عیسائیت
واپس

नोहा 5

1ऐ रब, याद कर कि हमारे साथ क्या कुछ हुआ! ग़ौर कर कि हमारी कैसी रुसवाई हुई है।

2हमारी मौरूसी मिलकियत परदेसियों के हवाले की गई, हमारे घर अजनबियों के हाथ में आ गए हैं।

3हम वालिदों से महरूम होकर यतीम हो गए हैं, हमारी माएँ बेवाओं की तरह ग़ैरमहफ़ूज़ हैं।

4ख़ाह पीने का पानी हो या लकड़ी, हर चीज़ की पूरी क़ीमत अदा करनी पड़ती है, हालाँकि यह हमारी अपनी ही चीज़ें थीं।

5हमारा ताक़्क़ुब करनेवाले हमारे सर पर चढ़ आए हैं, और हम थक गए हैं। कहीं भी सुकून नहीं मिलता।

6हमने अपने आपको मिसर और असूर के हवाले कर दिया ताकि रोटी मिल जाए और भूके न मरें।

7हमारे बापदादा ने गुनाह किया, लेकिन वह कूच कर गए हैं। अब हम ही उनकी सज़ा भुगत रहे हैं।

8ग़ुलाम हम पर हुकूमत करते हैं, और कोई नहीं है जो हमें उनके हाथ से बचाए।

9हम अपनी जान को ख़तरे में डालकर रोज़ी कमाते हैं, क्योंकि बयाबान में तलवार हमारी ताक में बैठी रहती है।

10भूक के मारे हमारी जिल्द तनूर जैसी गरम होकर चुरमुर हो गई है।

11सिय्यून में औरतों की इसमतदरी, यहूदाह के शहरों में कुँवारियों की बेहुरमती हुई है।

12दुश्मन ने रईसों को फाँसी देकर बुज़ुर्गों की बेइज़्ज़ती की है।

13नौजवानों को चक्की का पाट उठाए फिरना है, लड़के लकड़ी के बोझ तले डगमगाकर गिर जाते हैं।

14अब बुज़ुर्ग शहर के दरवाज़े से और जवान अपने साज़ों से बाज़ रहते हैं।

15ख़ुशी हमारे दिलों से जाती रही है, हमारा लोकनाच आहो-ज़ारी में बदल गया है।

16ताज हमारे सर पर से गिर गया है। हम पर अफ़सोस, हमसे गुनाह सरज़द हुआ है।

17इसी लिए हमारा दिल निढाल हो गया, हमारी नज़र धुँधला गई है।

18क्योंकि कोहे-सिय्यून तबाह हुआ है, लोमड़ियाँ उस की गलियों में फिरती हैं।

19ऐ रब, तेरा राज अबदी है, तेरा तख़्त पुश्त-दर-पुश्त क़ायम रहता है।

20तू हमें हमेशा तक क्यों भूलना चाहता है? तूने हमें इतनी देर तक क्यों तर्क किए रखा है?

21ऐ रब, हमें अपने पास वापस ला ताकि हम वापस आ सकें। हमें बहाल कर ताकि हमारा हाल पहले की तरह हो।

22या क्या तूने हमें हतमी तौर पर मुस्तरद कर दिया है? क्या तेरा हम पर ग़ुस्सा हद से ज़्यादा बढ़ गया है?।

ذریعہ: किताबे-मुक़द्दस

WEBREATH · 11:11

«He himself gives everyone life and breath and everything else» — Acts 17:25

Breath is one for all: everyone lives by it, whoever they are and whatever they believe. Every day at 11:11 local time people stop for sixty seconds, breathe, and thank GOD for the breath — each in their own words, each within themselves. In that minute we are One Breath.

WEBREATH — the Minute at 11:11, your own local time — we are One Breath