عیسائیت
واپس

पैदाइश 30

1लेकिन राख़िल बेऔलाद ही रही, इसलिए वह अपनी बहन से हसद करने लगी। उसने याक़ूब से कहा, “मुझे भी औलाद दें वरना मैं मर जाऊँगी।”

2याक़ूब को ग़ुस्सा आया। उसने कहा, “क्या मैं अल्लाह हूँ जिसने तुझे औलाद से महरूम रखा है?”

3राख़िल ने कहा, “यहाँ मेरी लौंडी बिलहाह है। उसके साथ हमबिसतर हों ताकि वह मेरे लिए बच्चे को जन्म दे और मैं उस की मारिफ़त माँ बन जाऊँ।”

4यों उसने अपने शौहर को बिलहाह दी, और वह उससे हमबिसतर हुआ।

5बिलहाह हामिला हुई और बेटा पैदा हुआ।

6राख़िल ने कहा, “अल्लाह ने मेरे हक़ में फ़ैसला दिया है। उसने मेरी दुआ सुनकर मुझे बेटा दे दिया है।” उसने उसका नाम दान यानी ‘किसी के हक़ में फ़ैसला करनेवाला’ रखा।

7बिलहाह दुबारा हामिला हुई और एक और बेटा पैदा हुआ।

8राख़िल ने कहा, “मैंने अपनी बहन से सख़्त कुश्ती लड़ी है, लेकिन जीत गई हूँ।” उसने उसका नाम नफ़ताली यानी ‘कुश्ती में मुझसे जीता गया’ रखा।

9जब लियाह ने देखा कि मेरे और बच्चे पैदा नहीं हो रहे तो उसने याक़ूब को अपनी लौंडी ज़िलफ़ा दे दी ताकि वह भी उस की बीवी हो।

10ज़िलफ़ा के भी एक बेटा पैदा हुआ।

11लियाह ने कहा, “मैं कितनी ख़ुशक़िसमत हूँ!” चुनाँचे उसने उसका नाम जद यानी ख़ुशक़िसमती रखा।

12फिर ज़िलफ़ा के दूसरा बेटा पैदा हुआ।

13लियाह ने कहा, “मैं कितनी मुबारक हूँ। अब ख़वातीन मुझे मुबारक कहेंगी।” उसने उसका नाम आशर यानी मुबारक रखा।

14एक दिन अनाज की फ़सल की कटाई हो रही थी कि रूबिन बाहर निकलकर खेतों में चला गया। वहाँ उसे मर्दुमगयाह मिल गए। वह उन्हें अपनी माँ लियाह के पास ले आया। यह देखकर राख़िल ने लियाह से कहा, “मुझे ज़रा अपने बेटे के मर्दुमगयाह में से कुछ दे दो।”

15लियाह ने जवाब दिया, “क्या यही काफ़ी नहीं कि तुमने मेरे शौहर को मुझसे छीन लिया है? अब मेरे बेटे के मर्दुमगयाह को भी छीनना चाहती हो।” राख़िल ने कहा, “अगर तुम मुझे अपने बेटे के मर्दुमगयाह में से दो तो आज रात याक़ूब के साथ सो सकती हो।”

16शाम को याक़ूब खेतों से वापस आ रहा था कि लियाह आगे से उससे मिलने को गई और कहा, “आज रात आपको मेरे साथ सोना है, क्योंकि मैंने अपने बेटे के मर्दुमगयाह के एवज़ आपको उजरत पर लिया है।” चुनाँचे याक़ूब ने लियाह के पास रात गुज़ारी।

17उस वक़्त अल्लाह ने लियाह की दुआ सुनी और वह हामिला हुई। उसके पाँचवाँ बेटा पैदा हुआ।

18लियाह ने कहा, “अल्लाह ने मुझे इसका अज्र दिया है कि मैंने अपने शौहर को अपनी लौंडी दी।” उसने उसका नाम इशकार यानी अज्र रखा।

19इसके बाद वह एक और दफ़ा हामिला हुई। उसके छटा बेटा पैदा हुआ।

20उसने कहा, “अल्लाह ने मुझे एक अच्छा-ख़ासा तोह्फ़ा दिया है। अब मेरा ख़ाविंद मेरे साथ रहेगा, क्योंकि मुझसे उसके छः बेटे पैदा हुए हैं।” उसने उसका नाम ज़बूलून यानी रिहाइश रखा।

21इसके बाद बेटी पैदा हुई। उसने उसका नाम दीना रखा।

22फिर अल्लाह ने राख़िल को भी याद किया। उसने उस की दुआ सुनकर उसे औलाद बख़्शी।

23वह हामिला हुई और एक बेटा पैदा हुआ। उसने कहा, “मुझे बेटा अता करने से अल्लाह ने मेरी इज़्ज़त बहाल कर दी है।

24रब मुझे एक और बेटा दे।” उसने उसका नाम यूसुफ़ यानी ‘वह और दे’ रखा।

25यूसुफ़ की पैदाइश के बाद याक़ूब ने लाबन से कहा, “अब मुझे इजाज़त दें कि मैं अपने वतन और घर को वापस जाऊँ।

