عیسائیت
واپس

गलतियों 3

1नासमझ गलतियो! किसने आप पर जादू कर दिया? आपकी आँखों के सामने ही ईसा मसीह और उस की सलीबी मौत को साफ़ साफ़ पेश किया गया।

2मुझे एक बात बताएँ, क्या आपको शरीअत की पैरवी करने से रूहुल-क़ुद्स मिला? हरगिज़ नहीं! वह आपको उस वक़्त मिला जब आप मसीह के बारे में पैग़ाम सुनकर उस पर ईमान लाए।

3क्या आप इतने बेसमझ हैं? आपकी रूहानी ज़िंदगी रूहुल-क़ुद्स के वसीले से शुरू हुई। तो अब आप यह काम अपनी इनसानी कोशिशों से किस तरह तकमील तक पहुँचाना चाहते हैं?

4आपको कई तरह के तजरबे हासिल हुए हैं। क्या यह सब बेफ़ायदा थे? यक़ीनन यह बेफ़ायदा नहीं थे।

5क्या अल्लाह इसलिए आपको अपना रूह देता और आपके दरमियान मोजिज़े करता है कि आप शरीअत की पैरवी करते हैं? हरगिज़ नहीं, बल्कि इसलिए कि आप मसीह के बारे में पैग़ाम सुनकर ईमान लाए हैं।

6इब्राहीम की मिसाल लें। उसने अल्लाह पर भरोसा किया और इस बिना पर अल्लाह ने उसे रास्तबाज़ क़रार दिया।

7तो फिर आपको जान लेना चाहिए कि इब्राहीम की हक़ीक़ी औलाद वह लोग हैं जो ईमान रखते हैं।

8कलामे-मुक़द्दस ने इस बात की पेशगोई की कि अल्लाह ग़ैरयहूदियों को ईमान के ज़रीए रास्तबाज़ क़रार देगा। यों उसने इब्राहीम को यह ख़ुशख़बरी सुनाई, “तमाम क़ौमें तुझसे बरकत पाएँगी।”

9इब्राहीम ईमान लाया, इसलिए उसे बरकत मिली। इसी तरह सबको ईमान लाने पर इब्राहीम की-सी बरकत मिलती है।

10लेकिन जो भी इस पर तकिया करते हैं कि हमें शरीअत की पैरवी करने से रास्तबाज़ क़रार दिया जाएगा उन पर अल्लाह की लानत है। क्योंकि कलामे-मुक़द्दस फ़रमाता है, “हर एक पर लानत जो शरीअत की किताब की तमाम बातें क़ायम न रखे, न इन पर अमल करे।”

11यह बात तो साफ़ है कि अल्लाह किसी को भी शरीअत की पैरवी करने की बिना पर रास्तबाज़ नहीं ठहराता, क्योंकि कलामे-मुक़द्दस के मुताबिक़ रास्तबाज़ ईमान ही से जीता रहेगा।

12ईमान की यह राह शरीअत की राह से बिलकुल फ़रक़ है जो कहती है, “जो यों करेगा वह जीता रहेगा।”

13लेकिन मसीह ने हमारा फ़िद्या देकर हमें शरीअत की लानत से आज़ाद कर दिया है। यह उसने इस तरह किया कि वह हमारी ख़ातिर ख़ुद लानत बना। क्योंकि कलामे-मुक़द्दस में लिखा है, “जिसे भी दरख़्त से लटकाया गया है उस पर अल्लाह की लानत है।”

14इसका मक़सद यह था कि जो बरकत इब्राहीम को हासिल हुई वह मसीह के वसीले से ग़ैरयहूदियों को भी मिले और यों हम ईमान लाकर वादा किया हुआ रूह पाएँ।

15भाइयो, इनसानी ज़िंदगी की एक मिसाल लें। जब दो पार्टियाँ किसी मामले में मुत्तफ़िक़ होकर मुआहदा करती हैं तो कोई इस मुआहदे को मनसूख़ या इसमें इज़ाफ़ा नहीं कर सकता।

