عیسائیت
واپس

ज़बूर 71

1ऐ रब, मैंने तुझमें पनाह ली है। मुझे कभी शरमिंदा न होने दे।

2अपनी रास्ती से मुझे बचाकर छुटकारा दे। अपना कान मेरी तरफ़ झुकाकर मुझे नजात दे।

3मेरे लिए चट्टान पर महफ़ूज़ घर हो जिसमें मैं हर वक़्त पनाह ले सकूँ। तूने फ़रमाया है कि मुझे नजात देगा, क्योंकि तू ही मेरी चट्टान और मेरा क़िला है।

4ऐ मेरे ख़ुदा, मुझे बेदीन के हाथ से बचा, उसके क़ब्ज़े से जो बेइनसाफ़ और ज़ालिम है।

5क्योंकि तू ही मेरी उम्मीद है। ऐ रब क़ादिरे-मुतलक़, तू मेरी जवानी ही से मेरा भरोसा रहा है।

6पैदाइश से ही मैंने तुझ पर तकिया किया है, माँ के पेट से तूने मुझे सँभाला है। मैं हमेशा तेरी हम्दो-सना करूँगा।

7बहुतों के नज़दीक मैं बदशुगूनी हूँ, लेकिन तू मेरी मज़बूत पनाहगाह है।

8दिन-भर मेरा मुँह तेरी तमजीद और ताज़ीम से लबरेज़ रहता है।

9बुढ़ापे में मुझे रद्द न कर, ताक़त के ख़त्म होने पर मुझे तर्क न कर।

10क्योंकि मेरे दुश्मन मेरे बारे में बातें कर रहे हैं, जो मेरी जान की ताक लगाए बैठे हैं वह एक दूसरे से सलाह-मशवरा कर रहे हैं।

11वह कहते हैं, “अल्लाह ने उसे तर्क कर दिया है। उसके पीछे पड़कर उसे पकड़ो, क्योंकि कोई नहीं जो उसे बचाए।”

12ऐ अल्लाह, मुझसे दूर न हो। ऐ मेरे ख़ुदा, मेरी मदद करने में जल्दी कर।

13मेरे हरीफ़ शरमिंदा होकर फ़ना हो जाएँ, जो मुझे नुक़सान पहुँचाने के दरपै हैं वह लान-तान और रुसवाई तले दब जाएँ।

14लेकिन मैं हमेशा तेरे इंतज़ार में रहूँगा, हमेशा तेरी सताइश करता रहूँगा।

15मेरा मुँह तेरी रास्ती सुनाता रहेगा, सारा दिन तेरे नजातबख़्श कामों का ज़िक्र करता रहेगा, गो मैं उनकी पूरी तादाद गिन भी नहीं सकता।

16मैं रब क़ादिरे-मुतलक़ के अज़ीम काम सुनाते हुए आऊँगा, मैं तेरी, सिर्फ़ तेरी ही रास्ती याद करूँगा।

17ऐ अल्लाह, तू मेरी जवानी से मुझे तालीम देता रहा है, और आज तक मैं तेरे मोजिज़ात का एलान करता आया हूँ।

18ऐ अल्लाह, ख़ाह मैं बूढ़ा हो जाऊँ और मेरे बाल सफ़ेद हो जाएँ मुझे तर्क न कर जब तक मैं आनेवाली पुश्त के तमाम लोगों को तेरी क़ुव्वत और क़ुदरत के बारे में बता न लूँ।

19ऐ अल्लाह, तेरी रास्ती आसमान से बातें करती है। ऐ अल्लाह, तुझ जैसा कौन है जिसने इतने अज़ीम काम किए हैं?

20तूने मुझे मुतअद्दिद तलख़ तजरबों में से गुज़रने दिया है, लेकिन तू मुझे दुबारा ज़िंदा भी करेगा, तू मुझे ज़मीन की गहराइयों में से वापस लाएगा।

21मेरा रुतबा बढ़ा दे, मुझे दुबारा तसल्ली दे।

22ऐ मेरे ख़ुदा, मैं सितार बजाकर तेरी सताइश और तेरी वफ़ादारी की तमजीद करूँगा। ऐ इसराईल के क़ुद्दूस, मैं सरोद बजाकर तेरी तारीफ़ में गीत गाऊँगा।

23जब मैं तेरी मद्हसराई करूँगा तो मेरे होंट ख़ुशी के नारे लगाएँगे, और मेरी जान जिसे तूने फ़िद्या देकर छुड़ाया है शादियाना बजाएगी।

24मेरी ज़बान भी दिन-भर तेरी रास्ती बयान करेगी, क्योंकि जो मुझे नुक़सान पहुँचाना चाहते थे वह शर्मसार और रुसवा हो गए हैं।

ذریعہ: किताबे-मुक़द्दस

WEBREATH · 11:11

«He himself gives everyone life and breath and everything else» — Acts 17:25

Breath is one for all: everyone lives by it, whoever they are and whatever they believe. Every day at 11:11 local time people stop for sixty seconds, breathe, and thank GOD for the breath — each in their own words, each within themselves. In that minute we are One Breath.

WEBREATH — the Minute at 11:11, your own local time — we are One Breath