11. हुड
1अलिफ, लाम, रा। ये पुस्तक है, जिसकी आयतें सुदृढ़ की गयीं, फिर सविस्तार वर्णित की गयी हैं, उसकी ओर से, जो तत्वज्ञ, सर्वसूचित है।
2कि अल्लाह के सिवा किसी की इबादत (वंदना) न करो। वास्तव में, मैं उसकी ओर से तुम्हें सचेत करने वाला तथा शुभ सूचना देने वाला हूँ।
3और ये है कि अपने पालनहार से क्षमा याचना करो, फिर उसी की ओर ध्यानमग्न हो जाओ। वह तुम्हें एक निर्धारित अवधि तक अच्छा लाभ पहुँचाएगा और प्रत्येक श्रेष्ठ को उसकी श्रेष्ठता प्रदान करेगा और यदि तुम मुँह फेरोगे, तो मैं तुमपर एक बड़े दिन की यातना से डरता हूँ।
4अल्लाह ही की ओर तुमसब को पलटना है और वह जो चाहे, कर सकता है।
5सुनो! ये लोग अपने सीनों को मोड़ते हैं, ताकि उस[1] से छुप जायेँ, सुनो! जिस समय वे अपने कपड़ों से स्वयं को ढाँपते हैं, तबभी वह (अल्लाह) उनके छुपे को जानता है तथा उनके खुले को भी। वास्तव में, वह उसे भी भली-भाँति जानने वाला[2] है, जो सीनों में (भेद) है।
6और धरती में कोई चलने वाला नहीं है, परन्तु उसकी जीविका अल्लाह के ऊपर है तथा वह उसके स्थायी स्थान तथा सौंपने के स्थान को जानता है। सबकुछ एक खुली पुस्तक में अंकित है[1]।
7और वही है, जिसने आकाशों तथा धरती की उत्पत्ति छः दिनों में की। उस समय उसका सिंहासन जल पर था, ताकि तुम्हारी परीक्षा ले कि तुममें किसका कर्म सबसे उत्तम है। और (हे नबी!) यदि आप, उनसे कहें कि वास्तव में तुम सभी मरण के पश्चात् पुनः जीवित किये जाओगे, तो जो काफ़िर हो गये, अवश्य कह देंगे कि ये तो केवल खुला जादू है।
8और यदि, हम उनसे यातना में किसी विशेष अवधि तक देर कर दें, तो अवश्य कहेंगे कि उसे क्या चीज़ रोक रही है? सुन लो! वह जिस दिन उनपर आ जायेगी, तो उनसे फिरेगी नहीं और उन्हें वह (यातना) घेर लेगी, जिसकी वे हँसी उड़ा रहे थे।
9और यदि, हम मनुष्य को अपनी कुछ दया चखा दें, फिर उसे उससे छीन लें, तो हताशा कृतघ्न हो जाता है।
10और यदि, हम उसे सुख चखा दें, दुःख के पश्चात्, जो उसे पहुँचा हो, तो अवश्य कहेगा कि मेरा सब दुःख दूर हो गया। वास्तव में, वह प्रफुल्ल होकर अकड़ने लगता है[1]।
11परन्तु, जिन्होंने धैर्य धारण किया और सुकर्म किये, तो उनके लिए क्षमा और बड़ा प्रतिफल है।
12तो (हे नबी!) संभवतः आप उसमें से कुछ को, जो आपकी ओर प्रकाशना की जा रही है, त्याग देने वाले हैं और इसके कारण आपका दिल सिकुड़ रहा है कि वे कहते हैं कि इसपर कोई कोष क्यों नहीं उतारा गया या इसके साथ कोई फरिश्ता क्यों (नहीं) आया? (तो सुनिए) आपकेवल सचेत करने वाले हैं और अल्लाह ही प्रत्येक चीज़ पर रक्षक है।
13क्या वह कहते हैं कि उसने इस (क़ुर्आन) को स्वयं बना लिया है? आप कह दें कि इसीके समान दस सूरतें बना लाओ[1] और अल्लाह के सिवा, जिसे हो सके, बुला हो, यदि तुम लोग सच्चे हो।
14फिर यदि वे उत्तर न दें, तो विश्वास कर लो कि उसे (क़ुर्आन को) अल्लाह के ज्ञान के साथ ही उतारा गया है और ये कि कोई वंदनीय (पूज्य) नहीं है, परन्तु वही। तो क्या तुम मुस्लिम होते हो
15जो व्यक्ति सांसारिक जीवन तथा उसकी शोभा चाहता हो, हम उनके कर्मों का (फल) उसीमें चुका देंगे और उनके लिए (संसार में) कोई कमी नहीं की जायेगी।
