआ) नहीं[1] है।
21आप विचार करें कि कैसे हमने (संसार में) उनमें से कुछ को कुछ पर प्रधानता दी है और निश्चय परलोक के पद और प्रधानता और भी अधिक होगी।
22(हे मानव!) अल्लाह के साथ कोई दूसरा पूज्य न बना, अन्यथा बुरा और असहाय होकर रह जायेगा।
23और (हे मनुष्य!) तेरे पालनहार ने आदेश दिया है कि उसके सिवा किसी की इबादत (वंदना) न करो तथा माता-पिता के साथ उपकार करो, यदि तेरे पास दोनों में से एक वृध्दावस्था को पहुँच जाये अथवा दोनों, तो उन्हें उफ़ तक न कहो और न झिड़को और उनसे सादर बात बोलो।
24और उनके लिए विनम्रता का बाज़ू दया से झुका[1] दो और प्रार्थना करोः हे मेरे पालनहार! उन दोनों पर दया कर, जैसे उन दोनों ने बाल्यावस्था में, मेरा लालन-पालन किया है।
25तुम्हारा पालनहार अधिक जानता है, जो कुछ तुम्हारी अन्तरात्माओं (मन) में है। यदि तुम सदाचारी रहे, तो वह अपनी ओर ध्यानमग्न रहने वालों के लिए अति क्षमावान् है।
26और समीपवर्तियों को उनका स्वत्व (हिस्सा) दो तथा दरिद्र और यात्री को और अपव्यय[1] न करो।
27वास्तव में, अपव्ययी शैतान के भाई हैं और शैतान अपने पालनहार का अति कृतघ्न है।
28और यदि आप उनसे विमुख हों, अपने पालनहार की दया की खोज के लिए जिसकी आशा रखते हों, तो उनसे सरल[1] बात बोलें।
29और अपना हाथ अपनी गर्दन से न बाँध[1] लो और न उसे पूरा खोल दो कि निन्दित, विवश होकर रह जाओ।
30वास्तव में, आपका पालनहार ही विस्तृत कर देता है जीविका को जिसके लिए चाहता है, तथा संकीर्ण कर देता है। वास्तव में, वही अपने दासों (बंदों) से अति सूचित[1] देखने वाला[2] है।
31और अपनी संतान को निर्धन हो जाने के भय से वध न करो, हम उन्हें तथा तुम्हें जीविका प्रदान करेंगे, वास्तव में, उन्हें वध करना महा पाप है।
32और व्यभिचार के समीप भी न जाओ, वास्तव में, वह निर्लज्जा तथा बुरी रीति है।
33और किसी प्राण को जिसे अल्लाह ने ह़राम (अवैध) किया है, वध न करो, परन्तु धर्म विधान[1] के अनुसार और जो अत्याचार से वध (निहत) किया गया, हमने उसके उत्तराधिकारी को अधिकार[2] प्रदान किया है। अतः वह वध करने में अतिक्रमण[3] न करे, वास्तव में, उसे सहायता दी गयी है।
34और अनाथ के धन के समीप भी न जाओ, परन्तु ऐसी रीति से, जो उत्तम हो, यहाँ तक कि वह अपनी युवा अवस्था को पहुँच जाये और वचन पूरा करो, वास्तव में, वचन के विषय में प्रश्न किया जायेगा।
35और पूरा नापकर दो, जब नापो और सह़ीह़ तराजू से तोलो। ये अधिक अच्छा और इसका परिणाम उत्तम है।
36और ऐसी बात के पीछे न पड़ो, जिसका तुम्हें कोई ज्ञान न हो, निश्चय कान तथा आँख और दिल, इन सबके बारे में (प्रलय के दिन) प्रश्न किया जायेगा[1]।
37और धरती में अकड़कर न चलो, वास्तव में, न तुम धरती को फाड़ सकोगे और न लम्बाई में पर्वतों तक पहुँच सकोगे।
