عیسائیت
واپس

अय्यूब 27

1फिर अय्यूब ने अपनी बात जारी रखी,

2“अल्लाह की हयात की क़सम जिसने मेरा इनसाफ़ करने से इनकार किया, क़ादिरे-मुतलक़ की क़सम जिसने मेरी ज़िंदगी तलख़ कर दी है,

3मेरे जीते-जी, हाँ जब तक अल्लाह का दम मेरी नाक में है

4मेरे होंट झूट नहीं बोलेंगे, मेरी ज़बान धोका बयान नहीं करेगी।

5मैं कभी तसलीम नहीं करूँगा कि तुम्हारी बात दुरुस्त है। मैं बेइलज़ाम हूँ और मरते दम तक इसके उलट नहीं कहूँगा।

6मैं इसरार करता हूँ कि रास्तबाज़ हूँ और इससे कभी बाज़ नहीं आऊँगा। मेरा दिल मेरे किसी भी दिन के बारे में मुझे मलामत नहीं करता।

7अल्लाह करे कि मेरे दुश्मन के साथ वही सुलूक किया जाए जो बेदीनों के साथ किया जाएगा, कि मेरे मुख़ालिफ़ का वह अंजाम हो जो बदकारों को पेश आएगा।

8क्योंकि उस वक़्त शरीर की क्या उम्मीद रहेगी जब उसे इस ज़िंदगी से मुंक़ते किया जाएगा, जब अल्लाह उस की जान उससे तलब करेगा?

9क्या अल्लाह उस की चीख़ें सुनेगा जब वह मुसीबत में फँसकर मदद के लिए पुकारेगा?

10या क्या वह क़ादिरे-मुतलक़ से लुत्फ़अंदोज़ होगा और हर वक़्त अल्लाह को पुकारेगा?

11अब मैं तुम्हें अल्लाह की क़ुदरत के बारे में तालीम दूँगा, क़ादिरे-मुतलक़ का इरादा तुमसे नहीं छुपाऊँगा।

12देखो, तुम सबने इसका मुशाहदा किया है। तो फिर इस क़िस्म की बातिल बातें क्यों करते हो?

13बेदीन अल्लाह से क्या अज्र पाएगा, ज़ालिम को क़ादिरे-मुतलक़ से मीरास में क्या मिलेगा?

14गो उसके बच्चे मुतअद्दिद हों, लेकिन आख़िरकार वह तलवार की ज़द में आएँगे। उस की औलाद भूकी रहेगी।

15जो बच जाएँ उन्हें मोहलक बीमारी से क़ब्र में पहुँचाया जाएगा, और उनकी बेवाएँ मातम नहीं कर पाएँगी।

16बेशक वह ख़ाक की तरह चाँदी का ढेर लगाए और मिट्टी की तरह नफ़ीस कपड़ों का तोदा इकट्ठा करे,

17लेकिन जो कपड़े वह जमा करे उन्हें रास्तबाज़ पहन लेगा, और जो चाँदी वह इकट्ठी करे उसे बेक़ुसूर तक़सीम करेगा।

18जो घर बेदीन बना ले वह घोंसले की मानिंद है, उस आरिज़ी झोंपड़ी की मानिंद जो चौकीदार अपने लिए बना लेता है।

19वह अमीर हालत में सो जाता है, लेकिन आख़िरी दफ़ा। जब अपनी आँखें खोल लेता तो तमाम दौलत जाती रही है।

20उस पर हौलनाक वाक़ियात का सैलाब टूट पड़ता, उसे रात के वक़्त आँधी छीन लेती है।

21मशरिक़ी लू उसे उड़ा ले जाती, उसे उठाकर उसके मक़ाम से दूर फेंक देती है।

22बेरहमी से वह उस पर यों झपट्टा मारती रहती है कि उसे बार बार भागना पड़ता है।

23वह तालियाँ बजाकर अपनी हिक़ारत का इज़हार करती, अपनी जगह से आवाज़े कसती है।

ذریعہ: किताबे-मुक़द्दस

WEBREATH · 11:11

«He himself gives everyone life and breath and everything else» — Acts 17:25

Breath is one for all: everyone lives by it, whoever they are and whatever they believe. Every day at 11:11 local time people stop for sixty seconds, breathe, and thank GOD for the breath — each in their own words, each within themselves. In that minute we are One Breath.

WEBREATH — the Minute at 11:11, your own local time — we are One Breath