16यही वो लोग हैं, जिनका परलोक में अग्नि के सिवा कोई भाग नहीं होगा और उन्होंने जो कुछ किया, वह व्यर्थ हो जायेगा और वे जो कुछ कर रहे हैं, असत्य सिध्द होने वाला है।
17तो क्या जो अपने पालनहार की ओर से स्पष्ट प्रमाण[1] रखता हो और उसके साथ ही एक गवाह (साक्षी)[1] भी उसकी ओर से आ गया हो और इससे पहले मूसा की पुस्तक मार्गदर्शक तथा दया बनकर आ चुकी हो, ऐसे लोग तो इस (क़ुर्आन) पर ईमान रखते हैं और सम्प्रदायों मेंसे, जो इसे अस्वीकार करेगा, तो नरक ही उसका वचन-स्थान है। अतः आप, इसके बारे में किसी संदेह में न पड़ें। वास्तव में, ये आपके पालनहार की ओर से सत्य है। परन्तु अधिक्तर लोग ईमान (विश्वास) नहीं रखते।
18और उससे बड़ा अत्याचारी कौन होगा, जो अल्लाह पर मिथ्यारोपण करे? वही लोग, अपने पालनहार के समक्ष लाये जायेंगे और साक्षी (फ़रिश्ते) कहेंगे कि इन्होंने अपने पालनहार पर झूठ बोले। सुनो! अत्याचारियों पर अल्लाह की धिक्कार है।
19वही लोग, अल्लाह की राह से रोक रहे हैं और उसे टेढ़ा बनाना चाहते हैं। वही परलोक को न मानने वाले हैं।
20वे लोग धरती में विवश करने वाले नहीं थे और न उनका अल्लाह के सिवा कोई सहायक था। उनके लिए दुगनी यातना होगी। वे न सुन सकते थे, न देख सकते थे।
21उन्होंने ही स्वयं अपना विनाश कर लिया और उनसे वो बात खो गयी, जो वे बना रहे थे।
22ये आवश्यक है कि परलोक में यही सर्वाधिक विनाश में होंगे।
23वास्तव में, जो ईमान लाये और सदाचार किये तथा अपने पालनहार की ओर आकर्शित हुए, वही स्वर्गीय हैं और वे उसमें सदैव रहेंगे।
24दोनों समुदाय की दशा ऐसी है, जैसे एक अन्धा और बहरा हो और दूसरा देखने और सुनने वाला हो। तो क्या दोनों की दशा समान हो सकती है? क्या तुम (इस अन्तर को) नहीं समझते
25और हमने नूह़ को उसकी जाति की ओर रसूल बनाकर भेजा। उन्होंने कहाः वास्तव में, मैं तुम्हारे लिए खुले रूप से सावधान करने वाला हूँ।
26कि इबादत (वंदना) केवल अल्लाह ही की करो। मैं तुम्हारे ऊपर दुःख दायी दिन की यातना से डरता हूँ।
27तो उन प्रमुखों ने, जो उनकी जाति में से काफ़िर हो गये, कहाः हमतो तुझे अपने ही जैसा मानव पुरुष देख रहे हैं और हम देख रहे हैं कि तुम्हारा अनुसरण केवन वही लोग कर रहे हैं, जो हममें नीच हैं। वो भी बिना सोचे-समझे और हम अपने ऊपर तुम्हारी कोई प्रधानता भी नहीं देखते, बल्कि हम तुम्हें झूठा समझते हैं।
28उस (अर्थात् नूह़) ने कहाः हे मेरी जाति के लोगो! तुमने इस बात पर विचार किया कि यदि मैं अपने पालनहार की ओर से एक स्पष्ट प्रमाण पर हूँ और मुझे उसने अपने पास से एक दया[1] प्रदान की हो, फिर वह तुम्हें सुझायी न दे, तो क्या हम उसे तुमसे चिपका[2] दें, जबकि तुम उसे नहीं चाहते
29और हे मेरी जाति के लोगो! मैं इस (सत्य के प्रचार) पर तुमसे कोई धन नहीं माँगता। मेरा बदला तो अल्लाह के ऊपर है और मैं उन्हें (अपने यहाँ से) धुतकार नहीं सकता, जो ईमान लाये हैं, निश्चय वे अपने पालनहार से मिलने वाले हैं, परन्तु मैं देख रहा हूँ कि तुम जाहिलों जैसी बातें कर रहे हो।
