عیسائیت
واپس

ज़बूर 94

1ऐ रब, ऐ इंतक़ाम लेनेवाले ख़ुदा! ऐ इंतक़ाम लेनेवाले ख़ुदा, अपना नूर चमका।

2ऐ दुनिया के मुंसिफ़, उठकर मग़रूरों को उनके आमाल की मुनासिब सज़ा दे।

3ऐ रब, बेदीन कब तक, हाँ कब तक फ़तह के नारे लगाएँगे?

4वह कुफ़र की बातें उगलते रहते, तमाम बदकार शेख़ी मारते रहते हैं।

5ऐ रब, वह तेरी क़ौम को कुचल रहे, तेरी मौरूसी मिलकियत पर ज़ुल्म कर रहे हैं।

6बेवाओं और अजनबियों को वह मौत के घाट उतार रहे, यतीमों को क़त्ल कर रहे हैं।

7वह कहते हैं, “यह रब को नज़र नहीं आता, याक़ूब का ख़ुदा ध्यान ही नहीं देता।”

8ऐ क़ौम के नादानो, ध्यान दो! ऐ अहमक़ो, तुम्हें कब समझ आएगी?

9जिसने कान बनाया, क्या वह नहीं सुनता? जिसने आँख को तश्कील दिया क्या वह नहीं देखता?

10जो अक़वाम को तंबीह करता और इनसान को तालीम देता है क्या वह सज़ा नहीं देता?

11रब इनसान के ख़यालात जानता है, वह जानता है कि वह दम-भर के ही हैं।

12ऐ रब, मुबारक है वह जिसे तू तरबियत देता है, जिसे तू अपनी शरीअत की तालीम देता है

13ताकि वह मुसीबत के दिनों से आराम पाए और उस वक़्त तक सुकून से ज़िंदगी गुज़ारे जब तक बेदीनों के लिए गढ़ा तैयार न हो।

14क्योंकि रब अपनी क़ौम को रद्द नहीं करेगा, वह अपनी मौरूसी मिलकियत को तर्क नहीं करेगा।

15फ़ैसले दुबारा इनसाफ़ पर मबनी होंगे, और तमाम दियानतदार दिल उस की पैरवी करेंगे।

16कौन शरीरों के सामने मेरा दिफ़ा करेगा? कौन मेरे लिए बदकारों का सामना करेगा?

17अगर रब मेरा सहारा न होता तो मेरी जान जल्द ही ख़ामोशी के मुल्क में जा बसती।

18ऐ रब, जब मैं बोला, “मेरा पाँव डगमगाने लगा है” तो तेरी शफ़क़त ने मुझे सँभाला।

19जब तशवीशनाक ख़यालात मुझे बेचैन करने लगे तो तेरी तसल्लियों ने मेरी जान को ताज़ादम किया।

20ऐ अल्लाह, क्या तबाही की हुकूमत तेरे साथ मुत्तहिद हो सकती है, ऐसी हुकूमत जो अपने फ़रमानों से ज़ुल्म करती है? हरगिज़ नहीं!

21वह रास्तबाज़ की जान लेने के लिए आपस में मिल जाते और बेक़ुसूरों को क़ातिल ठहराते हैं।

22लेकिन रब मेरा क़िला बन गया है, और मेरा ख़ुदा मेरी पनाह की चट्टान साबित हुआ है।

23वह उनकी नाइनसाफ़ी उन पर वापस आने देगा और उनकी शरीर हरकतों के जवाब में उन्हें तबाह करेगा। रब हमारा ख़ुदा उन्हें नेस्त करेगा।

ذریعہ: किताबे-मुक़द्दस

WEBREATH · 11:11

«He himself gives everyone life and breath and everything else» — Acts 17:25

Breath is one for all: everyone lives by it, whoever they are and whatever they believe. Every day at 11:11 local time people stop for sixty seconds, breathe, and thank GOD for the breath — each in their own words, each within themselves. In that minute we are One Breath.

WEBREATH — the Minute at 11:11, your own local time — we are One Breath