क़ुज़ात 12
1अम्मोनियों पर फ़तह के बाद इफ़राईम के क़बीले के आदमी जमा हुए और दरियाए-यरदन को पार करके इफ़ताह के पास आए जो सफ़ोन में था। उन्होंने शिकायत की, “आप क्यों हमें बुलाए बग़ैर अम्मोनियों से लड़ने गए? अब हम आपको आपके घर समेत जला देंगे!”
2इफ़ताह ने एतराज़ किया, “जब मेरी और मेरी क़ौम का अम्मोनियों के साथ सख़्त झगड़ा छिड़ गया तो मैंने आपको बुलाया, लेकिन आपने मुझे उनके हाथ से न बचाया।
3जब मैंने देखा कि आप मदद नहीं करेंगे तो अपनी जान ख़तरे में डालकर आपके बग़ैर ही अम्मोनियों से लड़ने गया। और रब ने मुझे उन पर फ़तह बख़्शी। अब मुझे बताएँ कि आप क्यों मेरे पास आकर मुझ पर हमला करना चाहते हैं?”
4इफ़राईमियों ने जवाब दिया, “तुम जो जिलियाद में रहते हो बस इफ़राईम और मनस्सी के क़बीलों से निकले हुए भगोड़े हो।” तब इफ़ताह ने जिलियाद के मर्दों को जमा किया और इफ़राईमियों से लड़कर उन्हें शिकस्त दी।
5फिर जिलियादियों ने दरियाए-यरदन के कम-गहरे मक़ामों पर क़ब्ज़ा कर लिया। जब कोई गुज़रना चाहता तो वह पूछते, “क्या आप इफ़राईमी हैं?” अगर वह इनकार करता
6तो जिलियाद के मर्द कहते, “तो फिर लफ़्ज़ ‘शिब्बोलेत’ बोलें।” अगर वह इफ़राईमी होता तो इसके बजाए “सिब्बोलेत” कहता। फिर जिलियादी उसे पकड़कर वहीं मार डालते। उस वक़्त कुल 42,000 इफ़राईमी हलाक हुए।
7इफ़ताह ने छः साल इसराईल की राहनुमाई की। जब फ़ौत हुआ तो उसे जिलियाद के किसी शहर में दफ़नाया गया।
8इफ़ताह के बाद इबज़ान इसराईल का क़ाज़ी बना। वह बैत-लहम में आबाद था,
9और उसके 30 बेटे और 30 बेटियाँ थीं। उस की तमाम बेटियाँ शादीशुदा थीं और इस वजह से बाप के घर में नहीं रहती थीं। लेकिन उसे 30 बेटों के लिए बीवियाँ मिल गई थीं, और सब उसके घर में रहते थे। इबज़ान ने सात साल के दौरान इसराईल की राहनुमाई की।
10फिर वह इंतक़ाल कर गया और बैत-लहम में दफ़नाया गया।
11उसके बाद ऐलोन क़ाज़ी बना। वह ज़बूलून के क़बीले से था और 10 साल के दौरान इसराईल की राहनुमाई करता रहा।
12जब वह कूच कर गया तो उसे ज़बूलून के ऐयालोन में दफ़न किया गया।
13फिर अबदोन बिन हिल्लेल क़ाज़ी बना। वह शहर फ़िरआतोन का था।
14उसके 40 बेटे और 30 पोते थे जो 70 गधों पर सफ़र किया करते थे। अबदोन ने आठ साल के दौरान इसराईल की राहनुमाई की।
15फिर वह भी जान-बहक़ हो गया, और उसे अमालीक़ियों के पहाड़ी इलाक़े के शहर फ़िरआतोन में दफ़नाया गया, जो उस वक़्त इफ़राईम का हिस्सा था।
ذریعہ: किताबे-मुक़द्दस
WEBREATH · 11:11
«He himself gives everyone life and breath and everything else» — Acts 17:25
Breath is one for all: everyone lives by it, whoever they are and whatever they believe. Every day at 11:11 local time people stop for sixty seconds, breathe, and thank GOD for the breath — each in their own words, each within themselves. In that minute we are One Breath.
WEBREATH — the Minute at 11:11, your own local time — we are One Breath