30और हे मेरी जाति के लोगो! कौन अल्लाह की पकड़ से[1] मुझे बचायेगा, यदि मैं उन्हें अपने पास से धुतकार दूँ? क्या तुम सोचते नहीं हो
31और मैं तुमसे ये नहीं कहता कि मेरे पास अल्लाह के कोषागार (ख़ज़ाने) हैं और न मैं गुप्त बातों का ज्ञान रखता हूँ और ये भी नहीं कहता कि मैं फ़रिश्ता हूँ और ये भी नहीं कहता कि जिन्हें तुम्हारी आँखें घृणा से देखती हैं, अल्लाह उन्हें कोई भलाई नहीं देगा। अल्लाह अधिक जानता है, जो कुछ उनके दिलों में है। यदि मैं ऐसा कहूँ, तो निश्चय अत्याचारियों में हो जाऊँगा।
32उन्होंने कहाः हे नूह़! तूने हमसे झगड़ा किया और बहुत झगड़ लिया, अब वो (यातना) ला दो, जिसकी धमकी हमें देते हो, यदि तुम सच बोलने वालों में हो।
33उसने कहाः उसे तो तुम्हारे पास अल्लाह ही लायेगा, यदि वह चाहेगा और तुम (उसे) विवश करने वाले नहीं हो।
34और मेरी शुभ-चिन्ता तुम्हें कोई लाभ नहीं पहुँचा सकती, यदि मैं तुम्हारा हित चाहूँ, जबकि अल्लाह तुम्हें कुपथ करना चाहता हो और तुम उसी की ओर लौटाये जाओगे।
35क्या वे कहते हैं कि उसने ये बात स्वयं बना ली है? तुम कहो कि यदि मैंने इसे स्वयं बना लिया है, तो मेरा अपराध मुझी पर है और मैं निर्दोष हूँ, उस अपराध से, जो तुम कर रहे हो।
36और नूह़ की ओर वह़्यी (प्रकाशना) की गयी कि तुम्हारी जाति मेंसे ईमान नहीं लायेंगे, उनके सिवा, जो ईमान ला चुके हैं। अतः उससे दुःखी न बनो, जो वे कर रहे हैं।
37और हमारी आँखों के सामने हमारी वह़्यी के अनुसार एक नाव बनाओ और मुझसे उनके बारे में कुछ[1] न कहना, जिन्होंने अत्याचार किया है। वास्तव में, वे डूबने वाले हैं।
38और वह नाव बनाने लगा और जबभी उसकी जाति के प्रमुख उसके पास से गुज़रते, तो उसकी हँसी उड़ाते। नूह़ ने कहाः यदि तुम हमारी हँसी उड़ाते हो, तो हमभी ऐसे ही (एक दिन) तुम्हारी हँसी उड़येंगे।
39फिर तुम्हें शीघ्र ही ज्ञान हो जायेगा कि किसपर अपमानकारी यातना आयेगी और स्थायी दुःख किसपर उतरेगा
40यहाँ तक कि जब हमारा आदेश आ गया और तन्नूर उबलने लगा, तो हमने (नूह़ से) कहाः उसमें प्रत्येक प्रकार के जीवों के दो जोड़े रख लो और अपने परिजनों को, उनके सिवा, जिनके बारे में पहले बता दिया गाय है और जो ईमान लाये हैं और उसके साथ थोड़े ही ईमान लाये थे।
41और उस (नूह़) ने कहाः इसमें सवार हो जाओ, अल्लाह के नाम ही से इसका चलना तथा इसे रुकना है। वास्तव में, मेरा पालनहार बड़ा क्षमाशील दयावान् है।
42और वह उन्हें लिए पर्वत जैसी ऊँची लहरों में चलती रही और नूह़ ने अपने पुत्र को पुकारा, जबकि वह उनसे अलग थाः हे मेरे पुत्र! मेरे साथ सवार हो जा और काफ़िरों के साथ न रह।
43उसने कहाः मैं किसी पर्वत की ओर शरण ले लूँगा, जो मुझे जल से बचा लेगा। नूह़ ने कहाः आज अल्लाह के आदेश (यातना) से कोई बचाने वाला नहीं, परनु जिसपर वह (अल्लाह) दया करे और दोनों के बीच एक लहर आड़े आ गयी और वह डूबने वालों में हो गया।
44और कहा गयाः हे धरती! अपना जल निगल जा और हे आकाश! तू थम जा औ जल उतर गया और आदेश पूरा कर दिया गया और नाव "जूदी[1]" पर ठहर गयी और कहा गया कि अत्याचारियों के लिए (अल्लाह की दया से) दूरी है।