26मुझे मेरे बाल-बच्चे दें जिनके एवज़ मैंने आपकी ख़िदमत की है। फिर मैं चला जाऊँगा। आप तो ख़ुद जानते हैं कि मैंने कितनी मेहनत के साथ आपके लिए काम किया है।”

27लेकिन लाबन ने कहा, “मुझ पर मेहरबानी करें और यहीं रहें। मुझे ग़ैबदानी से पता चला है कि रब ने मुझे आपके सबब से बरकत दी है।

28अपनी उजरत ख़ुद मुक़र्रर करें तो मैं वही दिया करूँगा।”

29याक़ूब ने कहा, “आप जानते हैं कि मैंने किस तरह आपके लिए काम किया, कि मेरे वसीले से आपके मवेशी कितने बढ़ गए हैं।

30जो थोड़ा-बहुत मेरे आने से पहले आपके पास था वह अब बहुत ज़्यादा बढ़ गया है। रब ने मेरे काम से आपको बहुत बरकत दी है। अब वह वक़्त आ गया है कि मैं अपने घर के लिए कुछ करूँ।”

31लाबन ने कहा, “मैं आपको क्या दूँ?” याक़ूब ने कहा, “मुझे कुछ न दें। मैं इस शर्त पर आपकी भेड़-बकरियों की देख-भाल जारी रखूँगा कि

32आज मैं आपके रेवड़ में से गुज़रकर उन तमाम भेड़ों को अलग कर लूँगा जिनके जिस्म पर छोटे या बड़े धब्बे हों या जो सफ़ेद न हों। इसी तरह मैं उन तमाम बकरियों को भी अलग कर लूँगा जिनके जिस्म पर छोटे या बड़े धब्बे हों। यही मेरी उजरत होगी।

33आइंदा जिन बकरियों के जिस्म पर छोटे या बड़े धब्बे होंगे या जिन भेड़ों का रंग सफ़ेद नहीं होगा वह मेरा अज्र होंगी। जब कभी आप उनका मुआयना करेंगे तो आप मालूम कर सकेंगे कि मैं दियानतदार रहा हूँ। क्योंकि मेरे जानवरों के रंग से ही ज़ाहिर होगा कि मैंने आपका कुछ चुराया नहीं है।”

34लाबन ने कहा, “ठीक है। ऐसा ही हो जैसा आपने कहा है।”

35उसी दिन लाबन ने उन बकरों को अलग कर लिया जिनके जिस्म पर धारियाँ या धब्बे थे और उन तमाम बकरियों को जिनके जिस्म पर छोटे या बड़े धब्बे थे। जिसके भी जिस्म पर सफ़ेद निशान था उसे उसने अलग कर लिया। इसी तरह उसने उन तमाम भेड़ों को भी अलग कर लिया जो पूरे तौर पर सफ़ेद न थे। फिर लाबन ने उन्हें अपने बेटों के सुपुर्द कर दिया

36जो उनके साथ याक़ूब से इतना दूर चले गए कि उनके दरमियान तीन दिन का फ़ासला था। तब याक़ूब लाबन की बाक़ी भेड़-बकरियों की देख-भाल करता गया।

37याक़ूब ने सफ़ेदा, बादाम और चनार की हरी हरी शाख़ें लेकर उनसे कुछ छिलका यों उतार दिया कि उस पर सफ़ेद धारियाँ नज़र आईं।

38उसने उन्हें भेड़-बकरियों के सामने उन हौज़ों में गाड़ दिया जहाँ वह पानी पीते थे, क्योंकि वहाँ यह जानवर मस्त होकर मिलाप करते थे।

39जब वह इन शाख़ों के सामने मिलाप करते तो जो बच्चे पैदा होते उनके जिस्म पर छोटे और बड़े धब्बे और धारियाँ होती थीं।

40फिर याक़ूब ने भेड़ के बच्चों को अलग करके अपने रेवड़ों को लाबन के उन जानवरों के सामने चरने दिया जिनके जिस्म पर धारियाँ थीं और जो सफ़ेद न थे। यों उसने अपने ज़ाती रेवड़ों को अलग कर लिया और उन्हें लाबन के रेवड़ के साथ चरने न दिया।

41लेकिन उसने यह शाख़ें सिर्फ़ उस वक़्त हौज़ों में खड़ी कीं जब ताक़तवर जानवर मस्त होकर मिलाप करते थे।

42कमज़ोर जानवरों के साथ उसने ऐसा न किया। इसी तरह लाबन को कमज़ोर जानवर और याक़ूब को ताक़तवर जानवर मिल गए।

43यों याक़ूब बहुत अमीर बन गया। उसके पास बहुत-से रेवड़, ग़ुलाम और लौंडियाँ, ऊँट और गधे थे।

ذریعہ: किताबे-मुक़द्दस

WEBREATH · 11:11

«He himself gives everyone life and breath and everything else» — Acts 17:25

Breath is one for all: everyone lives by it, whoever they are and whatever they believe. Every day at 11:11 local time people stop for sixty seconds, breathe, and thank GOD for the breath — each in their own words, each within themselves. In that minute we are One Breath.

WEBREATH — the Minute at 11:11, your own local time — we are One Breath