عیسائیت
واپس

ज़बूर 88

1क़ोरह की औलाद का ज़बूर। मौसीक़ी के राहनुमा के लिए। तर्ज़ : महलत लअन्नोत। हैमान इज़राही का हिकमत का गीत। ऐ रब, ऐ मेरी नजात के ख़ुदा, दिन-रात मैं तेरे हुज़ूर चीख़ता-चिल्लाता हूँ।

2मेरी दुआ तेरे हुज़ूर पहुँचे, अपना कान मेरी चीख़ों की तरफ़ झुका।

3क्योंकि मेरी जान दुख से भरी है, और मेरी टाँगें क़ब्र में लटकी हुई हैं।

4मुझे उनमें शुमार किया जाता है जो पाताल में उतर रहे हैं। मैं उस मर्द की मानिंद हूँ जिसकी तमाम ताक़त जाती रही है।

5मुझे मुरदों में तनहा छोड़ा गया है, क़ब्र में उन मक़तूलों की तरह जिनका तू अब ख़याल नहीं रखता और जो तेरे हाथ के सहारे से मुंक़ते हो गए हैं।

6तूने मुझे सबसे गहरे गढ़े में, तारीकतरीन गहराइयों में डाल दिया है।

7तेरे ग़ज़ब का पूरा बोझ मुझ पर आ पड़ा है, तूने मुझे अपनी तमाम मौजों के नीचे दबा दिया है। (सिलाह)

8तूने मेरे क़रीबी दोस्तों को मुझसे दूर कर दिया है, और अब वह मुझसे घिन खाते हैं। मैं फँसा हुआ हूँ और निकल नहीं सकता।

9मेरी आँखें ग़म के मारे पज़मुरदा हो गई हैं। ऐ रब, दिन-भर मैं तुझे पुकारता, अपने हाथ तेरी तरफ़ उठाए रखता हूँ।

10क्या तू मुरदों के लिए मोजिज़े करेगा? क्या पाताल के बाशिंदे उठकर तेरी तमजीद करेंगे? (सिलाह)

11क्या लोग क़ब्र में तेरी शफ़क़त या पाताल में तेरी वफ़ा बयान करेंगे?

12क्या तारीकी में तेरे मोजिज़े या मुल्के-फ़रामोश में तेरी रास्ती मालूम हो जाएगी?

13लेकिन ऐ रब, मैं मदद के लिए तुझे पुकारता हूँ, मेरी दुआ सुबह-सवेरे तेरे सामने आ जाती है।

14ऐ रब, तू मेरी जान को क्यों रद्द करता, अपने चेहरे को मुझसे पोशीदा क्यों रखता है?

15मैं मुसीबतज़दा और जवानी से मौत के क़रीब रहा हूँ। तेरे दहशतनाक हमले बरदाश्त करते करते मैं जान से हाथ धो बैठा हूँ।

16तेरा भड़कता क़हर मुझ पर से गुज़र गया, तेरे हौलनाक कामों ने मुझे नाबूद कर दिया है।

17दिन-भर वह मुझे सैलाब की तरह घेरे रखते हैं, हर तरफ़ से मुझ पर हमलाआवर होते हैं।

18तूने मेरे दोस्तों और पड़ोसियों को मुझसे दूर कर रखा है। तारीकी ही मेरी क़रीबी दोस्त बन गई है।

ذریعہ: किताबे-मुक़द्दस

WEBREATH · 11:11

«He himself gives everyone life and breath and everything else» — Acts 17:25

Breath is one for all: everyone lives by it, whoever they are and whatever they believe. Every day at 11:11 local time people stop for sixty seconds, breathe, and thank GOD for the breath — each in their own words, each within themselves. In that minute we are One Breath.

WEBREATH — the Minute at 11:11, your own local time — we are One Breath