45तथा नूह़ ने अपने पालनहार से प्रार्थना की और कहाः मेरे पालनहार! मेरा पुत्र मेरे परिजनों में से है। निश्चय तेरा वचन सत्य है तथा तू ही सबसे अच्छा निर्णय करने वाला है।
46उस (अल्लाह) ने उत्तर दियाः वह तेरा परिजन नहीं। (क्योंकि) वह कुकर्मी है। अतः मुझसे उस चीज़ का प्रश्न न कर, जिसका तुझे कोई ज्ञान नहीं। मैं तुझे बताता हूँ कि अज्ञानों में न हो जा।
47नूह़ ने कहाः मेरे पालनहार! मैं तेरी शरण चाहता हूँ कि मैं तुझसे ऐसी चीज़ की माँग करूँ, जिस (की वास्तविक्ता) का मुझे कोई ज्ञान नहीं है[1] और यदि तूने मुझे क्षमा नहीं किया और मुझपर दया न की, तो मैं क्षतिग्रस्तों में हो जाऊँगा।
48कहा गया कि हे नूह़! उतर जा, हमारी ओर से रक्षा ओर सम्पन्नता के साथ, अपने ऊपर तथा तेरे साथ के समुदायों के ऊपर और कुछ समुदाय ऐसे हैं, जिन्हें हम सांसारिक जीवन सामग्री प्रदान करेंगें, फिर उन्हें हमारी दुःखदायी यातना पहुँचेगी।
49यही ग़ैब की बातें हैं, जिन्हें (हे नबी!) हम आपकी ओर प्रकाशना (वह़्यी) कर रहे हैं। इससे पूर्व न तो आप इन्हें जानते थे और न आपकी जाति। अतः आप सहन करें। वास्तव में, अच्छा परिणाम आज्ञाकारियों के लिए है।
50और "आद" (जाति) की ओर उनके भाई हूद को भेजा, उसने कहाः हे मेरी जाति को लोगो! अल्लाह की इबादत (वंदना) करो। उसके सिवा तुम्हारा कोई पूज्य नहीं है। तुम इसके सिवा कुछ नहीं हो कि झूठी बातें घड़ने वाले हो[1]।
51हे मेरी जाति के लोगो! मैं तुमसे इसपर कोई बदला नहीं चाहता; मेरा पारिश्रमिक (बदला) उसी (अल्लाह) पर है, जिसने मुझे पैदा किया है। तो क्या तुम (इतनी) बात भी नहीं समझते
52हे मेरी जाति के लोगो! अपने पालनहार से क्षमा माँगो। फिर उसकी ओर ध्यानमग्न हो जाओ। वह आकाश से तुमपर धारा प्रवाह वर्षा करेगा और तुम्हारी शक्ति में अधिक शक्ति प्रदान करेगा और अपराधी होकर मुँह न फेरो।
53उन्होंने कहाः हे हूद! तुम हमारे पास कोई स्पष्ट (खुला) प्रमाण नहीं लाये तथा हम तुम्हारी बात के कारण अपने पूज्यों को त्यागने वाले नहीं हैं और न हम तुम्हारा विश्वास करने वाले हैं।
54हम तो यही कहेंगे कि तुझे हमारे किसी देवता ने बुराई के साथ पकड़ लिया है। हूद ने कहाः मैं अल्लाह को (गवाह) बनाता हूँ और तुम भी साक्षी रहो कि मैं उस शिर्क (मिश्रणवाद) से विरक्त हूँ, जो तुम कर रहे हो।
55उस (अल्लाह) के सिवा। तुम सब मिलकर मेरे विरुध्द षड्यंत्र रच लो, फिर मुझे कुछ भी अवसर न दो[1]।
56वास्तव में, मैंने अल्लाह पर, जो मेरा पालनहार और तुम्हारा पालनहार है, भरोसा किया है। कोई चलने वाला जीव ऐसा नहीं, जो उसके अधिकार में न हो, वास्तव में, मेरा पालनहार सीधी राह[1] पर है।
57फिर यदि तुम विमुख रह गये, तो मैंने तुम्हें वह उपदेश पहुँचा दिया है, जिसके साथ मुझे भेजा गया है और मेरा पालनहार तुम्हारा स्थान तुम्हारे सिवा किसी[1] और जाति को दे देगा और तुम उसे कुछ हानि नहीं पहुँचा सकोगे, वास्तव में, मेरा पालनहार प्रत्येक चीज़ का रक्षक है।
58और जब हमारा आदेश आ पहुँचा, तो हमने हूद को और उनको, जो उसके साथ ईमान लाये, अपनी दया से बचा लिया और हमने उन्हें घोर यातना से बचा लिया।
59वही (जाति) "आद" है, जिसने अपने पालनहार की आयतों (निशानियों) का इन्कार किया और उसके रसूलों की बात नहीं मानी और प्रत्येक सच के विरोधी के पीछे चलते रहे।