38ये सब बातें हैं। इनमें बुरी बात आपके पालनहार को अप्रिय हैं।
39ये तत्वदर्शिता की वो बातें हैं, जिनकी वह़्यी (प्रकाशना) आपकी ओर आपके पालनहार ने की है और अल्लाह के साथ कोई दूसरा पूज्य न बना लेना, अन्यथा नरक में निन्दित तिरस्कृत करके फेंक दिये जाओगे।
40क्या तुम्हारे पालनहार ने तुम्हें पुत्र प्रदान करने के लिए विशेष कर लिया है और स्वयं फ़रिश्तों को पुत्रियाँ बना लिया है? वास्तव में, तुम बहुत बड़ी बात कह रहे हो[1]।
41और हमने विविध प्रकार से इस क़ुर्आन में (तथ्यों का) वर्णन कर दिया है, ताकि लोग शिक्षा ग्रहण करें, परन्तु उसने उनकी घृणा को और अधिक कर दिया।
42आप कह दें कि यदि अल्लाह के साथ दूसरे पूज्य होते, जैसा कि वे (मिश्रणवादी) कहते हैं, तो वे अर्श (सिंहासन) के स्वामी (अल्लाह) की ओर अवश्य कोई राह[1] खोजते।
43वह पवित्र और बहुत उच्च है, उन बातों से जिन्हें वे बनाते हैं।
44उसकी पवित्रता का वर्णन कर रहे हैं सातों आकाश तथा धरती और जो कुछ उनमें है और नहीं है कोई चीज़ परन्तु वह उसकी प्रशंसा के साथ उसकी पवित्रता का वर्णन कर रही है, किन्तु तुम उनके पवित्रता गान को समझते नहीं हो। वास्तव में, वह अति सहिष्णु, क्षमाशील है।
45और जब आप क़ुर्आन पढ़ते हैं, तो हम आपके बीच और उनके बीच, जो आख़िरत (परलोक) पर ईमान नहीं लाते, एक छुपा हुआ आवरण (पर्दा) बना देते[1] हैं।
46तथा उनके दिलों पर ऐसे खोल चढ़ा देते हैं कि उस (क़ुर्आन) को न समझें और उनके कानों में बोझ और जब आप अपने अकेले पालनहार की चर्चा क़ुर्आन में करते हैं, तो वह घृणा से मुँह फेर लेते हैं।
47और हम उनके विचारों से भली-भाँति अवगत हैं, जब वे कान लगाकर आपकी बात सुनते हैं और जब वे आपस में कानाफूसी करते हैं, जब वे अत्याचारी कहते हैं कि तुम लोग तो बस एक जादू किये हुए व्यक्ति का अनुसरण[1] करते हो।
48सोचिए कि वे आपके लिए कैसे उदाहरण दे रहे हैं? अतः वे कुपथ हो गये, वे सीधी राह नहीं पा सकेंगे।
49और उन्होंने कहाः क्या हम, जब अस्थियाँ और चूर्ण-विचूर्ण हो जायेंगे तो क्या हम वास्तव में, नई उत्पत्ति में पुनः जीवित कर दिये[1] जायेंगे
50आप कह दें कि पत्थर बन जाओ या लोहा।
51अथवा कोई उत्पत्ति, जो तुम्हारे मन में इससे बड़ी हो। फिर वे पूछते हैं कि कौन हमें पुनः जीवित करेगा? आप कह दें: वही, जिसने प्रथम चरण में तुम्हारी उत्पत्ति की है। फिर वे आपके आगे सिर हिलायेंगे[1] और कहेंगेः ऐसा कब होगा? आप कह दें कि संभवता वह समीप ही है।
52जिस दिन वह तुम्हें पुकारेगा, तो तुम उसकी प्रशंसा करते हुए स्वीकार कर लोगे[1] और ये सोचोगे कि तुम (संसार में) थोड़े ही समय रहे हो।
