16. अन-नहल
1अल्लाह का आदेश आ गया है। अतः (हे काफ़िरो!) उसके शीघ्र आने की माँग न करो। वह (अल्लाह) पवित्र तथा उस शिर्क (मिश्रणवाद) से ऊँचा है, जो वे कर रहे हैं।
2वह फ़रिश्तों को वह़्यी के साथ, अपने आदेश से, अपने जिस भक्त पर चाहता है, उतारता है कि (लोगों को) सावधान करो कि मेरे सिवा कोई पूज्य नहीं है, अतः मुझसे ही डरो।
3उसने आकाशों तथा धरती की उत्पत्ति सत्य के साथ की है, वह उनके शिर्क से बहुत ऊँचा है।
4उसने मनुष्य की उत्पत्ति वीर्य से की है, फिर वह अकस्मात् खुला झगड़ालू बन गया।
5तथा चौपायों की उत्पत्ति की, जिनमें तुम्हारे लिए गर्मी[1] और बहुत-से लाभ हैं और उनमें से कुछको खाते हो।
6तथा उनमें तुम्हारे लिए एक शोभा है, जिस समय संध्या को चराकर लाते हो और जब प्रातः चराने ले जाते हो।
7और वे तुम्हारे बोझ, उन नगरों तक लादकर ले जाते हैं, जिनतक तुम बिना कड़े परिश्रम के नहीं पहुँच सकते। वास्तव में, तुम्हारा पालनहार अति करुणामय, दयावान् है।
8तथा घोड़े, खच्चर और गधे पैदा किये, ताकि उनपर सवारी करो और (वे) शोभा (बनें) और (अल्लाह) ऐसी चीज़ों की उत्पत्ति करेगा, जिन्हें (अभी) तुम नहीं जानते हो[1]।
9और अल्लाह पर, सीधी राह बताना है और उनमें से कुछ[1] टेढ़े हैं तथा यदि अल्लाह चाहता, तो तुमसभी को सीधी राह दिखा देता।
10वही है, जिसने आकाश से जल बरसाया, जिसमें से कुछ तुम पीते हो तथा कुछसे वृक्ष उपजते हैं, जिसमें तुम (पशुओं को) चराते हो।
11और तुम्हारे लिए उससे खेती उपजाता है और ज़ैतून, खजूर, अंगूर और प्रत्येक प्रकार के फल। वास्तव में इस, में एक बड़ी निशानी है, उन लोगों के लिए, जो सोच-विचार करते हैं।
12और उसने तुम्हारे लिए रात्रि तथा दिवस को सेवा में लगा रखा है तथा सूर्य और चाँद को और (हाँ!) सितारे उसके आदेश के अधीन हैं। वास्तव में, इसमें कई निशानियाँ (लक्षण) हैं, उन लोगों के लिए, जो समझ-बूझ रखते हैं।
13(तथा जो तुम्हारे लिए धरती में विभिन्न रंगों की चीजें उत्पन्न की हैं, वास्तव में, इसमें एक बड़ी निशानी लक्षण) है, उन लोगों के लिए, जो शिक्षा ग्रहण करते हैं।
14और वही है, जिसने सागर को वश में कर रखा है, ताकि तुम उससे ताज़ा[1] मांस खाओ और उससे अलंकार[2] निकालो, जिसे पहनते हो तथा तुम नौकाओं को देखते हो कि सागर में (जल को) फाड़ती हुई चलती हैं और इसलिए ताकि तुम उस अल्लाह के अनुग्रह[3] की खोज करो और ताकि कृतज्ञ बनो।
15और उसने धरती में पर्वत गाड़ दिये, ताकि तुम्हें लेकर डोलने न लगे तथा नदियाँ और राहें, ताकि तुम राह पाओ।
16तथा बहुत-से चिन्ह (बना दिये) और वे सितारों से (भी) राह[1] पाते हैं।
17तो क्या, जो उत्पत्ति करता है, उसके समान है, जो उत्पत्ति नहीं करता? क्या तुम शिक्षा ग्रहण नहीं करते
18और यदि तुम अल्लाह के पुरस्कारों की गणना करना चाहो, तो कभी नहीं कर सकते। वास्तव में, अल्लाह बड़ा क्षमा तथा दया करने वाला है।
19तथा अल्लाह जानता है, जो तुम छुपाते हो और जो तुम व्यक्त करते हो।
