عیسائیت
واپس

ज़करियाह 10

1बहार के मौसम में रब से बारिश माँगो। क्योंकि वही घने बादल बनाता है, वही बारिश बरसाकर हर एक को खेत की हरियाली मुहैया करता है।

2तुम्हारे घरों के बुत फ़रेब देते, तुम्हारे ग़ैबदान झूटी रोया देखते और फ़रेबदेह ख़ाब सुनाते हैं। उनकी तसल्ली अबस है। इसी लिए क़ौम को भेड़-बकरियों की तरह यहाँ से चला जाना पड़ा। गल्लाबान नहीं है, इसलिए वह मुसीबत में उलझे रहते हैं।

3रब फ़रमाता है, “मेरी क़ौम के गल्लाबानों पर मेरा ग़ज़ब भड़क उठा है, और जो बकरे उस की राहनुमाई कर रहे हैं उन्हें मैं सज़ा दूँगा। क्योंकि रब्बुल-अफ़वाज अपने रेवड़ यहूदाह के घराने की देख-भाल करेगा, उसे जंगी घोड़े जैसा शानदार बना देगा।

4यहूदाह से कोने का बुनियादी पत्थर, मेख़, जंग की कमान और तमाम हुक्मरान निकल आएँगे।

5सब सूरमे की मानिंद होंगे जो लड़ते वक़्त दुश्मन को गली के कचरे में कुचल देंगे। रब्बुल-अफ़वाज उनके साथ होगा, इसलिए वह लड़कर ग़ालिब आएँगे। मुख़ालिफ़ घुड़सवारों की बड़ी रुसवाई होगी।

6मैं यहूदाह के घराने को तक़वियत दूँगा, यूसुफ़ के घराने को छुटकारा दूँगा, हाँ उन पर रहम करके उन्हें दुबारा वतन में बसा दूँगा। तब उनकी हालत से पता नहीं चलेगा कि मैंने कभी उन्हें रद्द किया था। क्योंकि मैं रब उनका ख़ुदा हूँ, मैं ही उनकी सुनूँगा।

7इफ़राईम के अफ़राद सूरमे से बन जाएंगे, वह यों ख़ुश हो जाएंगे जिस तरह दिल मै पीने से ख़ुश हो जाता है। उनके बच्चे यह देखकर बाग़ बाग़ हो जाएंगे, उनके दिल रब की ख़ुशी मनाएँगे।

8मैं सीटी बजाकर उन्हें जमा करूँगा, क्योंकि मैंने फ़िद्या देकर उन्हें आज़ाद कर दिया है। तब वह पहले की तरह बेशुमार हो जाएंगे।

9मैं उन्हें बीज की तरह मुख़्तलिफ़ क़ौमों में बोकर मुंतशिर कर दूँगा, लेकिन दूर-दराज़ इलाक़ों में वह मुझे याद करेंगे। और एक दिन वह अपनी औलाद समेत बचकर वापस आएँगे।

10मैं उन्हें मिसर से वापस लाऊँगा, असूर से इकट्ठा करूँगा। मैं उन्हें जिलियाद और लुबनान में लाऊँगा, तो भी उनके लिए जगह काफ़ी नहीं होगी।

11जब वह मुसीबत के समुंदर में से गुज़रेंगे तो रब मौजों को यों मारेगा कि सब कुछ पानी की गहराइयों तक ख़ुश्क हो जाएगा। असूर का फ़ख़र ख़ाक में मिल जाएगा, और मिसर का शाही असा दूर हो जाएगा।

12मैं अपनी क़ौम को रब में तक़वियत दूँगा, और वह उसका ही नाम लेकर ज़िंदगी गुज़ारेंगे।” यह रब का फ़रमान है।

ذریعہ: किताबे-मुक़द्दस

WEBREATH · 11:11

«He himself gives everyone life and breath and everything else» — Acts 17:25

Breath is one for all: everyone lives by it, whoever they are and whatever they believe. Every day at 11:11 local time people stop for sixty seconds, breathe, and thank GOD for the breath — each in their own words, each within themselves. In that minute we are One Breath.

WEBREATH — the Minute at 11:11, your own local time — we are One Breath