53और आप मेरे भक्तों से कह दें कि वह बात बोलें, जो उत्तम हो, वास्तव में, शैतान उनके बीच बिगाड़ उत्पन्न करना चाहता[1] है। निश्चय शैतान मनुष्य का खुला शत्रु है।
54तुम्हारा पालनहार, तुमसे भली-भाँति अवगत है, यदि चाहे, तो तुमपर दया करे अथवा यदि चाहे, तो तुम्हें यातना दे और हमने आपको उनपर निरीक्षक बनाकर नहीं भेजा[1] है।
55(हे नबी!) आपका पालनहार भली-भाँति अवगत है उससे, जो आकाशों तथा धरती में है और हमने प्रधानता दी है कुछ नबियों को कुछ पर और हमने दावूद को ज़बूर (पुस्तक) प्रदान की।
56आप कह दें कि उन्हें पुकारो, जिन्हें उस (अल्लाह) के सिवा (पूज्य) समझते हो। न वे तुमसे दुःख दूर कर सकते और न (तुम्हारी दशा) बदल सकते हैं।
57वास्तव में, जिन्हें ये लोग[1] पुकारते हैं, वे स्वयं अपने पालनहार का सामीप्य प्राप्त करने का साधन[2] खोजते हैं कि कौन अधिक समीप है? और उसकी दया की आशा रखते हैं और उसकी यातना से डरते हैं। वास्तव में, आपके पालनहार की यातना डरने योग्य है।
58और कोई (अत्याचारी) बस्ती नहीं है, परन्तु हम उसे प्रलय के दिन से पहले ध्वस्त करने वाले या कड़ी यातना देने वाले हैं। ये (अल्लाह के) लेख में अंकित है।
59और हमें नहीं रोका इससे कि हम निशानियाँ भेजें, किन्तु इस बात ने कि विगत लोगों ने उन्हें झुठला[1] दिया और हमने समूद को ऊँटनी का खुला चमत्कार दिया, तो उन्होंने उसपर अत्याचार किया और हम चमत्कार डराने के लिए ही भेजते हैं।
60और (हे नबी!) याद करो, जब हमने आपसे कह दिया था कि आपके पालनहार ने लोगों को अपने नियंत्रण में ले रखा है और ये जो कुछ हमने आपको दिखाया,[1] उसको और उस वृक्ष को जिसपर क़ुर्आन में धिक्कार की गयी है, हमने लोगों के लिए एक परीक्षा बना दिया[2] है और हम उन्हें चेतावनी पर चेतावनी दे रहे हैं, फिर भी ये उनकी अवज्ञा को ही अधिक करती जा रही है।
61और (याद करो), जब हमने फ़रिश्तों से कहा कि आदम को सज्दा करो, तो इब्लीस के सिवा सबने सज्दा किया। उसने कहाः क्या मैं उसे सज्दा करूँ, जिसे तूने गारे से उत्पन्न किया है
62(तथा) उसने कहाः तू बता, क्या यही है, जिसे तूने मुझपर प्रधानता दी है? यदि तूने मुझे प्रलय के दिन तक अवसर दिया, तो मैं उसकी संतति को अपने नियंत्रण में कर लूँगा[1] कुछ के सिवा।
63अल्लाह ने कहाः "चले जाओ", जो उनमें से तेरा अनुसरण करेगा, तो निश्चय नरक तुमसबका प्रतिकार (बदला) है, भरपूर बदला।
64तू उनमें से जिसे हो सके, अपनी ध्वनि[1] से बहका ले और उनपर अपनी सवार और पैदल (सेना) चढ़ा[2] ले और उनका (उनके) धनों और संतानों में साझी बन[3] जा तथा उन्हें (मिथ्या) वचन दे और शैतान उन्हें धोखे के सिवा (कोई) वचन नहीं देता।
65वास्तव में, जो मेरे भक्त हैं, उनपर तेरा कोई वश नहीं चल सकता और आपके पालनहार का सहायक होना ये बहुत है।
