عیسائیت
واپس

ग़ज़लुल-ग़ज़लात 1

1सुलेमान की ग़ज़लुल-ग़ज़लात।

2वह मुझे अपने मुँह से बोसे दे, क्योंकि तेरी मुहब्बत मै से कहीं ज़्यादा राहतबख़्श है।

3तेरी इत्र की ख़ुशबू कितनी मनमोहन है, तेरा नाम छिड़का गया महकदार तेल ही है। इसलिए कुँवारियाँ तुझे प्यार करती हैं।

4आ, मुझे खींचकर अपने साथ ले जा! आ, हम दौड़कर चले जाएँ! बादशाह मुझे अपने कमरों में ले जाए, और हम बाग़ बाग़ होकर तेरी ख़ुशी मनाएँ। हम मै की निसबत तेरे प्यार की ज़्यादा तारीफ़ करें। मुनासिब है कि लोग तुझसे मुहब्बत करें।

5ऐ यरूशलम की बेटियो, मैं स्याहफ़ाम लेकिन मनमोहन हूँ, मैं क़ीदार के ख़ैमों जैसी, सुलेमान के ख़ैमों के परदों जैसी ख़ूबसूरत हूँ।

6इसलिए मुझे हक़ीर न जानो कि मैं स्याहफ़ाम हूँ, कि मेरी जिल्द धूप से झुलस गई है। मेरे सगे भाई मुझसे नाराज़ थे, इसलिए उन्होंने मुझे अंगूर के बाग़ों की देख-भाल करने की ज़िम्मादारी दी, अंगूर के अपने ज़ाती बाग़ की देख-भाल मैं कर न सकी।

7ऐ तू जो मेरी जान का प्यारा है, मुझे बता कि भेड़-बकरियाँ कहाँ चरा रहा है? तू उन्हें दोपहर के वक़्त कहाँ आराम करने बिठाता है? मैं क्यों निक़ाबपोश की तरह तेरे साथियों के रेवड़ों के पास ठहरी रहूँ?

8क्या तू नहीं जानती, तू जो औरतों में सबसे ख़ूबसूरत है? फिर घर से निकलकर खोज लगा कि मेरी भेड़-बकरियाँ किस तरफ़ चली गई हैं, अपने मेमनों को गल्लाबानों के ख़ैमों के पास चरा।

9मेरी महबूबा, मैं तुझे किस चीज़ से तशबीह दूँ? तू फ़िरौन का शानदार रथ खींचनेवाली घोड़ी है!

10तेरे गाल बालियों से कितने आरास्ता, तेरी गरदन मोती के गुलूबंद से कितनी दिलफ़रेब लगती है।

11हम तेरे लिए सोने का ऐसा हार बनवा लेंगे जिसमें चाँदी के मोती लगे होंगे।

12जितनी देर बादशाह ज़ियाफ़त में शरीक था मेरे बालछड़ की ख़ुशबू चारों तरफ़ फैलती रही।

13मेरा महबूब गोया मुर की डिबिया है, जो मेरी छातियों के दरमियान पड़ी रहती है।

14मेरा महबूब मेरे लिए मेहँदी के फूलों का गुच्छा है, जो ऐन-जदी के अंगूर के बाग़ों से लाया गया है।

15मेरी महबूबा, तू कितनी ख़ूबसूरत है, कितनी हसीन! तेरी आँखें कबूतर ही हैं।

16मेरे महबूब, तू कितना ख़ूबसूरत है, कितना दिलरुबा! सायादार हरियाली हमारा बिस्तर

17और देवदार के दरख़्त हमारे घर के शहतीर हैं। जूनीपर के दरख़्त तख़्तों का काम देते हैं।

ذریعہ: किताबे-मुक़द्दस

WEBREATH · 11:11

«He himself gives everyone life and breath and everything else» — Acts 17:25

Breath is one for all: everyone lives by it, whoever they are and whatever they believe. Every day at 11:11 local time people stop for sixty seconds, breathe, and thank GOD for the breath — each in their own words, each within themselves. In that minute we are One Breath.

WEBREATH — the Minute at 11:11, your own local time — we are One Breath