عیسائیت
واپس

ज़बूर 38

1दाऊद का ज़बूर। याददाश्त के लिए। ऐ रब, अपने ग़ज़ब में मुझे सज़ा न दे, क़हर में मुझे तंबीह न कर!

2क्योंकि तेरे तीर मेरे जिस्म में लग गए हैं, तेरा हाथ मुझ पर भारी है।

3तेरी लानत के बाइस मेरा पूरा जिस्म बीमार है, मेरे गुनाह के बाइस मेरी तमाम हड्डियाँ गलने लगी हैं।

4क्योंकि मैं अपने गुनाहों के सैलाब में डूब गया हूँ, वह नाक़ाबिले-बरदाश्त बोझ बन गए हैं।

5मेरी हमाक़त के बाइस मेरे ज़ख़मों से बदबू आने लगी, वह गलने लगे हैं।

6मैं कुबड़ा बनकर ख़ाक में दब गया हूँ, पूरा दिन मातमी लिबास पहने फिरता हूँ।

7मेरी कमर में शदीद सोज़िश है, पूरा जिस्म बीमार है।

8मैं निढाल और पाश पाश हो गया हूँ। दिल के अज़ाब के बाइस मैं चीख़ता-चिल्लाता हूँ।

9ऐ रब, मेरी तमाम आरज़ू तेरे सामने है, मेरी आहें तुझसे पोशीदा नहीं रहतीं।

10मेरा दिल ज़ोर से धड़कता, मेरी ताक़त जवाब दे गई बल्कि मेरी आँखों की रौशनी भी जाती रही है।

11मेरे दोस्त और साथी मेरी मुसीबत देखकर मुझसे गुरेज़ करते, मेरे क़रीब के रिश्तेदार दूर खड़े रहते हैं।

12मेरे जानी दुश्मन फंदे बिछा रहे हैं, जो मुझे नुक़सान पहुँचाना चाहते हैं वह धमकियाँ दे रहे और सारा सारा दिन फ़रेबदेह मनसूबे बाँध रहे हैं।

13और मैं? मैं तो गोया बहरा हूँ, मैं नहीं सुनता। मैं गूँगे की मानिंद हूँ जो अपना मुँह नहीं खोलता।

14मैं ऐसा शख़्स बन गया हूँ जो न सुनता, न जवाब में एतराज़ करता है।

15क्योंकि ऐ रब, मैं तेरे इंतज़ार में हूँ। ऐ रब मेरे ख़ुदा, तू ही मेरी सुनेगा।

16मैं बोला, “ऐसा न हो कि वह मेरा नुक़सान देखकर बग़लें बजाएँ, वह मेरे पाँवों के डगमगाने पर मुझे दबाकर अपने आप पर फ़ख़र करें।”

17क्योंकि मैं लड़खड़ाने को हूँ, मेरी अज़ियत मुतवातिर मेरे सामने रहती है।

18चुनाँचे मैं अपना क़ुसूर तसलीम करता हूँ, मैं अपने गुनाह के बाइस ग़मगीन हूँ।

19मेरे दुश्मन ज़िंदा और ताक़तवर हैं, और जो बिलावजह मुझसे नफ़रत करते हैं वह बहुत हैं।

20वह नेकी के बदले बदी करते हैं। वह इसलिए मेरे दुश्मन हैं कि मैं भलाई के पीछे लगा रहता हूँ।

21ऐ रब, मुझे तर्क न कर! ऐ अल्लाह, मुझसे दूर न रह!

22ऐ रब मेरी नजात, मेरी मदद करने में जल्दी कर!

ذریعہ: किताबे-मुक़द्दस

WEBREATH · 11:11

«He himself gives everyone life and breath and everything else» — Acts 17:25

Breath is one for all: everyone lives by it, whoever they are and whatever they believe. Every day at 11:11 local time people stop for sixty seconds, breathe, and thank GOD for the breath — each in their own words, each within themselves. In that minute we are One Breath.

WEBREATH — the Minute at 11:11, your own local time — we are One Breath