60और इस संसार में धिक्कार उनके साथ लगा दी गयी तथा प्रलय के दिन भी लगी रहेगी। सुनो! आद ने अपने पालनहार को अस्वीकार किया। सुनो! हूद की जाति आद के लिए दूरी हो
61और समूद[1] की ओर उनके भाई सालेह़ को भेजा। उसने कहाः हे मेरी जाति के लोगो! अल्लाह की इबादत (वंदना) करो, उसके सिवा तुम्हारा कोई पूज्य नहीं है। उसीने तुम्हें धरती से उत्पन्न किया और तुम्हें उसमें बसा दिया, अतः उससे क्षमा माँगो और उसी की ओर ध्यानमग्न हो जाओ। वास्तव में, मेरा पालनहार समीप है ( और दुआयें) स्वीकार करने वाला है[2]।
62उन्होंने कहाः हे सालेह! हमारे बीच इससे पहले तुझसे बड़ी आशा थी, क्या तू हमें इस बात से रोक रहा है कि हम उसकी पूजा करें, जिसकी पूजा हमारे बाप-दादा करते रहे? तू जिस चीज़ (एकेश्वरवाद) की ओर बुला रहा है, वास्तव में, उसके बारे में हमें संदेह है, जिसमें हमें द्विधा है।
63उस (सालेह़) ने कहाः हे मेरी जाति के लोगो! तुमने विचार किया कि यदि मैं अपने पालनहार की ओर से एक स्पष्ट खुले प्रमाण पर हूँ और उसने मुझे अपनी दया प्रदान की हो, तो कौन है, जो अल्लाह के मुक़ाबले में मेरी सहायता करेगा, यदि मैं उसकी अवज्ञा करूँ? तुम मुझे घाटे में डालने के सिवा कुछ नहीं दे सकते।
64और हे मेरी जाति के लोगो! ये अल्लाह[1] की ऊँटनी तुम्हारे लिए एक निशानी है, इसे छोड़ दो, अल्लाह की धरती में चरती फिरे और इसे कोई दुःख न पहुँचाओ, अन्यथा तुम्हें तुरन्त यातना पकड़ लेगी।
65तो उन्होंने उसे मार डाला। तब सालेह़ ने कहाः तुम अपने नगर में तीन दिन और आनन्द ले लो! ये वचन झूठ नहीं है।
66फिर जब हमारा आदेश आ गया, तो हमने सालेह़ को और जो लोग उसके साथ ईमान लाये, अपनी दया से, उस दिन के अपमान से बचा लिया। वास्तव में, आपका पालनहार ही शक्तिशाली प्रभुत्वशाली है।
67और अत्याचारियों को कड़ी ध्वनि ने पकड़ लिया और वे अपने घरों में औंधे पड़े रह गये।
68जैसै वे वहाँ कभी बसे ही नहीं थे। सावधान! समूद ने अपने पालनहार को अस्वीकार कर दिया। सुन लो! समूद के लिए दूरी हो।
69और हमारे फ़रिश्ते इब्राहीम के पास शुभ सूचना लेकर आये। उन्होंने सलाम किया, तो उसने उत्तर में सलाम किया। फिर देर न हुई कि वह एक भुना हुआ वछड़ा[1] ले आये।
70फिर जब देखा कि उनके हाथ उसकी ओर नहीं बढ़ते, तो उनकी ओर से संशय में पड़ गया और उनसे दिल में भय का अनुभव किया। उन्होंने कहाः भय न करो। हम लूत[1] की जाति की ओर भेजे गये हैं।
71और उस (इब्राहीम) की पत्नी खड़ी होकर सुन रही थी। वह हँस पड़ी[1], तो उसे हमने इस्ह़ाक़ (के जन्म) की शुभ सूचना[2] दी और इस्ह़ाक़ के पश्चात् याक़ुब की।
72वह बोलीः हाय मेरा दुर्भाग्य! क्या मेरी संतान होगी, जबकि मैं बुढ़िया हूँ और मेरा ये पति भी बूढ़ा है? वास्तव में, ये बड़े आश्चर्य की बात है।
73फ़रिश्तों ने कहाः क्या तू अल्लाह के आदेश से आश्चर्य करती है? हे घर वालो! तुम सब पर अल्लाह की दया तथा सम्पन्नता है, निसंदेह वह अति प्रशंसित, श्रेष्ठ है।
74फिर जब इब्राहीम से भय दूर हो गया और उसे शुभ सूचना मिल गयी, तो वह लूत की जाति के बारे में हमसे आग्रह करने लगा[1]।