66तुम्हारा पालनहार तो वह है, जो तुम्हारे लिए सागर में नौका चलाता है, ताकि तुम उसकी जीविका की खोज करो, वास्तव में, वह तुम्हारे लिए अति दयावान् है।
67और जब सागर में तुमपर कोई आपदा आ पड़ती है, तो अल्लाह के सिवा जिन्हें तुम पुकारते हो, खो देते (भूल जाते) हो[1] और जब तुम्हें बचाकर थल तक पहुँचा देता है, तो मुख फेर लेते हो और मनुष्य है ही अति कृतघ्न।
68क्या तुम निर्भय हो गये हो कि अल्लाह तुम्हें थल (धरती) ही में धंसा दे अथवा तुमपर फथरीली आँधी भेज दे? फिर तुम अपना कोई रक्षक न पाओ।
69या तुम निर्भय हो गये हो कि फिर उस (सागर) में तुम्हें दूसरी बार ले जाये, फिर तुमपर वायु का प्रचण्ड झोंका भेज दे, फिर तुम्हें डुबा दे, उस कुफ़्र के बदले, जो तुमने किया है। फिर तुम अपने लिए उसे नहीं पाओगे, जो हमपर इसका दोष[1] धरे।
70और हमने बनी आदम (मानव) को प्रधानता दी और उन्हें थल और जल में सवार[1] किया और उन्हें स्वच्छ चीज़ों से जीविका प्रदान की और हमने उन्हें बहुत-सी उन चीज़ों पर प्रधानता दी, जिनकी हमने उत्पत्ति की है।
71जिस दिन हम, सब लोगों को उनके अग्रणी के साथ बुलायेंगे, तो जिनका कर्मलेख उनके सीधे हाथ में दिया जायेगा, तो वही अपना कर्मलेख पढ़ेंगे और उनपर धागे बराबर भी अत्याचार नहीं किया जायेगा।
72और जो इस (संसार) में अंधा[1] रह गया, तो वह आख़िरत (परलोक) में भी अन्धा और अधिक कुपथ होगा।
73और (हे नबी!) वह (काफ़िर) समीप था कि आपको उस वह़्यी से फेर दें, जो हमने आपकी ओर भेजी है, ताकि आप हमारे ऊपर अपनी ओर से कोई दूसरी बात घड़ लें और उस समय वे आपको अवश्य अपना मित्र बना लेते।
74और यदि हम आपको सुदृढ़ न रखते, तो आप उनकी ओर कुछ न कुछ झुक जाते।
75तब हम आपको जीवन की दुगुनी तथा मरण की दोहरी यातना चखाते। फिर आप अपने लिए हमारे ऊपर कोई सहायक न पाते।
76और समीप है कि वे आपको इस धरती (मक्का) से विचला दें, ताकि आपको उससे निकाल दें, तब व आपके पश्चात् कुछ ही दिन रह सकेंगे।
77ये[1] उसके लिए नियम रहा है, जिसे हमने आपसे पहले अपने रसूलों में से भेजा है और आप हमारे नियम में कोई परिवर्तन नहीं पायेंगे।
78आप नमाज़ की स्थापना करें, सूर्यास्त से रात के अन्धेरे[1] तक तथा प्रातः (फ़ज्र के समय) क़ुर्आन पढ़िये। वास्तव में, प्रातः क़ुर्आन पढ़ना उपस्थिति का समय[2] है।
79तथा आप रात के कुछ समय जागिए, फिर "तह़जुद[1]" पढ़िये। ये आपके लिए अधिक (नफ़्ल) है। संभव है आपका पालनहार आपको "मक़ामे मह़मूद[2]" प्रदान कर दे।
80और प्रार्थना करें कि मेरे पालनहार! मुझे प्रवेश[1] दे सत्य के साथ, निकाल सत्य के साथ तथा मेरे लिए अपनी ओर से सहायक प्रभुत्व बना दे।
81तथा कहिए कि सत्य आ गया और असत्य ध्वस्त-निरस्त हो गया, वास्तव में, असत्य को धवस्त-निरस्त होना ही है[1]।
