عیسائیت
واپس

ज़बूर 105

1रब का शुक्र करो और उसका नाम पुकारो! अक़वाम में उसके कामों का एलान करो।

2साज़ बजाकर उस की मद्हसराई करो। उसके तमाम अजायब के बारे में लोगों को बताओ।

3उसके मुक़द्दस नाम पर फ़ख़र करो। रब के तालिब दिल से ख़ुश हों।

4रब और उस की क़ुदरत की दरियाफ़्त करो, हर वक़्त उसके चेहरे के तालिब रहो।

5जो मोजिज़े उसने किए उन्हें याद करो। उसके इलाही निशान और उसके मुँह के फ़ैसले दोहराते रहो।

6तुम जो उसके ख़ादिम इब्राहीम की औलाद और याक़ूब के फ़रज़ंद हो, जो उसके बरगुज़ीदा लोग हो, तुम्हें सब कुछ याद रहे!

7वही रब हमारा ख़ुदा है, वही पूरी दुनिया की अदालत करता है।

8वह हमेशा अपने अहद का ख़याल रखता है, उस कलाम का जो उसने हज़ार पुश्तों के लिए फ़रमाया था।

9यह वह अहद है जो उसने इब्राहीम से बाँधा, वह वादा जो उसने क़सम खाकर इसहाक़ से किया था।

10उसने उसे याक़ूब के लिए क़ायम किया ताकि वह उसके मुताबिक़ ज़िंदगी गुज़ारे, उसने तसदीक़ की कि यह मेरा इसराईल से अबदी अहद है।

11साथ साथ उसने फ़रमाया, “मैं तुझे मुल्के-कनान दूँगा। यह तेरी मीरास का हिस्सा होगा।”

12उस वक़्त वह तादाद में कम और थोड़े ही थे बल्कि मुल्क में अजनबी ही थे।

13अब तक वह मुख़्तलिफ़ क़ौमों और सलतनतों में घुमते-फिरते थे।

14लेकिन अल्लाह ने उन पर किसी को ज़ुल्म करने न दिया, और उनकी ख़ातिर उसने बादशाहों को डाँटा,

15“मेरे मसह किए हुए ख़ादिमों को मत छेड़ना, मेरे नबियों को नुक़सान मत पहुँचाना।”

16फिर अल्लाह ने मुल्के-कनान में काल पड़ने दिया और ख़ुराक का हर ज़ख़ीरा ख़त्म किया।

17लेकिन उसने उनके आगे आगे एक आदमी को मिसर भेजा यानी यूसुफ़ को जो ग़ुलाम बनकर फ़रोख़्त हुआ।

18उसके पाँव और गरदन ज़ंजीरों में जकड़े रहे

19जब तक वह कुछ पूरा न हुआ जिसकी पेशगोई यूसुफ़ ने की थी, जब तक रब के फ़रमान ने उस की तसदीक़ न की।

20तब मिसरी बादशाह ने अपने बंदों को भेजकर उसे रिहाई दी, क़ौमों के हुक्मरान ने उसे आज़ाद किया।

21उसने उसे अपने घराने पर निगरान और अपनी तमाम मिलकियत पर हुक्मरान मुक़र्रर किया।

22यूसुफ़ को फ़िरौन के रईसों को अपनी मरज़ी के मुताबिक़ चलाने और मिसरी बुज़ुर्गों को हिकमत की तालीम देने की ज़िम्मादारी भी दी गई।

23फिर याक़ूब का ख़ानदान मिसर आया, और इसराईल हाम के मुल्क में अजनबी की हैसियत से बसने लगा।

24वहाँ अल्लाह ने अपनी क़ौम को बहुत फलने फूलने दिया, उसने उसे उसके दुश्मनों से ज़्यादा ताक़तवर बना दिया।

25साथ साथ उसने मिसरियों का रवैया बदल दिया, तो वह उस की क़ौम इसराईल से नफ़रत करके रब के ख़ादिमों से चालाकियाँ करने लगे।

26तब अल्लाह ने अपने ख़ादिम मूसा और अपने चुने हुए बंदे हारून को मिसर में भेजा।

27मुल्के-हाम में आकर उन्होंने उनके दरमियान अल्लाह के इलाही निशान और मोजिज़े दिखाए।

28अल्लाह के हुक्म पर मिसर पर तारीकी छा गई, मुल्क में अंधेरा हो गया। लेकिन उन्होंने उसके फ़रमान न माने।

29उसने उनका पानी ख़ून में बदलकर उनकी मछलियों को मरवा दिया।

30मिसर के मुल्क पर मेंढकों के ग़ोल छा गए जो उनके हुक्मरानों के अंदरूनी कमरों तक पहुँच गए।

31अल्लाह के हुक्म पर मिसर के पूरे इलाक़े में मक्खियों और जुओं के ग़ोल फैल गए।

32बारिश की बजाए उसने उनके मुल्क पर ओले और दहकते शोले बरसाए।

33उसने उनकी अंगूर की बेलें और अंजीर के दरख़्त तबाह कर दिए, उनके इलाक़े के दरख़्त तोड़ डाले।

34उसके हुक्म पर अनगिनत टिड्डियाँ अपने बच्चों समेत मुल्क पर हमलाआवर हुईं।

35वह उनके मुल्क की तमाम हरियाली और उनके खेतों की तमाम पैदावार चट कर गईं।

36फिर अल्लाह ने मिसर में तमाम पहलौठों को मार डाला, उनकी मरदानगी का पहला फल तमाम हुआ।

37इसके बाद वह इसराईल को चाँदी और सोने से नवाज़कर मिसर से निकाल लाया। उस वक़्त उसके क़बीलों में ठोकर खानेवाला एक भी नहीं था।

38मिसर ख़ुश था जब वह रवाना हुए, क्योंकि उन पर इसराईल की दहशत छा गई थी।

39दिन को अल्लाह ने उनके ऊपर बादल कम्बल की तरह बिछा दिया, रात को आग मुहैया की ताकि रौशनी हो।

40जब उन्होंने ख़ुराक माँगी तो उसने उन्हें बटेर पहुँचाकर आसमानी रोटी से सेर किया।

41उसने चट्टान को चाक किया तो पानी फूट निकला, और रेगिस्तान में पानी की नदियाँ बहने लगीं।

42क्योंकि उसने उस मुक़द्दस वादे का ख़याल रखा जो उसने अपने ख़ादिम इब्राहीम से किया था।

43चुनाँचे वह अपनी चुनी हुई क़ौम को मिसर से निकाल लाया, और वह ख़ुशी और शादमानी के नारे लगाकर निकल आए।

44उसने उन्हें दीगर अक़वाम के ममालिक दिए, और उन्होंने दीगर उम्मतों की मेहनत के फल पर क़ब्ज़ा किया।

45क्योंकि वह चाहता था कि वह उसके अहकाम और हिदायात के मुताबिक़ ज़िंदगी गुज़ारें। रब की हम्द हो।

ذریعہ: किताबे-मुक़द्दस

WEBREATH · 11:11

«He himself gives everyone life and breath and everything else» — Acts 17:25

Breath is one for all: everyone lives by it, whoever they are and whatever they believe. Every day at 11:11 local time people stop for sixty seconds, breathe, and thank GOD for the breath — each in their own words, each within themselves. In that minute we are One Breath.

WEBREATH — the Minute at 11:11, your own local time — we are One Breath