عیسائیت
واپس

ज़बूर 68

1दाऊद का ज़बूर। मौसीक़ी के राहनुमा के लिए गीत। अल्लाह उठे तो उसके दुश्मन तित्तर-बित्तर हो जाएंगे, उससे नफ़रत करनेवाले उसके सामने से भाग जाएंगे।

2वह धुएँ की तरह बिखर जाएंगे। जिस तरह मोम आग के सामने पिघल जाता है उसी तरह बेदीन अल्लाह के हुज़ूर हलाक हो जाएंगे।

3लेकिन रास्तबाज़ ख़ुशो-ख़ुर्रम होंगे, वह अल्लाह के हुज़ूर जशन मनाकर फूले न समाएँगे।

4अल्लाह की ताज़ीम में गीत गाओ, उसके नाम की मद्हसराई करो! जो रथ पर सवार बयाबान में से गुज़र रहा है उसके लिए रास्ता तैयार करो। रब उसका नाम है, उसके हुज़ूर ख़ुशी मनाओ!

5अल्लाह अपनी मुक़द्दस सुकूनतगाह में यतीमों का बाप और बेवाओं का हामी है।

6अल्लाह बेघरों को घरों में बसा देता और क़ैदियों को क़ैद से निकालकर ख़ुशहाली अता करता है। लेकिन जो सरकश हैं वह झुलसे हुए मुल्क में रहेंगे।

7ऐ अल्लाह, जब तू अपनी क़ौम के आगे आगे निकला, जब तू रेगिस्तान में क़दम बक़दम आगे बढ़ा (सिलाह)

8तो ज़मीन लरज़ उठी और आसमान से बारिश टपकने लगी। हाँ, अल्लाह के हुज़ूर जो कोहे-सीना और इसराईल का ख़ुदा है ऐसा ही हुआ।

9ऐ अल्लाह, तूने कसरत की बारिश बरसने दी। जब कभी तेरा मौरूसी मुल्क निढाल हुआ तो तूने उसे ताज़ादम किया।

10यों तेरी क़ौम उसमें आबाद हुई। ऐ अल्लाह, अपनी भलाई से तूने उसे ज़रूरतमंदों के लिए तैयार किया।

11रब फ़रमान सादिर करता है तो ख़ुशख़बरी सुनानेवाली औरतों का बड़ा लशकर निकलता है,

12“फ़ौजों के बादशाह भाग रहे हैं। वह भाग रहे हैं और औरतें लूट का माल तक़सीम कर रही हैं।

13तुम क्यों अपने ज़ीन के दो बोरों के दरमियान बैठे रहते हो? देखो, कबूतर के परों पर चाँदी और उसके शाहपरों पर पीला सोना चढ़ाया गया है।”

14जब क़ादिरे-मुतलक़ ने वहाँ के बादशाहों को मुंतशिर कर दिया तो कोहे-ज़लमोन पर बर्फ़ पड़ी।

15कोहे-बसन इलाही पहाड़ है, कोहे-बसन की मुतअद्दिद चोटियाँ हैं।

16ऐ पहाड़ की मुतअद्दिद चोटियो, तुम उस पहाड़ को क्यों रश्क की निगाह से देखती हो जिसे अल्लाह ने अपनी सुकूनतगाह के लिए पसंद किया है? यक़ीनन रब वहाँ हमेशा के लिए सुकूनत करेगा।

17अल्लाह के बेशुमार रथ और अनगिनत फ़ौजी हैं। ख़ुदावंद उनके दरमियान है, सीना का ख़ुदा मक़दिस में है।

18तूने बुलंदी पर चढ़कर क़ैदियों का हुजूम गिरिफ़्तार कर लिया, तुझे इनसानों से तोह्फ़े मिले, उनसे भी जो सरकश हो गए थे। यों ही रब ख़ुदा वहाँ सुकूनतपज़ीर हुआ।

19रब की तमजीद हो जो रोज़ बरोज़ हमारा बोझ उठाए चलता है। अल्लाह हमारी नजात है। (सिलाह)

20हमारा ख़ुदा वह ख़ुदा है जो हमें बार बार नजात देता है, रब क़ादिरे-मुतलक़ हमें बार बार मौत से बचने के रास्ते मुहैया करता है।

21यक़ीनन अल्लाह अपने दुश्मनों के सरों को कुचल देगा। जो अपने गुनाहों से बाज़ नहीं आता उस की खोपड़ी वह पाश पाश करेगा।

22रब ने फ़रमाया, “मैं उन्हें बसन से वापस लाऊँगा, समुंदर की गहराइयों से वापस पहुँचाऊँगा।

23तब तू अपने पाँवों को दुश्मन के ख़ून में धो लेगा, और तेरे कुत्ते उसे चाट लेंगे।”

24ऐ अल्लाह, तेरे जुलूस नज़र आ गए हैं, मेरे ख़ुदा और बादशाह के जुलूस मक़दिस में दाख़िल होते हुए नज़र आ गए हैं।

25आगे गुलूकार, फिर साज़ बजानेवाले चल रहे हैं। उनके आस-पास कुँवारियाँ दफ़ बजाते हुए फिर रही हैं।

26“जमातों में अल्लाह की सताइश करो! जितने भी इसराईल के सरचश्मे से निकले हुए हो रब की तमजीद करो!”

27वहाँ सबसे छोटा भाई बिनयमीन आगे चल रहा है, फिर यहूदाह के बुज़ुर्गों का पुरशोर हुजूम ज़बूलून और नफ़ताली के बुज़ुर्गों के साथ चल रहा है।

28ऐ अल्लाह, अपनी क़ुदरत बरूए-कार ला! ऐ अल्लाह, जो क़ुदरत तूने पहले भी हमारी ख़ातिर दिखाई उसे दुबारा दिखा!

29उसे यरूशलम के ऊपर अपनी सुकूनतगाह से दिखा। तब बादशाह तेरे हुज़ूर तोह्फ़े लाएँगे।

30सरकंडों में छुपे हुए दरिंदे को मलामत कर! साँडों का जो ग़ोल बछड़ों जैसी क़ौमों में रहता है उसे डाँट! उन्हें कुचल दे जो चाँदी को प्यार करते हैं। उन क़ौमों को मुंतशिर कर जो जंग करने से लुत्फ़अंदोज़ होती हैं।

31मिसर से सफ़ीर आएँगे, एथोपिया अपने हाथ अल्लाह की तरफ़ उठाएगा।

32ऐ दुनिया की सलतनतो, अल्लाह की ताज़ीम में गीत गाओ! रब की मद्हसराई करो (सिलाह)

33जो अपने रथ पर सवार होकर क़दीम ज़माने के बुलंदतरीन आसमानों में से गुज़रता है। सुनो उस की आवाज़ जो ज़ोर से गरज रहा है।

34अल्लाह की क़ुदरत को तसलीम करो! उस की अज़मत इसराईल पर छाई रहती और उस की क़ुदरत आसमान पर है।

35ऐ अल्लाह, तू अपने मक़दिस से ज़ाहिर होते वक़्त कितना महीब है। इसराईल का ख़ुदा ही क़ौम को क़ुव्वत और ताक़त अता करता है। अल्लाह की तमजीद हो!

ذریعہ: किताबे-मुक़द्दस

WEBREATH · 11:11

«He himself gives everyone life and breath and everything else» — Acts 17:25

Breath is one for all: everyone lives by it, whoever they are and whatever they believe. Every day at 11:11 local time people stop for sixty seconds, breathe, and thank GOD for the breath — each in their own words, each within themselves. In that minute we are One Breath.

WEBREATH — the Minute at 11:11, your own local time — we are One Breath