عیسائیت
واپس

अय्यूब 11

1फिर ज़ूफ़र नामाती ने जवाब देकर कहा,

2“क्या इन तमाम बातों का जवाब नहीं देना चाहिए? क्या यह आदमी अपनी ख़ाली बातों की बिना पर ही रास्तबाज़ ठहरेगा?

3क्या तेरी बेमानी बातें लोगों के मुँह यों बंद करेंगी कि तू आज़ादी से लान-तान करता जाए और कोई तुझे शरमिंदा न कर सके?

4अल्लाह से तू कहता है, ‘मेरी तालीम पाक है, और तेरी नज़र में मैं पाक-साफ़ हूँ।’

5काश अल्लाह ख़ुद तेरे साथ हमकलाम हो, वह अपने होंटों को खोलकर तुझसे बात करे!

6काश वह तेरे लिए हिकमत के भेद खोले, क्योंकि वह इनसान की समझ के नज़दीक मोजिज़े से हैं। तब तू जान लेता कि अल्लाह तेरे गुनाह का काफ़ी हिस्सा दरगुज़र कर रहा है।

7क्या तू अल्लाह का राज़ खोल सकता है? क्या तू क़ादिरे-मुतलक़ के कामिल इल्म तक पहुँच सकता है?

8वह तो आसमान से बुलंद है, चुनाँचे तू क्या कर सकता है? वह पाताल से गहरा है, चुनाँचे तू क्या जान सकता है?

9उस की लंबाई ज़मीन से बड़ी और चौड़ाई समुंदर से ज़्यादा है।

10अगर वह कहीं से गुज़रकर किसी को गिरिफ़्तार करे या अदालत में उसका हिसाब करे तो कौन उसे रोकेगा?

11क्योंकि वह फ़रेबदेह आदमियों को जान लेता है, जब भी उसे बुराई नज़र आए तो वह उस पर ख़ूब ध्यान देता है।

12अक़्ल से ख़ाली आदमी किस तरह समझ पा सकता है? यह उतना ही नामुमकिन है जितना यह कि जंगली गधे से इनसान पैदा हो।

13ऐ अय्यूब, अपना दिल पूरे ध्यान से अल्लाह की तरफ़ मायल कर और अपने हाथ उस की तरफ़ उठा!

14अगर तेरे हाथ गुनाह में मुलव्वस हों तो उसे दूर कर और अपने ख़ैमे में बुराई बसने न दे!

15तब तू बेइलज़ाम हालत में अपना चेहरा उठा सकेगा, तू मज़बूती से खड़ा रहेगा और डरेगा नहीं।

16तू अपना दुख-दर्द भूल जाएगा, और वह सिर्फ़ गुज़रे सैलाब की तरह याद रहेगा।

17तेरी ज़िंदगी दोपहर की तरह चमकदार, तेरी तारीकी सुबह की मानिंद रौशन हो जाएगी।

18चूँकि उम्मीद होगी इसलिए तू महफ़ूज़ होगा और सलामती से लेट जाएगा।

19तू आराम करेगा, और कोई तुझे दहशतज़दा नहीं करेगा बल्कि बहुत लोग तेरी नज़रे-इनायत हासिल करने की कोशिश करेंगे।

20लेकिन बेदीनों की आँखें नाकाम हो जाएँगी, और वह बच नहीं सकेंगे। उनकी उम्मीद मायूसकुन होगी।”

ذریعہ: किताबे-मुक़द्दस

WEBREATH · 11:11

«He himself gives everyone life and breath and everything else» — Acts 17:25

Breath is one for all: everyone lives by it, whoever they are and whatever they believe. Every day at 11:11 local time people stop for sixty seconds, breathe, and thank GOD for the breath — each in their own words, each within themselves. In that minute we are One Breath.

WEBREATH — the Minute at 11:11, your own local time — we are One Breath