20और जिन्हें वे अल्लाह के सिवा पुकारते हैं, वे किसी चीज़ की उत्पत्ति नहीं कर सकते। जबकि वे स्वयं उत्पन्न किये जाते हैं।
21वे निर्जीव प्राणहीन हैं और (ये भी) नहीं जानते कि कब पुनः जीवित किये जायेंगे।
22तुम्हारा पूज्य बस एक है, फिर जो लोग परलोक पर ईमान नहीं लाते, उनके दिल निवर्ती (विरोधी) हैं और वे अभिमानी हैं।
23जो कुछ वे छुपाते तथा व्यक्त करते हैं, निश्चय अल्लाह उसे जानता है। वास्तव में, वह अभिमानियों से प्रेम नहीं करता।
24और जब उनसे पूछा जाये कि तुम्हारे पालनहार ने क्या उतारा है[1]? तो कहते हैं कि पूर्वजों की कल्पित कथाएँ हैं।
25ताकि वे अपने (पापों का) पूरा बोझ प्रलय के दिन उठायें तथा कुछ उन लोगों का बोझ (भी), जिन्हें बिना ज्ञान के कुपथ कर रहे थे, सावधान! वे कितना बुरा बोझ उठायेंगे
26इनसे पहले के लोग भी षड्यंत्र रचते रहे, तो अल्लाह ने उनके षड्यंत्र के भवन का उनमूलन कर दिया, फिर ऊपर से उनपर छत गिर पड़ी और उनपर ऐसी दिशा से यातना आ गई, जिसे वे सोच भी नहीं रहे थे।
27फिर प्रलय के दिन उन्हें अपमानित करेगा और कहेगा कि मेरे वह साझी कहाँ हैं, जिनके लिए तुम झगड़ रहे थे? वे कहेंगेः जिन्हें ज्ञान दिया गया है कि वास्तव में, आज अपमान तथा बुराई (यातना) काफ़िरों के लिए है।
28जिनके प्राण फ़रिश्ते निकालते हैं, इस दशा में कि वे अपने ऊपर अत्याचार करने वाले हैं, तो वे आज्ञाकारी बन जाते[1] हैं, (कहते हैं कि) हम कोई बुराई (शिर्क) नहीं कर रहे थे। क्यों नहीं? वास्तव में, अल्लाह तुम्हारे कर्मों से भली-भाँति अवगत है।
29तो नरक के द्वारों में प्रवेश कर जाओ, उसमें सदावासी रहोगे, अतः क्या ही बुरा है अभिमानों का निवास स्थान
30और उनसे पूछा गया, जो अपने पालनहार से डरे कि तुम्हारे पालनहार ने क्या उतारा है? तो उन्होंने कहाः अच्छी चीज़ उतारी है। उनके लिए जिन्होंने इस लोक में सदाचार किये, बड़ी भलाई है और वास्तव में, परलोक का घर (स्वर्ग) अति उत्तम है और आज्ञाकारियों का आवास कितना अच्छा है
31सदा रहने के स्वर्ग जिसमें प्रवेश करेंगे, जिनमें नहरें बहती होंगी, उनके लिए उसमें जो चाहेंगे (मिलेगा)। इसी प्रकार, अल्लाह आज्ञाकारियों को प्रतिफल (बदला) देता है।
32जिनके प्राण फ़रिश्ते इस दशा में निकालते हैं कि वे स्वच्छ-पवित्र हैं, तो कहते हैं: "तुमपर शान्ति हो।" तुम अपने सुकर्मों के बदले स्वर्ग में प्रवेश कर जाओ।
33क्या वे इसकी प्रतीक्षा कर रहे हैं कि उनके पास फ़रिश्ते[1] आ जायें अथवा आपके पालनहार का आदेश[2] आ पहुँचे? ऐसे ही, उनसे पूर्व के लोगों ने किया और अल्लाह ने उनपर अत्याचार नहीं किया, परन्तु वे स्वयं अपने ऊपर अत्याचार कर रहे थे।
34तो उनके कुकर्मों की बुराईयाँ[1] उनपर आ पड़ीं और उन्हें उसी (यातना) ने घेर लिया, जिसका वे परिहास कर रहे थे।
35और कहा, जिन लोगों ने शिर्क (मिश्रणवाद) कियाः यदि अल्लाह चाहता, तो हम उसके सिवा किसी चीज़ की इबादत (वंदना) न करते, न हम और न हमारे बाप-दादा और न उसके आदेश के बिना किसी चीज़ को ह़राम (वर्जित) करते। ऐसे ही, इनसे पूर्व वाले लोगों ने किया। तो रसूलों पर केवल खुले रूप से उपदेश पहुँचा देना है।