16अब ग़ौर करें कि अल्लाह ने अपने वादे इब्राहीम और उस की औलाद से ही किए। लेकिन जो लफ़्ज़ इबरानी में औलाद के लिए इस्तेमाल हुआ है इससे मुराद बहुत-से अफ़राद नहीं बल्कि एक फ़रद है और वह है मसीह।

17कहने से मुराद यह है कि अल्लाह ने इब्राहीम से अहद बाँधकर उसे क़ायम रखने का वादा किया। शरीअत जो 430 साल के बाद दी गई इस अहद को रद्द करके अल्लाह का वादा मनसूख़ नहीं कर सकती।

18क्योंकि अगर इब्राहीम की मीरास शरीअत की पैरवी करने से मिलती तो फिर वह अल्लाह के वादे पर मुनहसिर न होती। लेकिन ऐसा नहीं था। अल्लाह ने इसे अपने वादे की बिना पर इब्राहीम को दे दिया।

19तो फिर शरीअत का क्या मक़सद था? उसे इसलिए वादे के अलावा दिया गया ताकि लोगों के गुनाहों को ज़ाहिर करे। और उसे उस वक़्त तक क़ायम रहना था जब तक इब्राहीम की वह औलाद न आ जाती जिससे वादा किया गया था। अल्लाह ने अपनी शरीअत फ़रिश्तों के वसीले से मूसा को दे दी जो अल्लाह और लोगों के बीच में दरमियानी रहा।

20अब दरमियानी उस वक़्त ज़रूरी होता है जब एक से ज़्यादा पार्टियों में इत्तफ़ाक़ कराने की ज़रूरत है। लेकिन अल्लाह जो एक ही है उसने दरमियानी इस्तेमाल न किया जब उसने इब्राहीम से वादा किया।

21तो क्या इसका मतलब यह है कि शरीअत अल्लाह के वादों के ख़िलाफ़ है? हरगिज़ नहीं! अगर इनसान को ऐसी शरीअत मिली होती जो ज़िंदगी दिला सकती तो फिर सब उस की पैरवी करने से रास्तबाज़ ठहरते।

22लेकिन कलामे-मुक़द्दस फ़रमाता है कि पूरी दुनिया गुनाह के क़ब्ज़े में है। चुनाँचे हमें अल्लाह का वादा सिर्फ़ ईसा मसीह पर ईमान लाने से हासिल होता है।

23इससे पहले कि ईमान की यह राह दस्तयाब हुई शरीअत ने हमें क़ैद करके महफ़ूज़ रखा था। इस क़ैद में हम उस वक़्त तक रहे जब तक ईमान की राह ज़ाहिर नहीं हुई थी।

24यों शरीअत को हमारी तरबियत करने की ज़िम्मादारी दी गई। उसे हमें मसीह तक पहुँचाना था ताकि हमें ईमान से रास्तबाज़ क़रार दिया जाए।

25अब चूँकि ईमान की राह आ गई है इसलिए हम शरीअत की तरबियत के तहत नहीं रहे।

26क्योंकि मसीह ईसा पर ईमान लाने से आप सब अल्लाह के फ़रज़ंद बन गए हैं।

27आपमें से जितनों को मसीह में बपतिस्मा दिया गया उन्होंने मसीह को पहन लिया।

28अब न यहूदी रहा न ग़ैरयहूदी, न ग़ुलाम रहा न आज़ाद, न मर्द रहा न औरत। मसीह ईसा में आप सबके सब एक हैं।

29शर्त यह है कि आप मसीह के हों। तब आप इब्राहीम की औलाद और उन चीज़ों के वारिस हैं जिनका वादा अल्लाह ने किया है।

ذریعہ: किताबे-मुक़द्दस

WEBREATH · 11:11

«He himself gives everyone life and breath and everything else» — Acts 17:25

Breath is one for all: everyone lives by it, whoever they are and whatever they believe. Every day at 11:11 local time people stop for sixty seconds, breathe, and thank GOD for the breath — each in their own words, each within themselves. In that minute we are One Breath.

WEBREATH — the Minute at 11:11, your own local time — we are One Breath