82और हम क़ुर्आन में से वह चीज़ उतार रहे हैं, जो आरोग्य तथा दया है, ईमान वालों के लिए और वह अत्याचारियों की क्षति को ही अधिक करता है।
83और जब हम मानव पर उपकार करते हैं, तो मुख फेर लेता है और दूर हो जाता[1] है तथा जब उसे दुःख पहुँचता है, तो निराश हो जाता है।
84आप कह दें कि प्रत्येक अपनी आस्था के अनुसार कर्म कर रहा है, तो आपका पालनहार ही भली-भाँति जान रहा है कि कौन अधिक सीधी डगर पर है।
85(हे नबी!) लोग आपसे रूह़[1] के विषय में पूछते हैं, आप कह दें: रूह़ मेरे पालनहार के आदेश से है और तुम्हें जो ज्ञान दिया गया, वह बहुत थोड़ा है।
86और यदि हम चाहें, तो वह सब कुछ ले जायें, जो आपकी ओर हमने वह़्यी किया है, फिर आप हमपर अपना कोई सहायक नहीं पायेंगे।
87किन्तु आपके पालनहार की दया के कारण (ये आपको प्राप्त है)। वास्तव में, उसका प्रदान आपपर बहुत बड़ा है।
88आप कह दें: यदि सब मनुष्य तथा जिन्न इसपर एकत्र हो जायें कि इस क़ुर्आन के समान ले आयेंगे, तो इसके समान नहीं ला सकेंगे, चाहे वे एक-दूसरे के समर्थक ही क्यों न हो जायें
89और हमने लोगों के लिए इस क़ुर्आन में प्रत्येक उदाहरण विविध शैली में वर्णित किया है, फिर भी अधिक्तर लोगों ने कुफ़्र के सिवा अस्वीकार ही किया है।
90और उन्होंने कहाः हम आपपर कदापि ईमान नहीं लायेंगे, यहाँ तक कि आप हमारे लिए धरती से एक चश्मा प्रवाहित कर दें।
91अथवा आपके लिए खजूर अथवा अंगूर का कोई बाग़ हो, फिर उसके बीच आप नहरें प्रवाहित कर दें।
92अथवा हमपर आकाश को जैसा आपका विचार है, खण्ड-खण्ड करके गिरा दें या अल्लाह और फ़रिश्तों को साक्षात हमारे सामने ले आयें।
93अथवा आपके लिए सोने का एक घर हो जाये अथवा आकाश में चढ़ जायें और हम आपके चढ़ने का भी कदापि विश्वास नहीं करेंगे, यहाँ तक की हमपर एक पुस्तक उतार लायें, जिसे हम पढ़ें। आप कह दें कि मेरा पालनहार पवित्र है, मैंतो बस एक रसूल (संदेशवाहक) मनुष्य[1] हूँ।
94और नहीं रोका लोगों को कि वे ईमान लायें, जब उनके पास मार्गदर्शन[1] आ गया, परन्तु इसने कि उन्होंने कहाः क्या अल्लाह ने एक मनुष्य को रसूल बनाकर भेजा है
95(हे नबी!) आप कह दें कि यदि धरती में फ़रिश्ते निश्चिन्त होकर चलते-फिरते होते, तो हम अवश्य उनपर आकाश से कोई फ़रिश्ता रसूल बनाकर उतारते।
96आप कह दें कि मेरे और तुम्हारे बीच अल्लाह का साक्ष्य[1] बहुत है। वास्तव में, वह अपने दासों (बन्दों) से सूचित, सबको देखने वाला है।
97जिसे अल्लाह सुपथ दिखा दे, वही सुपथगामी है और जिसे कुपथ कर दे, तो आप कदापि नहीं पायेंगे, उनके लिए उसके सिवा कोई सहायक और हम उन्हें एकत्र करेंगे प्रलय के दिन उनके मुखों के बल, अंधे, गूँगे और बहरे बनाकर और उनका स्थान नरक है, जबभी वह बुझने लगेगी, तो हम उसे और भड़का देंगे।
