عیسائیت
واپس

अमसाल 8

1सुनो! क्या हिकमत आवाज़ नहीं देती? हाँ, समझ ऊँची आवाज़ से एलान करती है।

2वह बुलंदियों पर खड़ी है, उस जगह जहाँ तमाम रास्ते एक दूसरे से मिलते हैं।

3शहर के दरवाज़ों पर जहाँ लोग निकलते और दाख़िल होते हैं वहाँ हिकमत ज़ोरदार आवाज़ से पुकारती है,

4“ऐ मर्दो, मैं तुम्हीं को पुकारती हूँ, तमाम इनसानों को आवाज़ देती हूँ।

5ऐ सादालौहो, होशियारी सीख लो! ऐ अहमक़ो, समझ अपना लो!

6सुनो, क्योंकि मैं शराफ़त की बातें करती हूँ, और मेरे होंट सच्चाई पेश करते हैं।

7मेरा मुँह सच बोलता है, क्योंकि मेरे होंट बेदीनी से घिन खाते हैं।

8जो भी बात मेरे मुँह से निकले वह रास्त है, एक भी पेचदार या टेढ़ी नहीं है।

9समझदार जानता है कि मेरी बातें सब दुरुस्त हैं, इल्म रखनेवाले को मालूम है कि वह सहीह हैं।

10चाँदी की जगह मेरी तरबियत और ख़ालिस सोने के बजाए इल्मो-इरफ़ान अपना लो।

11क्योंकि हिकमत मोतियों से कहीं बेहतर है, कोई भी ख़ज़ाना उसका मुक़ाबला नहीं कर सकता।

12मैं जो हिकमत हूँ होशियारी के साथ बसती हूँ, और मैं तमीज़ का इल्म रखती हूँ।

13जो रब का ख़ौफ़ मानता है वह बुराई से नफ़रत करता है। मुझे ग़ुरूर, तकब्बुर, ग़लत चाल-चलन और टेढ़ी बातों से नफ़रत है।

14मेरे पास अच्छा मशवरा और कामयाबी है। मेरा दूसरा नाम समझ है, और मुझे क़ुव्वत हासिल है।

15मेरे वसीले से बादशाह सलतनत और हुक्मरान रास्त फ़ैसले करते हैं।

16मेरे ज़रीए रईस और शुरफ़ा बल्कि तमाम आदिल मुंसिफ़ हुकूमत करते हैं।

17जो मुझे प्यार करते हैं उन्हें मैं प्यार करती हूँ, और जो मुझे ढूँडते हैं वह मुझे पा लेते हैं।

18मेरे पास इज़्ज़तो-दौलत, शानदार माल और रास्ती है।

19मेरा फल सोने बल्कि ख़ालिस सोने से कहीं बेहतर है, मेरी पैदावार ख़ालिस चाँदी पर सबक़त रखती है।

20मैं रास्ती की राह पर ही चलती हूँ, वहीं जहाँ इनसाफ़ है।

21जो मुझसे मुहब्बत रखते हैं उन्हें मैं मीरास में दौलत मुहैया करती हूँ। उनके गोदाम भरे रहते हैं।

22जब रब तख़लीक़ का सिलसिला अमल में लाया तो पहले उसने मुझे ही बनाया। क़दीम ज़माने में मैं उसके दीगर कामों से पहले ही वुजूद में आई।

23मुझे अज़ल से मुक़र्रर किया गया, इब्तिदा ही से जब दुनिया अभी पैदा नहीं हुई थी।

24न समुंदर की गहराइयाँ, न कसरत से फूटनेवाले चश्मे थे जब मैंने जन्म लिया।

25न पहाड़ अपनी अपनी जगह पर क़ायम हुए थे, न पहाड़ियाँ थीं जब मैं पैदा हुई।

26उस वक़्त अल्लाह ने न ज़मीन, न उसके मैदान, और न दुनिया के पहले ढेले बनाए थे।

27जब उसने आसमान को उस की जगह पर लगाया और समुंदर की गहराइयों पर ज़मीन का इलाक़ा मुक़र्रर किया तो मैं साथ थी।

28जब उसने आसमान पर बादलों और गहराइयों में सरचश्मों का इंतज़ाम मज़बूत किया तो मैं साथ थी।

29जब उसने समुंदर की हद्दें मुक़र्रर कीं और हुक्म दिया कि पानी उनसे तजावुज़ न करे, जब उसने ज़मीन की बुनियादें अपनी अपनी जगह पर रखीं

30तो मैं माहिर कारीगर की हैसियत से उसके साथ थी। रोज़ बरोज़ मैं लुत्फ़ का बाइस थी, हर वक़्त उसके हुज़ूर रंगरलियाँ मनाती रही।

31मैं उस की ज़मीन की सतह पर रंगरलियाँ मनाती और इनसान से लुत्फ़अंदोज़ होती रही।

32चुनाँचे मेरे बेटो, मेरी सुनो, क्योंकि मुबारक हैं वह जो मेरी राहों पर चलते हैं।

33मेरी तरबियत मानकर दानिशमंद बन जाओ, उसे नज़रंदाज़ मत करना।

34मुबारक है वह जो मेरी सुने, जो रोज़ बरोज़ मेरे दरवाज़े पर चौकस खड़ा रहे, रोज़ाना मेरी चौखट पर हाज़िर रहे।

35क्योंकि जो मुझे पाए वह ज़िंदगी और रब की मंज़ूरी पाता है।

36लेकिन जो मुझे पाने से क़ासिर रहे वह अपनी जान पर ज़ुल्म करता है, जो भी मुझसे नफ़रत करे उसे मौत प्यारी है।”

ذریعہ: किताबे-मुक़द्दस

WEBREATH · 11:11

«He himself gives everyone life and breath and everything else» — Acts 17:25

Breath is one for all: everyone lives by it, whoever they are and whatever they believe. Every day at 11:11 local time people stop for sixty seconds, breathe, and thank GOD for the breath — each in their own words, each within themselves. In that minute we are One Breath.

WEBREATH — the Minute at 11:11, your own local time — we are One Breath