75वास्तव में, इब्राहीम बड़ा सहनशील, कोमल हृदय तथा अल्लाह की ओर ध्यानमग्न रहने वाला था।
76(फ़रिश्तों ने कहाः) हे इब्राहीम! इस बात को छोड़ो, वास्तव में, तेरे पालनहार का आदेश[1] आ गया है तथा उनपर ऐसी यातना आने वाली, है जो टलने वाली नहीं है।
77और जब हमारे फ़रिश्ते लूत के पास आये, तो उनका आना उसे बुरा लगा और उनके कारण व्याकूल हो गया और कहाः ये तो बड़ी विपता का[1] दिन है।
78और उसकी जाति के लोग दौड़ते हुए उसके पास आ गये और इससे पूर्व वह कुकर्म[1] किया करते थे। लूत ने कहाः हे मेरी जाति के लोगो! ये मेरी[2] पुत्रियाँ हैं, वे तुम्हारे लिए अधिक पवित्र हैं, अतः अल्लाह से डरो और मेरे अतिथियों के बारे में मुझे अपमानित न करो। क्या तुममें कोई भला मनुष्य नहीं है
79उन लोगों ने कहाः तुमतो जानते ही हो कि हमारा तुम्हारी पुत्रियों में कोई अधिकार नहीं[1]। तथा वास्तव में, तुम जानते ही हो कि हम क्या चाहते हैं।
80उस (लूत) ने कहाः काश मेरे पास बल होता! या कोई दृढ़ सहारा होता, जिसकी शरण लेता
81फ़रिश्तों ने कहाः हे लूत! हम तेरे पालनहार के भेजे हुए (फ़रिश्ते) हैं। वे कदापि तुझतक नहीं पहुँच सकेंगे। जब कुछ रात रह जाये, तो अपने परिवार के साथ निकल जा और तुममें से कोई फिरकर न देखे। परन्तु तेरी पत्नी (साथ नहीं जायेगी)। उसपर भी वही बीतने वाला है, जो उनपर बीतेगा। उनकी यातना का निर्धारित समय प्रातः काल है। क्या प्रातः काल समीप नहीं है
82फिर जब हमारा आदेश आ गया, तो हमने उस बस्ती को तहस-नहस कर दिया और उनपर पकी हुई कंकरियों की बारिश कर दी।
83जो तेरे पालनहार के यहाँ चिन्ह लगायी हुयी थी और वह[1] (बस्ती) अत्याचारियों[2] से कोई दूर नहीं है।
84और मद्यन की ओर उनके भाई शोऐब को भेजा। उसने कहाः हे मेरी जाति के लोगो! अल्लाह की इबादत (वंदना) करो। उसके सिवा कोई तुम्हारा पूज्य नहीं है और नाप-तोल में कमी न करो[1]। मैं तुम्हें सम्पन्न देख रहा हूँ। इसलिए मुझे डर है कि तुम्हें कहीं यातना न घेर ले।
85हे मेरी जाति के लोगो! नाप-तोल न्यायपुर्वक पूरा करो और लोगों को उनकी चीज़ कम न दो तथा धरती में उपद्रव फैलाते न फिरो।
86अल्लाह की दी हुई बचत, तुम्हारे लिए अच्छी है, यदि तुम ईमान वाले हो और मैं तुमपर कोई रक्षक नहीं हूँ।
87उन्होंने कहाः हे शोऐब! क्या तेरी नमाज़ (इबादत) तुझे आदेश दे रही है कि हम उसे त्याग दें, जिसकी पूजा हमारे बाप-दादा करते रहे? अथवा अपने धनों में जो चाहें करें? वास्तव में, तू बड़ा ही सहनशील तथा भला व्यक्ति है
88शोऐब ने कहाः हे मेरी जाति के लोगो! तुम बताओ, यदि मैं अपने पालनहार की ओर से प्रत्यक्ष प्रमाण पर हूँ और उसने मुझे अच्छी जीविका प्रदान की हो, (तो कैसे तुम्हारा साथ दूँ?) मैं नहीं चाहता कि उसके विरुध्द करूँ, जिससे तुम्हें रोक रहा हूँ। मैं जहाँ तक हो सके, सुधार ही चाहता हूँ और ये जो कुछ करना चाहता हूँ, अल्लाह के योगदान पर निर्भर करता है। मैंने उसीपर भरोसा किया है और उसी की ओर ध्यानमग्न रहता हूँ।
89हे मेरी जाति के लोगो! तुम्हें मेरा विरोध इस बात पर न उभार दे कि तुमपर वही यातना आ पड़े, जो नूह़ की जाति, हूद की जाति अथवा सालेह़ की जाति पर आई और लूत की जाति तुमसे कुछ दूर नहीं है।