98यही उनका प्रतिकार (बदला) है, इसलिए कि उन्होंने हमारी आयतों के साथ कुफ़्र किया और कहाः क्या जब हम अस्थियाँ और चूर-चूर हो जायेंगे, तो नई उत्पत्ति में पुणः जीवित किये जायेंगे
99क्या वे विचार नहीं करते कि जिस अल्लाह ने आकाशों तथा धरती की उत्पत्ति की है, वह समर्थ है इस बात पर कि उनके जैसी उत्पत्ति कर दे[1]? तथा उसने उनके लिए एक निर्धारित अवधि बनायी है, जिसमें कोई संदेह नहीं। फिर भी अत्याचारियों ने कुफ़्र के सिवा अस्वीकार ही किया।
100आप कह दें कि यदि तुमही स्वामी होते, अपने पालनहार की दया के कोषों के, तबतो तुम खर्च हो जाने के भय से (अपने ही पास) रोक रखते और मनुष्य बड़ा ही कंजूस है।
101और हमने मूसा को नौ खुली निशानियाँ दीं[1], अतः बनी इस्राईल से आप पूछ लें, जब वह (मूसा) उनके पास आया, तो फ़िर्औन ने उससे कहाः हे मूसा! मैं समझता हूँ कि तुझपर जादू कर दिया गया है।
102उस (मूसा) ने उत्तर दियाः तुझे विश्वास है कि इन्हें आकाशों तथा धरती के पालनहार ही ने सोच-विचार करने के लिए उतारा है और हे फ़िर्औन! मैं तुम्हें निश्चय ध्वस्त समझता हूँ।
103अन्तताः उसने निश्चय किया कि उन[1] को धरती से[2] उखाड़ फेंके, तो हमने उसे और उसके सब साथियों को डुबो दिया।
104और हमने उसके पश्चात् बनी इस्राईल से कहाः तुम इस धरती में बस जाओ और जब आख़िरत के वचन का समय आयेगा, तो हम तुम्हें एकत्र कर लायेंगे।
105और हमने सत्य के साथ ही इस (क़ुर्आन) को उतारा है तथा ये सत्य के साथ ही उतरा है और हमने आपको बस शुभ सूचना देने तथा सावधान करने वाला बनाकर भेजा है।
106और इस क़ुर्आन को हमने थोड़ा-थोड़ा करके उतारा है, ताकि आप लोगों को इसे रुक-रुक कर सुनायें और हमने इसे क्रमशः[1] उतारा है।
107आप कह दें कि तुम इसपर ईमान लाओ अथवा न लाओ, वास्तव में, जिन्हें इससे पहले ज्ञान दिया[1] गया है, जब उन्हें ये सुनाया जाता है, तो वह मुँह के बल सज्दे में गिर जाते हैं।
108और कहते हैं: पवित्र है हमारा पालनहार! निश्चय हमारे पालनहार का वचन पूरा होकर रहा।
109और वह मुँह के बल रोते हुए गिर जाते हैं और वह उनकी विनय को अधिक कर देता है।
110हे नबी! आप कह दें कि (अल्लाह) कहकर पुकारो अथवा (रह़मान) कहकर पुकारो, जिस नाम से भी पुकारो, उसके सभी नाम शुभ[1] हैं और (हे नबी!) नमाज़ में स्वर न तो ऊँचा करो और न उसे नीचा करो और इन दोनों के बीच की राह[2] अपनाओ।
111तथा कहो कि सब प्रशंसा उस अल्लाह के लिए है, जिसके कोई संतान नहीं और न राज्य में उसका कोई साझी है और न अपमान से बचाने के लिए उसका कोई समर्थक है और आप उसकी महिमा का वर्णन करें।
WEBREATH · 11:11
«यदि तुम कृतज्ञ बनोगे, तो तुम्हें और अधिक दूँगा» — क़ुरआन 14:7
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं