عیسائیت
واپس

यसायाह 51

1“तुम जो रास्ती के पीछे लगे रहते, जो रब के तालिब हो, मेरी बात सुनो! उस चट्टान पर ध्यान दो जिसमें से तुम्हें तराशकर निकाला गया है, उस कान पर ग़ौर करो जिसमें से तुम्हें खोदा गया है।

2यानी अपने बाप इब्राहीम और अपनी माँ सारा पर तवज्जुह दो, जिसने दर्दे-ज़ह की तकलीफ़ उठाकर तुम्हें जन्म दिया। इब्राहीम बेऔलाद था जब मैंने उसे बुलाया, लेकिन फिर मैंने उसे बरकत देकर बहुत औलाद बख़्शी।”

3यक़ीनन रब सिय्यून को तसल्ली देगा। वह उसके तमाम खंडरात को तशफ़्फ़ी देकर उसके रेगिस्तान को बाग़े-अदन में और उस की बंजर ज़मीन को रब के बाग़ में बदल देगा। तब उसमें ख़ुशीओ-शादमानी पाई जाएगी, हर तरफ़ शुक्रगुज़ारी और गीतों की आवाज़ें सुनाई देंगी।

4“ऐ मेरी क़ौम, मुझ पर ध्यान दे! ऐ मेरी उम्मत, मुझ पर ग़ौर कर! क्योंकि हिदायत मुझसे सादिर होगी, और मेरा इनसाफ़ क़ौमों की रौशनी बनेगा।

5मेरी रास्ती क़रीब ही है, मेरी नजात रास्ते में है, और मेरा ज़ोरावर बाज़ू क़ौमों में इनसाफ़ क़ायम करेगा। जज़ीरे मुझसे उम्मीद रखेंगे, वह मेरी क़ुदरत देखने के इंतज़ार में रहेंगे।

6अपनी आँखें आसमान की तरफ़ उठाओ! नीचे ज़मीन पर नज़र डालो! आसमान धुएँ की तरह बिखर जाएगा, ज़मीन पुराने कपड़े की तरह घिसे-फटेगी और उसके बाशिंदे मच्छरों की तरह मर जाएंगे। लेकिन मेरी नजात अबद तक क़ायम रहेगी, और मेरी रास्ती कभी ख़त्म नहीं होगी।

7ऐ सहीह राह को जाननेवालो, ऐ क़ौम जिसके दिल में मेरी शरीअत है, मेरी बात सुनो! जब लोग तुम्हारी बेइज़्ज़ती करते हैं तो उनसे मत डरना, जब वह तुम्हें गालियाँ देते हैं तो मत घबराना।

8क्योंकि किरम उन्हें कपड़े की तरह खा जाएगा, कीड़ा उन्हें ऊन की तरह हज़म करेगा। लेकिन मेरी रास्ती अबद तक क़ायम रहेगी, मेरी नजात पुश्त-दर-पुश्त बरक़रार रहेगी।”

9ऐ रब के बाज़ू, उठ! जाग उठ और क़ुव्वत का जामा पहन ले! यों अमल में आ जिस तरह क़दीम ज़माने में आया था, जब तूने मुतअद्दिद नसलों पहले रहब को टुकड़े टुकड़े कर दिया, समुंदरी अज़दहे को छेद डाला।

10क्योंकि तू ही ने समुंदर को ख़ुश्क किया, तू ही ने गहराइयों की तह पर रास्ता बनाया ताकि वह जिन्हें तूने एवज़ाना देकर छुड़ाया था उसमें से गुज़र सकें।

11जिन्हें रब ने फ़िद्या देकर छुड़ाया है वह वापस आएँगे। वह शादियाना बजाकर सिय्यून में दाख़िल होंगे, और हर एक का सर अबदी ख़ुशी के ताज से आरास्ता होगा। क्योंकि ख़ुशी और शादमानी उन पर ग़ालिब आकर तमाम ग़म और आहो-ज़ारी भगा देगी।

12“मैं, सिर्फ़ मैं ही तुझे तसल्ली देता हूँ। तो फिर तू फ़ानी इनसान से क्यों डरती है, जो घास की तरह मुरझाकर ख़त्म हो जाता है?