90और अपने पालनहार से क्षमा माँगो, फिर उसी की ओर ध्यानमग्न हो जाओ। वास्तव में, मेरा पालनहार अति क्षमाशील तथा प्रेम करने वाला है।
91उन्होंने कहाः हे शोऐब! तुम्हारी बहुत-सी बात हम नहीं समझते और हम, तुम्हें अपने बीच निर्बल देख रहे हैं और यदि, भाई बन्धु न होते, तो हम तुम्हें पथराव करके मार डालते और तुम, हमपर कोई भारी तो नहीं हो।
92शोऐब ने कहाः हे मेरी जाति के लोगो! क्या मेरे भाई बन्धु तुमपर अल्लाह से अधिक भारी हैं कि तुमने उसे पीठ पीछे डाल दिया है[1]? निश्चय मेरा पालनहार उसे (अपने ज्ञान के) घेरे में लिए हुए है, जो तुम कर रहे हो।
93और हे मेरी जाति के लोगो! तुम अपने स्थान पर काम करो, मैं (अपने स्थान पर) काम कर रहा हूँ। तुम्हें शीघ्र ही ज्ञान हो जायेगा कि किसपर ऐसी यातना आयेगी, जो उसे अपमानित कर दे तथा कौन झूठा है? तुम प्रतीक्षा करो, मैं (भी) तुम्हारे साथ प्रतीक्षा करने वाला हूँ।
94और जब हमारा आदेश आ गया, तो हमने शोऐब को और जो उसके साथ ईमान लाये थे, अपनी दया से बचा लिया और अत्याचारियों को बड़ी ध्वनि ने पकड़ लिया। फिर वे अपने घरों में औंधे मुँह पड़े रह गये।
95जैसे वे कभी उनमें बसे ही न रहे हों। सुन लो! मद्यन वाले भी वैसे ही दूर फेंक दिये गये, जैसे समूद दूर फेंक दिये गये।
96और हमने मूसा को अपनी निशानियों (चमत्कार) तथा खुले तर्क के साथ भेजा।
97फ़िरऔन और उसके प्रमुखों की ओर। तो उन्होंने फ़िरऔन की आज्ञा का अनुसरण (पालन) किया। जबकि फ़िरऔन की आज्ञा सुधरी हुई न थी।
98वह प्रलय के दिन अपनी जाति के आगे चलेगा और उनको नरक में उतारेगा और वह क्या ही बुरा उतरने का स्थान है
99और वे धिक्कार के पीछे लगा दिये गये, इस संसार में भी और प्रलय के दिन भी। कैसा बुरा पुरस्कार है, जो उन्हें दिया जायेगा
100हे नबी! ये उन बस्तियों के समाचार हैं, जिनका वर्णन हम आपसे कर रहे हैं। उनमें से कुछ निर्जन खड़ी और कुछ उजड़ चुकी हैं।
101और हमने उनपर अत्याचार नहीं किया, परन्तु उन्होंने स्वयं अपने ऊपर अत्याचार किया। तो उनके वे पूज्य, जिन्हें व अल्लाह के सिवा पुकार रहे थे, उनके कुछ काम नहीं आये, जब आपके पालनहार का आदेश आ गया और उन्होंने उन्हें हानि पहुँचाने के सिवा और कुछ नहीं किया[1]।
102और इसी प्रकार, तेरे पालनहार की पकड़ होती है, जब वह किसी अत्याचार करने वालों की बस्ती को पकड़ता है। निश्चय उसकी पकड़ दुःखदायी और कड़ी होती[1] है।
103निश्चय इसमें एक निशानी है, उसके लिए जो परलोक की यातना से डरे। वह ऐसा दिन होगा, जिसके लिए सभी लोग एकत्र होंगे तथा उस दिन सब उपस्थित होंगे।
104और उसे हम केवल एक निर्धारित अवधि के लिए देर कर रहे हैं।
105जब वह दिन आ जायेगा, तो अल्लाह की अनुमति बिना कोई प्राणी बात नहीं करेगा, फिर उनमें से कुछ अभागे होंगे और कुछ भाग्यवान होंगे।
106फिर जो भाग्यहीन होंगे, वही नरक में होंगे, उन्हीं की उसमें चीख और पुकार होगी।
107वे उसमें सदावासी होंगे, जब तक आकाश तथा धरती अवस्थित हैं। परन्तु ये कि आपका पालनहार कुछ और चाहे। वास्तव में, आपका पालनहार जो चाहे, करने वाला है।