36और हमने प्रत्येक समुदाय में एक रसूल भेजा कि अल्लाह की इबादत (वंदना) करो और ताग़ूत (असुर- अल्लाह के सिवा पूज्यों) से बचो, तो उनमें से कुछ को, अल्लाह ने सुपथ दिखा दिया और कुछ पर कुपथ सिध्द हो गया। तो धरती में चलो-फिरो, फिर देखो कि झुठलाने वालों का अन्त कैसा रहा
37(हे नबी!) आप ऐसे लोगों को सुपथ दिखाने पर लोलुप हों, तो भी अल्लाह उसे सुपथ नहीं दिखायेगा, जिसे कुपथ कर दे और न उनका कोई सहायक होगा।
38और उन (काफ़िरों) ने अल्लाह की भरपूर शपथ ली कि अल्लाह उसे पुनः जीवित नहीं करेगा, जो मर जाता है। क्यों नहीं? ये तो अल्लाह का अपने ऊपर सत्य वचन है, परन्तु अधिक्तर लोग नहीं जानते।
39(ऐसा करना इसलिए आवश्यक है) ताकि अल्लाह उस तथ्य को उजागर कर दे, जिसमें[1] वे विभेद कर रहे थे और ताकि काफ़िर जान लें कि वही झूठे थे।
40हमारा कथन, जब हम किसी चीज़ को अस्तित्व प्रदान करने का निश्चय करें, तो इसके सिवा कुछ नहीं होता कि उसे आदेश दें कि "हो जा" और वह हो जाती है।
41तथा जो लोग अल्लाह के लिए हिजरत (प्रस्थान) कर गये, अत्याचार सहने के पश्चात्, तो हम उन्हें संसार में अच्छा निवास्-स्थान देंगे और परलोक का प्रतिफल तो बहुत बड़ा है, यदि वे[1] जानते।
42जिन लोगों ने धैर्य धारण किया तथा अपने पालनहार पर ही वे भरोसा करते हैं।
43और (हे नबी!) हमने आपसे पहले जो भी रसूल भेजे, वे सभी मानव-पुरुष थे। जिनकी ओर हम वह़्यी (प्रकाशना) करते रहे। तो तुम ज्ञानियों से पूछ लो, यदि (स्वयं) नहीं[1] जानते।
44प्रत्यक्ष (खुले) प्रमाणों तथा पुस्तकों के साथ (उन्हें भेजा) और आपकी ओर ये शिक्षा (क़ुर्आन) अवतरित की, ताकि आप उसे सर्वमानव के लिए उजागर कर दें, जो कुछ उनकी ओर उतारा गया है, ताकि वे सोच-विचार करें।
45तो क्या वे निर्भय हो गये हैं, जिन्होंने बुरे षड्यंत्र रचे हैं कि अल्लाह उन्हें धरती में धंसा दे? अथवा उनपर यातना ऐसी दिशा से आ जाये, जिसे वे सोचते भी न हों
46या उन्हें चलते-फिरते पकड़ ले, तो वे (अल्लाह को) विवश करने वाले नहीं हैं।
47अथवा उन्हें भय की दशा में पकड़[1] ले? निश्चय तुम्हारा पालनहार अति करुणामय दयावान् है।
48क्या अल्लाह की उत्पन्न की हुई किसी चीज़ को उन्होंने नहीं देखा? जिसकी छाया दायें तथा बायें झुकती है, अल्लाह को सज्दा करते हुए? और वे सर्व विनयशील हैं।
49तथा अल्लाह ही को सज्दा करते हैं, जो आकाशों में तथा धरती में चर (जीव) तथा फ़रिश्ते हैं और वे अहंकार नहीं करते।
50वे[1] अपने पालनहार से डरते हैं, जो उनके ऊपर है और वही करते हैं, जो आदेश दिये जाते हैं।
51और अल्लाह ने कहाः दो पूज्य न बनाओ, वही अकेला पूज्य है। अतः तुम मुझी से डरो।
52और उसी का है, जो कुछ आकाशों तथा धरती में है और उसी की वंदना स्थायी है, तो क्या तुम अल्लाह के सिवा दूसरे से डरते हो
53तुम्हें, जोभी सुख-सुविधा प्राप्त है, वह अल्लाह ही की ओर से है। फिर जब तुम्हें दुःख पहुँचता है, तो उसी को पुकारते हो।
54फिर जब तुमसे दुःख दूर कर देता है, तो तुम्हारा एक समुदाय अपने पालनहार का साझी बनाने लगता है।
55ताकि हमने उन्हें, जो कुछ प्रदान किया है, उसके प्रति कृतघ्न हों, तो आनन्द ले लो, तुम्हें शीघ्र ही ज्ञान हो जायेगा।
56और वे जिन्हें जानते[1] तक नहीं, उनका एक भाग, उसमें से बनाते हैं, जो जीविका हमने उन्हें दी है। तो अल्लाह की शपथ! तुमसे अवश्य पूछा जायेगा, उसके विषय में, जो तुम झूठी बातें बना रहे थे
57और वे अल्लाह के लिए पुत्रियाँ बनाते[1] हैं, वह पवित्र है! और उनके लिए वह[2] है, जो वे स्वयं चाहते हों
58और जब उनमें से किसी को पुत्री (के जन्म) की शुभसूचना दी जाये, तो उसका मुख काला हो जाता है और वह शोकपूर्ण हो जाता है।
59और लोगों से छुपा फिरता है, उस बुरी सूचना के कारण, जो उसे दी गयी है। (सोचता है कि) क्या[1] उसे अपमान के साथ रोक ले अथवा भूमि में गाड़ दे? देखो! वे कितना बुरा निर्णय करते हैं।
60उन्हीं के लिए जो आख़िरत (परलोक) पर ईमान नहीं रखते अपगुण है और अल्लाह के लिए सदगुण हैं तथा वह प्रभुत्वशाली, तत्वदर्शी है।
61और यदि अल्लाह, लोगों को उनके अत्याचार[1] पर (तत्क्षण) धरने लगे, तो धरती में किसी जीव को न छोड़े। परन्तु वह एक निर्धारित अवधि तक निलम्बित करता[2] है और जब उनकी अवधि आ जायेगी, तो एक क्षण न पीछे होंगे, न पहले।
62वह अल्लाह के लिए उसे[1] बनाते हैं, जिसे स्वयं अप्रिय समझते हैं तथा उनकी ज़ुबानें झूठ बोलती हैं कि उन्हीं के लिए भलाई है। निश्चय उन्हीं के लिए नरक है और वही सबसे पहले (नरक में) झोंके जायेंगे।
63अल्लाह की शपथ! (हे नबी!) आपसे पहले हमने बहुत-से समुदायों की ओर रसूल भेजे। तो उनके लिए शैतान ने उनके कुकर्मों को सुसज्जित बना दिया। अतः वही आज उनका सहायक है और उन्हीं के लिए दुःखदायी यातना है।
64और हमने आपपर ये पुस्तक (क़ुर्आन) इसी लिए उतारी है, ताकि आप उनके लिए उसे उजागर कर दें, जिसमें वे विभेद कर रहे हैं तथा मार्गदर्शन और दया है, उन लोगों के लिए, जो ईमान (विश्वास) रखते हैं।
65और अल्लाह ने ही आकाश से जल बरसाया, फिर उसने निर्जीव धरती को जीवित कर दिया। निश्चय इसमें उन लोगों के लिए एक निशानी है, जो सुनते हैं।
66तथा वास्तव में, तुम्हारे लिए पशुओं में एक शिक्षा है। हम तुम्हें उससे, जो उसके भीतर है, गोबर तथा रक्त के बीच से शुध्द दूध पिलाते हैं, जो पीने वालों के लिए रुचिकर होता है।
67तथा खजूरों और अंगूरों के फलों से, जिससे तुम मदिरा बना लेते हो तथा उत्तम जीविका भी, वास्तव में, इसमें एक निशानी (लक्षण) है, उन लोगों के लिए, जो समझ-बूझ रखते हैं।
68और हमने मधुमक्खी को प्रेरणा दी कि पर्वतों में घर (छत्ते) बना तथा वृक्षों में और लोगों की बनायी छतों में।
69फिर प्रत्येक फलों का रस चूस और अपने पालनहार की सरल राहों पर चलती रह। उसके भीतर से एक पेय निकलता है, जो विभिन्न रंगों का होता है, जिसमें लोगों के लिए आरोग्य है। वास्तव में, इसमें एक निशानी (लक्षण) है, उन लोगों के लिए, जो सोच-विचार करते हैं।
70और अल्लाह ही ने तुम्हारी उत्पत्ति की है, फिर तुम्हें मौत देता है और तुममें से कुछको अबोध आयु तक पहुँचा दिया जाता है, ताकि जानने के पश्चात् कुछ न जाने। वास्तव में, अल्लाह सर्वज्ञ, सर्व सामर्थ्यवान्[1] है।
71और अल्लाह ने तुममें से कुछ को, कुछ पर जीविका में प्रधानता दी है, तो जिन्हें प्रधानता दी गयी है, वे अपनी जीविका अपने दासों की ओर फेरने वाले नहीं कि वे उसमें बराबर हो जायें, तो क्या वे अल्लाह के उपकारों को नहीं मानते हैं
72और अल्लाह ने तुम्हारे लिए तुम्हीं में से पत्नियाँ बनायीं और तुम्हारे लिए तुम्हारी पत्नियों से पुत्र तथा पौत्र बनाये और तुम्हें स्वच्छ चीज़ों से जीविका प्रदान की। तो क्या वे असत्य पर विश्वास रखते हैं और अल्लाह के पुरस्कारों के प्रति अविश्वास रखते हैं
73और अल्लाह के सिवा उनकी वंदना करते हैं, जो उनके लिए आकाशों तथा धरती से कुछ भी जीविका देने का अधिकार नहीं रखते और न इसका सामर्थ्य रखते हैं।
74और अल्लाह के लिए उदाहरण न दो। वास्तव में, अल्लाह जानता है और तुम नहीं जानते[1]।
75अल्लाह ने एक उदाहरण[1] दिया है; एक प्राधीन दास है, जो किसी चीज़ का अधिकार नहीं रखता और दूसरा (स्वाधीन) व्यक्ति है, जिसे हमने अपनी ओर से उत्तम जीविका प्रदान की है और वह उसमें छुपे और खुले व्यय करता है। क्या वे दोनों समान हो जायेंगे? सब प्रशंसा अल्लाह[2] के लिए है। बल्कि अधिक्तर लोग (ये बात) नहीं जानते।
76तथा अल्लाह ने दो व्यक्तियों का उदाहरण दिया है; दोनों में से एक गूँगा है, वह किसी चीज़ का अधिकार नहीं रखता, वह अपने स्वामी पर बोझ है, वह उसे जहाँ भेजता है, कोई भलाई नहीं लाता। तो क्या वह और जो न्याय का आदेश देता हो और स्वयं सीधी[1] राह पर हो, बराबर हो जायेंगे
77और अल्लाह ही को आकाशों तथा धरती के परोक्ष[1] का ज्ञान है और प्रलय (क़्यामत) का विषय तो बस पलक झपकने जैसा[2] होगा अथवा उससे भी अधिक शीघ्र। वास्तव में, अल्लाह जो चाहे, कर सकता है।
78और अल्लाह ही ने तुम्हें तुम्हारी माताओं के गर्भों से निकाला, इस दशा में कि तुम कुछ नहीं जानते थे और तुम्हारे कान और आँख तथा दिल बनाये, ताकि तुम (उसका) उपकार मानो।
79क्या वे पक्षियों को नहीं देखते कि वे अंतरिक्ष में कैसे वशीभूत हैं? उन्हें अल्लाह ही थामता[1] है। वास्तव में, इसमें बहुत-सी निशानियाँ हैं, उन लोगों के लिए, जो ईमान लाते हैं।
80और अल्लाह ही ने तुम्हारे घरों को निवास स्थान बनाया और पशुओं की खालों से तुम्हारे लिए ऐसे घर[1] बनाये, जिन्हें तुम अपनी यात्रा तथा अपने विराम के दिन हल्का (अल्पभार) पाते हो और उनकी ऊन और रोम तथा बालों से उपक्रण और लाभ के सामान, जीवन की निश्चित अवधि तक के लिए (बनाये)।
81और अल्लाह ही ने तुम्हार लिए उस चीज़ में से, जो उत्पन्न की है, छाया बनायी है और तुम्हारे लिए पर्वतों में गुफाएँ बनायी हैं और तुम्हारे लिए ऐसे वस्त्र बनाये हैं, जो तुम्हे धूप से बचायें[1]। इसी प्रकार, वह तुमपर अपना उपकार पूरा करता है, ताकि तुम आज्ञाकारी बनो।
82फिर यदि वे विमुख हों, तो आपपर बस प्रत्यक्ष (खुला) उपदेश पहुँचा देना है।
83वे अल्लाह के उपकार पहचानते हैं, फिर उसका इन्कार करते हैं और उनमें अधिक्तर कृतघ्न हैं।
84और जिस[1] दिन, हम प्रत्येक समुदाय से एक साक्षी (गवाह) खड़ा[2] करेंगे, फिर काफ़िरों को बात करने की अनुमति नहीं दी जायेगी और न उनसे क्षमा याचना की माँग की जायेगी।
85और जब अत्याचारी यातना देखेंगे, उनकी यातना कुछ कम नहीं की जायेगी और न उन्हें अवकाश दिया[1] जायेगा।
86और जब मुश्रिक अपने (बनाये हुए) साझियों को देखेंगे, तो कहेंगेः हे हमारे पालनहार! यही हमारे साझी हैं, जिन्हें हम, तुझे छोड़कर पुकार रहे थे। तो वे (पूज्य) बोलेंगे कि निश्चय तुम सब मिथ्यावादी (झूठे) हो।
87उस दिन, वे अल्लाह के आगे झुक जायेंगे और उनसे खो जायेँगी, जो मिथ्या बातें वे बनाते थे।
88जो लोग काफिर हो गये और (दूसरों को भी) अल्लाह की डगर (इस्लाम) से रोक दिये, उन्हें हम यातना पर यातना देंगे, उस उपद्रव के बदले, जो वे कर रहे थे।
89और जिस दिन, हम प्रत्येक समुदाय से एक साक्षी उनके विरुध्द उन्हीं में से खड़ा कर देंगे और (हे नबी!) हम आपको उनपर साक्षी (गवाह) बनायेंगे[1] और हमने आपपर ये पुस्तक (क़ुर्आन) अवतरित की है, जो प्रत्येक विषय का खुला विवरण है, मार्गदर्शन दया तथा शुभ सूचना है आज्ञाकारियों के लिए।
90वस्तुतः, अल्लाह तुम्हें न्याय, उपकार और समीपवर्तियों को देने का आदेश दे रहा है और निर्लज्जा, बुराई और विद्रोह से रोक रहा है और तुम्हें सिखा रहा है, ताकि तुम शिक्षा ग्रहण करो।
91और जब अल्लाह से कोई वचन करो, तो उसे पूरा करो और अपनी शपथों को सुदृढ़ करने के पश्चात् भंग न करो, जब तुमने अल्लाह को अपने ऊपर गवाह बनाया है। निश्चय अल्लाह जो कुछ तुम करते हो, उसे जानता है।
92और तुम्हारी दशा उस स्त्री जैसी न हो जाये, जिसने अपना सूत कातने के पश्चात् उधेड़ दिया। तुम अपनी शपथों को आपस में विश्वासघात का साधन बनाते हो, ताकि एक समुदाय दूसरे समुदाय से अधिक लाभ प्राप्त करे। अल्लाह इस[1] (वचन) के द्वारा तुम्हारी परीक्षा ले रहा है और प्रलय के दिन तुम्हारे लिए अवश्य उसे उजागर कर देगा, जिसमें तुम विभेद कर रहे थे।
93और यदि अल्लाह चाहता, तो तुम्हें एक समुदाय बना देता। परन्तु वह जिसे चाहता है, कुपथ कर देता है और जिसे चाहता है, सुपथ दर्शा देता है और तुमसे उसके बारे में अवश्य पूछा जायेगा, जो तुम कर रहे थे।
94और अपनी शपथों को आपस में विश्वासघात का साधन न बनाओ, ऐसा न हो कि कोई पग अपने स्थिर (दृढ़) होने के पश्चात् (ईमान से) फिसल[1] जाये और तुम उसके बदले बुरा परिणाम चखो कि तुमने अल्लाह की राह से रोका है और तुम्हारे लिए बड़ी यातना हो।
95और अल्लाह से किये हुए वचन को तनिक मूल्य के बदले न बेचो[1]। वास्तव में, जो अल्लाह के पास है, वही तुम्हारे लिए उत्तम है, यदि तुम जानो।
96जो तुम्हारे पास है, वह व्यय (ख़र्च) हो जायेगा और जो अल्लाह के पास है, वह शेष रह जाने वाला है और हम, जो धैर्य धारण करते हैं, उन्हें अवश्य उनका पारिश्रमिक (बदला) उनके उत्तम कर्मों के अनुसार प्रदान करेंगे।
97जो भी सदाचार करेगा, वह नर हो अथवा नारी और ईमान वाला हो, तो हम उसे स्वच्छ जीवन व्यतीत करायेंगे और उन्हें उनका पारिश्रमिक उनके उत्तम कर्मों के अनुसार अवश्य प्रदान करेंगे।
98तो (हे नबी!) जब आप क़ुर्आन का अध्ययन करें, तो धिक्कारे हुए शैतान से अललाह की शरण[1] माँग लिया करें।
99वस्तुतः, उसका वश उनपर नहीं है, जो ईमान लाये हैं और अपने पालनहार ही पर भरोसा करते हैं।
100उसका वश तो केवल उनपर चलता है, जो उसे अपना संरक्षक बनाते हैं और जो मिश्रणवादी (मुश्रिक) हैं।
101और जब हम किसी आयत (विधान) के स्थान पर कोई आयत बदल देते हैं और अल्लाह ही अधिक जानता है उसे, जिसे वह उतारता है, तो कहते हैं कि आप तो केवल घड़ लेते हैं, बल्कि उनमें अधिक्तर जानते ही नहीं।
102आप कह दें कि इसे (रूह़ुल कुदुस)[1] ने आपके पालनहार की ओर से सत्य के साथ क्रमशः उतारा है, ताकि उन्हें सुदृढ़ कर दे, जो ईमान लाये हैं तथा मार्गदर्शन और शुभ सूचना है, आज्ञाकारियों के लिए।
103तथा हम जानते हैं कि वे (काफ़िर) कहते हैं कि उसे (नबी को) कोई मनुष्य सिखा रहा[1] है। जबकी उसकी भाषा जिसकी ओर संकेत करते हैं, विदेशी है और ये[2] स्पष्ट अरबी भाषा है।
104वास्तव में, जो अल्लाह की आयतों पर ईमान नहीं लाते, उन्हें अल्लाह सुपथ नहीं दर्शाता और उन्हीं के लिए दुःखदायी यातना है।
105झूठ केवल वही घड़ते हैं, जो अल्लाह की आयतों पर ईमान नहीं लाते और वही मिथ्यावादी (झूठे) हैं।
106जिसने अल्लाह के साथ कुफ़्र किया, अपने ईमान लाने के पश्चात्, परन्तु जो बाध्य कर दिया गया हो, इस दशा में कि उसका दिल ईमान से संतुष्ट हो, (उसके लिए क्षमा है)। परन्तु जिसने कुफ़्र के साथ सीना खोल दिया[1] हो, तो उन्हीं पर अल्लाह का प्रकोप है और उन्हीं के लिए महा यातना है।
107ये इसलिए कि उन्होंने सांसारिक जीवन को प्रलोक पर प्राथमिकता दी है और वास्तव में अल्लाह, काफ़िरों को सुपथ नहीं दिखाता।
108वही लोग हैं, जिनके दिलों, कानों और आँखों पर अल्लाह ने मुहर लगा दी है तथा यही लोग अचेत हैं।
109निश्चय वही लोग, प्रलोक में क्षतिग्रस्त होने वाले हैं।
110फिर वास्तव में, आपका पालनहार उन लोगों[1] के लिए जिन्होंने हिजरत (प्रस्थान) की और उसके पश्चात् परीक्षा में डाले गये, फिर जिहाद किया और सहनशील रहे, वास्तव में, आपका पालनहार इस (परीक्षा) के पश्चात् बड़ा क्षमाशील, दयावान् है।
111जिस दिन प्रत्येक प्राणी को अपने बचाव की चिन्ता होगी और प्रत्येक प्राणी को उसके कर्मों का पूरा बदला दिया जायेगा और उनपर अत्याचार नहीं किया जायेगा।
112अल्लाह ने एक बस्ती का उदाहरण दिया है, जो शान्त संतुष्ट थी, उसकी जीविका प्रत्येक स्थान से प्राचूर्य के साथ पहुँच रही थी, तो उसने अल्लाह के उपकारों के साथ कुफ़्र किया। तब अल्ल्लाह ने उसे भूख और भय का वस्त्र चखा[1] दिया, उसके बदले जो वह[2] कर रहे थे।
113और उनके पास एक[1] रसूल उन्हीं में से आया, तो उन्होंने उसे झुठला दिया। अतः उन्हें यातना ने पकड़ लिया और वे अत्याचारी थे।
114अतः उसमें से खाओ, जो अल्लाह ने तुम्हें ह़लाल (वैध) स्वच्छ जीविका प्रदान की है और अल्लाह का उपकार मानो, यदि तुम उसी की इबादत (वंदना) करते हो।
115जो कुछ उसने तुमपर ह़राम (अवैध) किया है, वह मुर्दार, रक्त और सुअर का मांस है और जिसपर अल्लाह के सिवा दूसरे का नाम लिया गया[1] हो, फिर जो भूख से आतुर हो जाये, इस दशा में कि वह नियम न तोड़ रहा[2] हो और न आवश्यक्ता से अधिक खाये, तो वास्तव में, अल्लाह अति क्षमाशील, दयावान् है।
116और मत कहो -उस झूठ के कारण, जो तुम्हारी ज़ुबानों पर आ जाये- कि ये ह़लाल (वैध) है और ये ह़राम (अवैध) है, ताकि अल्लाह पर मिथ्यारोप[1] करो। वास्तव में, जो लोग अल्लाह पर मिथ्यारोप करते हैं, वे (कभी) सफल नहीं होते।
117(इस मिथ्यारोपन का) लाभ तो थोड़ा है और उन्हीं के लिए (परलोक में) दुःखदायी यातना है।
118और उनपर, जो यहूदी हो गये, हमने उसे ह़राम (अवैध) कर दिया, जिसका वर्णन हमने इस[1] से पहले आपसे कर दिया है और हमने उनपर अत्याचार नहीं किया, परन्तु वे स्वयं अपने ऊपर अत्याचार कर रहे थे।
119फिर वास्तव में, आपका पालनहार उन्हें, जो अज्ञानता के कारण बुराई कर बैठे, फिर उसके पश्चात् क्षमा याचना कर ली और अपना सुधार कर लिया, वास्तव में, आपका पालनहार इसके पश्चात् अति क्षमी, दयावान् है।
120वास्तव में, इब्राहीम एक समुदाय[1] था, अल्लाह का आज्ञाकारी एकेश्वरवादी था और मिश्रणवादियों (मुश्रिकों) में से नहीं था।
121उसके उपकारों को मानता था, उसने उसे चुन लिया और उसे सीधी राह दिखा दी।
122और हमने उसे संसार में भलाई दी और वास्तव में वह परलोक में सदाचारियों में से होगा।
123फिर हमने (हे नबी!) आपकी और वह़्यी की कि एकेश्वरवादी इब्राहीम के धर्म का अनुसरण करो और वह मिश्रणवादियों में से नहीं था।
124सब्त[1] (शनिवार का दिन) तो उन्हीं पर, निर्धारित किया गया, जिन्होंने उसमें विभेद किया। और वस्तुतः, आपका पालनहार उनके बीच उसमें निर्णय कर देगा, जिसमें वे विभेद कर रहे थे।
125(हे नबी!) आप उन्हें अपने पालनहार की राह (इस्लाम) की ओर तत्वदर्शिता तथा सदुपदेश के साथ बुलाएँ और उनसे ऐसे अंदाज़ में शास्त्रार्थ करें, जो उत्तम हो। वास्तव में, अल्लाह उसे अधिक जानता है, जो उसकी राह से विचलित हो गया और वही सुपथों को भी अधिक जानता है।
126और यदि तुम लोग बदला लो, तो उतना ही लो, जितना तुम्हें सताया गया हो और यदि सहन कर जाओ, तो सहनशीलों के लिए यही उत्त्म है।
127और (हे नबी!) आप सहन करें और आपका सहन करना अल्लाह ही की सहायता से है और उनके (दुर्व्यवहार) पर शोक न करें और न उनके षड्यंत्र से तनिक भी संकुचित हों।
128वास्तव में, अल्लाह उन लोगों के साथ है, जो सदाचारी हैं और जो उपकार करने वाले हैं।
WEBREATH · 11:11
«यदि तुम कृतज्ञ बनोगे, तो तुम्हें और अधिक दूँगा» — क़ुरआन 14:7
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं