عیسائیت
واپس

नाहूम 2

1ऐ नीनवा, सब कुछ मुंतशिर करनेवाला तुझ पर हमला करने आ रहा है, चुनाँचे क़िले की पहरादारी कर! रास्ते पर ध्यान दे, कमरबस्ता हो जा, जहाँ तक मुमकिन है दिफ़ा की तैयारियाँ कर!

2गो याक़ूब तबाह और उसके अंगूरों के बाग़ नाबूद हो गए हैं, लेकिन अब रब इसराईल की शानो-शौकत बहाल करेगा।

3वह देखो, नीनवा पर हमला करनेवाले सूरमाओं की ढालें सुर्ख़ हैं, फ़ौजी क़िरमिज़ी रंग की वरदियाँ पहने हुए हैं। दुश्मन ने अपने रथों को तैयार कर रखा है, और वह भड़कती मशालों की तरह चमक रहे हैं। साथ साथ सिपाही अपने नेज़े लहरा रहे हैं।

4अब रथ गलियों में से अंधा-धुंध गुज़र रहे हैं। चौकों में वह इधर-उधर भाग रहे हैं। यों लग रहा है कि भड़कती मशालें या बादल की बिजलियाँ इधर-उधर चमक रही हैं।

5हुक्मरान अपने चीदा अफ़सरों को बुला लेता है, और वह ठोकर खा खाकर आगे बढ़ते हैं। वह दौड़कर फ़सील के पास पहुँच जाते, जल्दी से हिफ़ाज़ती ढाल खड़ी करते हैं।

6फिर दरिया के दरवाज़े खुल जाते और शाही महल लड़खड़ाने लगता है।

7तब दुश्मन मलिका के कपड़े उतारकर उसे ले जाते हैं। उस की लौंडियाँ छाती पीट पीटकर कबूतरों की तरह ग़ूँ ग़ूँ करती हैं।

8नीनवा बड़ी देर से अच्छे-ख़ासे तालाब की मानिंद था, लेकिन अब लोग उससे भाग रहे हैं। लोगों को कहा जाता है, “रुक जाओ, रुको तो सही!” लेकिन कोई नहीं रुकता। सब सर पर पाँव रखकर शहर से भाग रहे हैं, और कोई नहीं मुड़ता।

9आओ, नीनवा की चाँदी लूट लो, उसका सोना छीन लो! क्योंकि ज़ख़ीरे की इंतहा नहीं, उसके ख़ज़ानों की दौलत लामहदूद है।

10लूटनेवाले कुछ नहीं छोड़ते। जल्द ही शहर ख़ाली और वीरानो-सुनसान हो जाता है। हर दिल हौसला हार जाता, हर घुटना काँप उठता, हर कमर थरथराने लगती और हर चेहरे का रंग माँद पड़ जाता है।

11अब नीनवा बेटी की क्या हैसियत रही? पहले वह शेरबबर की माँद थी, ऐसी जगह जहाँ जवान शेरों को गोश्त खिलाया जाता, जहाँ शेर और शेरनी अपने बच्चों समेत टहलते थे। कोई उन्हें डराकर भगा नहीं सकता था।

12उस वक़्त शेर अपने बच्चों के लिए बहुत कुछ फाड़ लेता और अपनी शेरनियों के लिए भी गला घूँटकर मार डालता था। उस की माँदें और छुपने की जगहें फाड़े हुए शिकार से भरी रहती थीं।

13रब्बुल-अफ़वाज फ़रमाता है, “ऐ नीनवा, अब मैं तुझसे निपट लेता हूँ। मैं तेरे रथों को नज़रे-आतिश कर दूँगा, और तेरे जवान शेर तलवार की ज़द में आकर मर जाएंगे। मैं होने दूँगा कि आइंदा तुझे ज़मीन पर कुछ न मिले जिसे फाड़कर खा सके। आइंदा तेरे क़ासिदों की आवाज़ कभी सुनाई नहीं देगी।”

ذریعہ: किताबे-मुक़द्दस

WEBREATH · 11:11

«He himself gives everyone life and breath and everything else» — Acts 17:25

Breath is one for all: everyone lives by it, whoever they are and whatever they believe. Every day at 11:11 local time people stop for sixty seconds, breathe, and thank GOD for the breath — each in their own words, each within themselves. In that minute we are One Breath.

WEBREATH — the Minute at 11:11, your own local time — we are One Breath