عیسائیت
واپس

यसायाह 27

1उस दिन रब उस भागने और पेचो-ताब खानेवाले साँप को सज़ा देगा जो लिवियातान कहलाता है। अपनी सख़्त, अज़ीम और ताक़तवर तलवार से वह समुंदर के अज़दहे को मार डालेगा।

2उस दिन कहा जाएगा, “अंगूर का कितना ख़ूबसूरत बाग़ है! उस की तारीफ़ में गीत गाओ!

3मैं, रब ख़ुद ही उसे सँभालता, उसे मुसलसल पानी देता रहता हूँ। दिन-रात मैं उस की पहरादारी करता हूँ ताकि कोई उसे नुक़सान न पहुँचाए।

4अब मेरा ग़ुस्सा ठंडा हो गया है। लेकिन अगर बाग़ में ऊँटकटारे और ख़ारदार झाड़ियाँ मिल जाएँ तो मैं उनसे निपट लूँगा, मैं उनसे जंग करके सबको जला दूँगा।

5लेकिन अगर वह मान जाएँ तो मेरे पास आकर पनाह लें। वह मेरे साथ सुलह करें, हाँ मेरे साथ सुलह करें।”

6एक वक़्त आएगा कि याक़ूब जड़ पकड़ेगा। इसराईल को फूल लग जाएंगे, उस की कोंपलें निकलेंगी और दुनिया उसके फल से भर जाएगी।

7क्या रब ने अपनी क़ौम को यों मारा जिस तरह उसने इसराईल को मारनेवालों को मारा है? हरगिज़ नहीं! या क्या इसराईल को यों क़त्ल किया गया जिस तरह उसके क़ातिलों को क़त्ल किया गया है?

8नहीं, बल्कि तूने उसे डराकर और भगाकर उससे जवाब तलब किया, तूने उसके ख़िलाफ़ मशरिक़ से तेज़ आँधी भेजकर उसे अपने हुज़ूर से निकाल दिया।

9इस तरह याक़ूब के क़ुसूर का कफ़्फ़ारा दिया जाएगा। और जब इसराईल का गुनाह दूर हो जाएगा तो नतीजे में वह तमाम ग़लत क़ुरबानगाहों को चूने के पत्थरों की तरह चकनाचूर करेगा। न यसीरत देवी के खंबे, न बख़ूर जलाने की ग़लत क़ुरबानगाहें खड़ी रहेंगी।

10क्योंकि क़िलाबंद शहर तनहा रह गया है। लोगों ने उसे वीरान छोड़कर रेगिस्तान की तरह तर्क कर दिया है। अब से उसमें बछड़े ही चरेंगे। वही उस की गलियों में आराम करके उस की टहनियों को चबा लेंगे।

11तब उस की शाख़ें सूख जाएँगी और औरतें उन्हें तोड़ तोड़कर जलाएँगी। क्योंकि यह क़ौम समझ से ख़ाली है, लिहाज़ा उसका ख़ालिक़ उस पर तरस नहीं खाएगा, जिसने उसे तश्कील दिया वह उस पर मेहरबानी नहीं करेगा।

12उस दिन तुम इसराईली ग़ल्ला जैसे होगे, और रब तुम्हारी बालियों को दरियाए-फ़ुरात से लेकर मिसर की शिमाली सरहद पर वाक़े वादीए-मिसर तक काटेगा। फिर वह तुम्हें गाहकर दाना बदाना तमाम ग़ल्ला इकट्ठा करेगा।

13उस दिन नरसिंगा बुलंद आवाज़ से बजेगा। तब असूर में तबाह होनेवाले और मिसर में भगाए हुए लोग वापस आकर यरूशलम के मुक़द्दस पहाड़ पर रब को सिजदा करेंगे।

ذریعہ: किताबे-मुक़द्दस

WEBREATH · 11:11

«He himself gives everyone life and breath and everything else» — Acts 17:25

Breath is one for all: everyone lives by it, whoever they are and whatever they believe. Every day at 11:11 local time people stop for sixty seconds, breathe, and thank GOD for the breath — each in their own words, each within themselves. In that minute we are One Breath.

WEBREATH — the Minute at 11:11, your own local time — we are One Breath