13तू रब अपने ख़ालिक़ को क्यों भूल गई है, जिसने आसमान को ख़ैमे की तरह तान लिया और ज़मीन की बुनियाद रखी? जब ज़ालिम तुझे तबाह करने पर तुला रहता है तो तू उसके तैश से पूरे दिन क्यों ख़ौफ़ खाती रहती है? अब उसका तैश कहाँ रहा?

14जो ज़ंजीरों में जकड़ा हुआ है वह जल्द ही आज़ाद हो जाएगा। न वह मरकर क़ब्र में उतरेगा, न रोटी से महरूम रहेगा।

15क्योंकि मैं रब तेरा ख़ुदा हूँ जो समुंदर को यों हरकत में लाता है कि वह मुतलातिम होकर गरजने लगता है। रब्बुल-अफ़वाज मेरा नाम है।

16मैंने अपने अलफ़ाज़ तेरे मुँह में डालकर तुझे अपने हाथ के साये में छुपाए रखा है ताकि नए सिरे से आसमान को तानूँ, ज़मीन की बुनियादें रखूँ और सिय्यून को बताऊँ, ‘तू मेरी क़ौम है’।”

17ऐ यरूशलम, उठ! जाग उठ! ऐ शहर जिसने रब के हाथ से उसका ग़ज़ब भरा प्याला पी लिया है, खड़ी हो जा! अब तूने लड़खड़ा देनेवाले प्याले को आख़िरी क़तरे तक चाट लिया है।

18जितने भी बेटे तूने जन्म दिए उनमें से एक भी नहीं रहा जो तेरी राहनुमाई करे। जितने भी बेटे तूने पाले उनमें से एक भी नहीं जो तेरा हाथ पकड़कर तेरे साथ चले।

19तुझ पर दो आफ़तें आईं यानी बरबादीओ-तबाही, काल और तलवार। लेकिन किसने हमदर्दी का इज़हार किया? किसने तुझे तसल्ली दी?

20तेरे बेटे ग़श खाकर गिर गए हैं। हर गली में वह जाल में फँसे हुए ग़ज़ाल की तरह ज़मीन पर तड़प रहे हैं। क्योंकि रब का ग़ज़ब उन पर नाज़िल हुआ है, वह इलाही डाँट-डपट का निशाना बन गए हैं।

21चुनाँचे मेरी बात सुन, ऐ मुसीबतज़दा क़ौम, ऐ नशे में मत्वाली उम्मत, गो तू मै के असर से नहीं डगमगा रही।

22रब तेरा आक़ा जो तेरा ख़ुदा है और अपनी क़ौम के लिए लड़ता है वह फ़रमाता है, “देख, मैंने तेरे हाथ से वह प्याला दूर कर दिया जो तेरे लड़खड़ाने का सबब बना। आइंदा तू मेरा ग़ज़ब भरा प्याला नहीं पिएगी।

23अब मैं इसे उनको पकड़ा दूँगा जिन्होंने तुझे अज़ियत पहुँचाई है, जिन्होंने तुझसे कहा, ‘औंधे मुँह झुक जा ताकि हम तुझ पर से गुज़रें।’ उस वक़्त तेरी पीठ ख़ाक में धँसकर दूसरों के लिए रास्ता बन गई थी।”

ذریعہ: किताबे-मुक़द्दस

WEBREATH · 11:11

«He himself gives everyone life and breath and everything else» — Acts 17:25

Breath is one for all: everyone lives by it, whoever they are and whatever they believe. Every day at 11:11 local time people stop for sixty seconds, breathe, and thank GOD for the breath — each in their own words, each within themselves. In that minute we are One Breath.

WEBREATH — the Minute at 11:11, your own local time — we are One Breath