108और जो भाग्यवान हैं, वे स्वर्ग ही में सदैव रहेंगे, जब तक आकाश तथा धरती स्थित हैं। परन्तु आपका पालनहर कुछ और चाहे, ये प्रदान है अनवरत (निरन्तर)।
109अतः (हे नबी!) आप उसके बारे में किसी संदेह में न हों, जिसे वे पूजते हैं। वे उसी प्रकार पूजते हैं, जैसे इससे पहले इनके बाप-दादा पूजते[1] रहे हैं। वस्तुतः, हम उन्हें उनका बिना किसी कमी के पूरा भाग देने वाले हैं।
110और हमने मूसा को पुस्तक (तौरात) प्रदान की। तो उसमें विभेद किया गया और यदि आपके पालनहार ने पहले से एक बात[1] निश्चित न की होती, तो उनके बीच निर्णय कर दिया गया होता और वास्तव में, वे[2] उसके बारे में संदेह और शंका में हैं।
111और प्रत्येक को आपका पालनहार अवश्य उनके कर्मों का पूरा बदला देगा। क्योंकि वह उनके कर्मों से सूचित है।
112अतः (हे नबी!) जैसे आपको आदेश दिया गया है, उसपर सुदृढ़ रहिये और वे भी जो आपके साथ तौबा (क्षमा याचना) करके हो लिए हैं और सीमा का उल्लंघन न[1] करो, क्योंकि वह (अल्लाह) तुम्हारे कर्मों को देख रहा है।
113और अत्याचारियों की ओर न झुक पड़ो। अन्यथा तुम्हें भी अग्नि स्पर्श कर लेगी और अल्लाह के सिवा तुम्हारा कोई सहायक नहीं, फिर तुम्हारी सहायता नहीं की जायेगी।
114तथा आप नमाज़ की स्थापना करें, दिन के सिरों पर और कुछ रात बीतने[1] पर। वास्तव में, सदाचार दुराचारों को दूर कर देते[2] हैं। ये एक शिक्षा है, शिक्षा ग्रहण करने वालों के लिए।
115तथा आप धैर्य से काम लें, क्योंकि अल्लाह सदाचारियों का प्रतिफल व्यर्थ नहीं करता।
116तो तुमसे पहले युगों में ऐसे सदाचारी क्यों नहीं हुए, जो धरती में उपद्रव करने से रोकते? परन्तु ऐसा बहुत थोड़े युगों में हुआ, जिन्हें हमने बचा लिया और अत्याचारी उस स्वाद के पीछे पड़े रहे, जो धन-धान्य दिये गये थे और वे अपराधि बन कर रहे।
117और आपका पालनहार ऐसा नहीं है कि बस्तियों को अत्याचार से ध्वस्त कर दे, जबकि उनके वासी सुधारक हूँ।
118और यदि आपका पालनहार चाहता, तो सब लोगों को एक समुदाय बना देता और वे सदा विचार विरोधी रहेंगे।
119परन्तु जिसपर आपका पालनहार दया करे और इसीके लिए उन्हें पैदा किया है[1] और आपके पालनहार की बात पूरी हो गयी कि मैं नरक को सब जिन्नों तथा मानवों से अवश्य भर दूँगा[2]।
120और (हे नबी!) ये नबियों की सब कथाएं हम आपको सुना रहे हैं, जिनके द्वारा आपके दिल को सुदृढ़ कर दें और इस विषय में आपके पास सत्य आ गया है और ईमान वालों के लिए एक शिक्षा और चेतावनी है।
121और (हे नबी!) आप उनसे कह दें, जो ईमान नहीं लाते कि तुम अपने स्थान पर काम करते रहो। हम अपने स्थान पर काम करते हैं।
122तथा तुम प्रतीक्षा[1] करो, हमभी प्रतीक्षा करने वाले हैं।
123अल्लाह ही के अधिकार में आकाशों तथा धरती की छिपी हुई चीज़ों का ज्ञान है और प्रत्येक विषय उसी की ओर लोटाये जाते हैं। अतः आप उसी की इबादत (वंदना) करें और उसीपर निर्भर रहें। आपका पालनहार उससे अचेत नहीं है, जो तुम कर रहे हो।
WEBREATH · 11:11
«यदि तुम कृतज्ञ बनोगे, तो तुम्हें और अधिक दूँगा» — क़ुरआन 14:7
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं