عیسائیت
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यरमियाह 26

1जब यहूयक़ीम बिन यूसियाह यहूदाह के तख़्त पर बैठ गया तो थोड़ी देर के बाद रब का कलाम यरमियाह पर नाज़िल हुआ।

2रब ने फ़रमाया, “ऐ यरमियाह, रब के घर के सहन में खड़ा होकर उन तमाम लोगों से मुख़ातिब हो जो रब के घर में सिजदा करने के लिए यहूदाह के दीगर शहरों से आए हैं। उन्हें मेरा पूरा पैग़ाम सुना दे, एक बात भी न छोड़!

3शायद वह सुनें और हर एक अपनी बुरी राह से बाज़ आ जाए। इस सूरत में मैं पछताकर उन पर वह सज़ा नाज़िल नहीं करूँगा जिसका मनसूबा मैंने उनके बुरे आमाल देखकर बाँध लिया है।

4उन्हें बता, ‘रब फ़रमाता है कि मेरी सुनो और मेरी उस शरीअत पर अमल करो जो मैंने तुम्हें दी है।

5नीज़, नबियों के पैग़ामात पर ध्यान दो। अफ़सोस, गो मैं अपने ख़ादिमों को बार बार तुम्हारे पास भेजता रहा तो भी तुमने उनकी न सुनी।

6अगर तुम आइंदा भी न सुनो तो मैं इस घर को यों तबाह करूँगा जिस तरह मैंने सैला का मक़दिस तबाह किया था। मैं इस शहर को भी यों ख़ाक में मिला दूँगा कि इबरतअंगेज़ मिसाल बन जाएगा। दुनिया की तमाम क़ौमों में जब कोई अपने दुश्मन पर लानत भेजना चाहे तो वह कहेगा कि उसका यरूशलम का-सा अंजाम हो’।”

7जब यरमियाह ने रब के घर में रब के यह अलफ़ाज़ सुनाए तो इमामों, नबियों और तमाम बाक़ी लोगों ने ग़ौर से सुना।

8यरमियाह ने उन्हें सब कुछ पेश किया जो रब ने उसे सुनाने को कहा था। लेकिन ज्योंही वह इख़्तिताम पर पहुँच गया तो इमाम, नबी और बाक़ी तमाम लोग उसे पकड़कर चीख़ने लगे, “तुझे मरना ही है!

9तू रब का नाम लेकर क्यों कह रहा है कि रब का घर सैला की तरह तबाह हो जाएगा, और यरूशलम मलबे का ढेर बनकर ग़ैरआबाद हो जाएगा?” ऐसी बातें कहकर तमाम लोगों ने रब के घर में यरमियाह को घेरे रखा।

10जब यहूदाह के बुज़ुर्गों को इसकी ख़बर मिली तो वह शाही महल से निकलकर रब के घर के पास पहुँचे। वहाँ वह रब के घर के सहन के नए दरवाज़े में बैठ गए ताकि यरमियाह की अदालत करें।

11तब इमामों और नबियों ने बुज़ुर्गों और तमाम लोगों के सामने यरमियाह पर इलज़ाम लगाया, “लाज़िम है कि इस आदमी को सज़ाए-मौत दी जाए! क्योंकि इसने इस शहर यरूशलम के ख़िलाफ़ नबुव्वत की है। आपने अपने कानों से यह बात सुनी है।”

12तब यरमियाह ने बुज़ुर्गों और बाक़ी तमाम लोगों से कहा, “रब ने ख़ुद मुझे यहाँ भेजा ताकि मैं रब के घर और यरूशलम के ख़िलाफ़ उन तमाम बातों की पेशगोई करूँ जो आपने सुनी हैं।

13चुनाँचे अपनी राहों और आमाल को दुरुस्त करें! रब अपने ख़ुदा की सुनें ताकि वह पछताकर आप पर वह सज़ा नाज़िल न करे जिसका एलान उसने किया है।

14जहाँ तक मेरा ताल्लुक़ है, मैं तो आपके हाथ में हूँ। मेरे साथ वह सुलूक करें जो आपको अच्छा और मुनासिब लगे।

15लेकिन एक बात जान लें। अगर आप मुझे सज़ाए-मौत दें तो आप बेक़ुसूर के क़ातिल ठहरेंगे। आप और यह शहर उसके तमाम बाशिंदों समेत क़ुसूरवार ठहरेंगे। क्योंकि रब ही ने मुझे आपके पास भेजा ताकि आपके सामने ही यह बातें करूँ।”

16यह सुनकर बुज़ुर्गों और अवाम के तमाम लोगों ने इमामों और नबियों से कहा, “यह आदमी सज़ाए-मौत के लायक़ नहीं है! क्योंकि उसने रब हमारे ख़ुदा का नाम लेकर हमसे बात की है।”

17फिर मुल्क के कुछ बुज़ुर्ग खड़े होकर पूरी जमात से मुख़ातिब हुए,

18“जब हिज़क़ियाह यहूदाह का बादशाह था तो मोरशत के रहनेवाले नबी मीकाह ने नबुव्वत करके यहूदाह के तमाम बाशिंदों से कहा, ‘रब्बुल-अफ़वाज फ़रमाता है कि सिय्यून पर खेत की तरह हल चलाया जाएगा, और यरूशलम मलबे का ढेर बन जाएगा। रब के घर की पहाड़ी पर गुंजान जंगल उगेगा।’

19क्या यहूदाह के बादशाह हिज़क़ियाह या यहूदाह के किसी और शख़्स ने मीकाह को सज़ाए-मौत दी? हरगिज़ नहीं, बल्कि हिज़क़ियाह ने रब का ख़ौफ़ मानकर उसका ग़ुस्सा ठंडा करने की कोशिश की। नतीजे में रब ने पछताकर वह सज़ा उन पर नाज़िल न की जिसका एलान वह कर चुका था। सुनें, अगर हम यरमियाह को सज़ाए-मौत दें तो अपने आप पर सख़्त सज़ा लाएँगे।”

20उन दिनों में एक और नबी भी यरमियाह की तरह रब का नाम लेकर नबुव्वत करता था। उसका नाम ऊरियाह बिन समायाह था, और वह क़िरियत-यारीम का रहनेवाला था। उसने भी यरूशलम और यहूदाह के ख़िलाफ़ वही पेशगोइयाँ सुनाईं जो यरमियाह सुनाता था।

21जब यहूयक़ीम बादशाह और उसके तमाम फ़ौजी और सरकारी अफ़सरों ने उस की बातें सुनीं तो बादशाह ने उसे मार डालने की कोशिश की। लेकिन ऊरियाह को इसकी ख़बर मिली, और वह डरकर भाग गया। चलते चलते वह मिसर पहुँच गया।

22तब यहूयक़ीम ने इलनातन बिन अकबोर और चंद एक आदमियों को वहाँ भेज दिया।

23वहाँ पहुँचकर वह ऊरियाह को पकड़कर यहूयक़ीम के पास वापस लाए। बादशाह के हुक्म पर उसका सर क़लम कर दिया गया और उस की नाश को निचले तबक़े के लोगों के क़ब्रिस्तान में दफ़नाया गया।

24लेकिन यरमियाह की जान छूट गई। उसे अवाम के हवाले न किया गया, गो वह उसे मार डालना चाहते थे, क्योंकि अख़ीक़ाम बिन साफ़न उसके हक़ में था।

ذریعہ: किताबे-मुक़द्दस

WEBREATH · 11:11

«He himself gives everyone life and breath and everything else» — Acts 17:25

Breath is one for all: everyone lives by it, whoever they are and whatever they believe. Every day at 11:11 local time people stop for sixty seconds, breathe, and thank GOD for the breath — each in their own words, each within themselves. In that minute we are One Breath.

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