عیسائیت
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हिज़क़ियेल 28

1रब मुझसे हमकलाम हुआ,

2“ऐ आदमज़ाद, सूर के हुक्मरान को बता, ‘रब क़ादिरे-मुतलक़ फ़रमाता है कि तू मग़रूर हो गया है। तू कहता है कि मैं ख़ुदा हूँ, मैं समुंदर के दरमियान ही अपने तख़्ते-इलाही पर बैठा हूँ। लेकिन तू ख़ुदा नहीं बल्कि इनसान है, गो तू अपने आपको ख़ुदा-सा समझता है।

3बेशक तू अपने आपको दानियाल से कहीं ज़्यादा दानिशमंद समझकर कहता है कि कोई भी भेद मुझसे पोशीदा नहीं रहता।

4और यह हक़ीक़त भी है कि तूने अपनी हिकमत और समझ से बहुत दौलत हासिल की है, सोने और चाँदी से अपने ख़ज़ानों को भर दिया है।

5बड़ी दानिशमंदी से तूने तिजारत के ज़रीए अपनी दौलत बढ़ाई। लेकिन जितनी तेरी दौलत बढ़ती गई उतना ही तेरा ग़ुरूर भी बढ़ता गया।

6चुनाँचे रब क़ादिरे-मुतलक़ फ़रमाता है कि चूँकि तू अपने आपको ख़ुदा-सा समझता है

7इसलिए मैं सबसे ज़ालिम क़ौमों को तेरे ख़िलाफ़ भेजूँगा जो अपनी तलवारों को तेरी ख़ूबसूरती और हिकमत के ख़िलाफ़ खींचकर तेरी शानो-शौकत की बेहुरमती करेंगी।

8वह तुझे पाताल में उतारेंगी। समुंदर के बीच में ही तुझे मार डाला जाएगा।

9क्या तू उस वक़्त अपने क़ातिलों से कहेगा कि मैं ख़ुदा हूँ? हरगिज़ नहीं! अपने क़ातिलों के हाथ में होते वक़्त तू ख़ुदा नहीं बल्कि इनसान साबित होगा।

10तू अजनबियों के हाथों नामख़तून की-सी वफ़ात पाएगा। यह मेरा, रब क़ादिरे-मुतलक़ का फ़रमान है’।”

11रब मज़ीद मुझसे हमकलाम हुआ,

12“ऐ आदमज़ाद, सूर के बादशाह पर मातमी गीत गाकर उससे कह, ‘रब क़ादिरे-मुतलक़ फ़रमाता है कि तुझ पर कामिलियत का ठप्पा था। तू हिकमत से भरपूर था, तेरा हुस्न कमाल का था।

13अल्लाह के बाग़े-अदन में रहकर तू हर क़िस्म के जवाहर से सजा हुआ था। लाल, ज़बरजद, हजरुल-क़मर, पुखराज, अक़ीक़े-अहमर और यशब, संगे-लाजवर्द, फ़ीरोज़ा और ज़ुमुर्रद सब तुझे आरास्ता करते थे। सब कुछ सोने के काम से मज़ीद ख़ूबसूरत बनाया गया था। जिस दिन तुझे ख़लक़ किया गया उसी दिन यह चीज़ें तेरे लिए तैयार हुईं।

14मैंने तुझे अल्लाह के मुक़द्दस पहाड़ पर खड़ा किया था। वहाँ तू करूबी फ़रिश्ते की हैसियत से अपने पर फैलाए पहरादारी करता था, वहाँ तू जलते हुए पत्थरों के दरमियान ही घुमता-फिरता रहा।

15जिस दिन तुझे ख़लक़ किया गया तेरा चाल-चलन बेइलज़ाम था, लेकिन अब तुझमें नाइनसाफ़ी पाई गई है।

16तिजारत में कामयाबी की वजह से तू ज़ुल्मो-तशद्दुद से भर गया और गुनाह करने लगा। यह देखकर मैंने तुझे अल्लाह के पहाड़ पर से उतार दिया। मैंने तुझे जो पहरादारी करनेवाला फ़रिश्ता था तबाह करके जलते हुए पत्थरों के दरमियान से निकाल दिया।

17तेरी ख़ूबसूरती तेरे लिए ग़ुरूर का बाइस बन गई, हाँ तेरी शानो-शौकत ने तुझे इतना फुला दिया कि तेरी हिकमत जाती रही। इसी लिए मैंने तुझे ज़मीन पर पटख़कर दीगर बादशाहों के सामने तमाशा बना दिया।

18अपने बेशुमार गुनाहों और बेइनसाफ़ तिजारत से तूने अपने मुक़द्दस मक़ामों की बेहुरमती की है। जवाब में मैंने होने दिया कि आग तेरे दरमियान से निकलकर तुझे भस्म करे। मैंने तुझे तमाशा देखनेवाले तमाम लोगों के सामने ही राख कर दिया।

19जितनी भी क़ौमें तुझे जानती थीं उनके रोंगटे खड़े हो गए। तेरा हौलनाक अंजाम अचानक ही आ गया है। अब से तू कभी नहीं उठेगा’।”

20रब मुझसे हमकलाम हुआ,

21“ऐ आदमज़ाद, सैदा की तरफ़ रुख़ करके उसके ख़िलाफ़ नबुव्वत कर!

22रब क़ादिरे-मुतलक़ फ़रमाता है कि ऐ सैदा, मैं तुझसे निपट लूँगा। तेरे दरमियान ही मैं अपना जलाल दिखाऊँगा। तब वह जान लेंगे कि मैं ही रब हूँ, क्योंकि मैं शहर की अदालत करके अपना मुक़द्दस किरदार उन पर ज़ाहिर करूँगा।

23मैं उसमें मोहलक वबा फैलाकर उस की गलियों में ख़ून बहा दूँगा। उसे चारों तरफ़ से तलवार घेर लेगी तो उसमें फँसे हुए लोग हलाक हो जाएंगे। तब वह जान लेंगे कि मैं ही रब हूँ।

24इस वक़्त इसराईल के पड़ोसी उसे हक़ीर जानते हैं। अब तक वह उसे चुभनेवाले ख़ार और ज़ख़मी करनेवाले काँटे हैं। लेकिन आइंदा ऐसा नहीं होगा। तब वह जान लेंगे कि मैं रब क़ादिरे-मुतलक़ हूँ।

25क्योंकि रब क़ादिरे-मुतलक़ फ़रमाता है कि दीगर अक़वाम के देखते देखते मैं ज़ाहिर करूँगा कि मैं मुक़द्दस हूँ। क्योंकि मैं इसराईलियों को उन अक़वाम में से निकालकर जमा करूँगा जहाँ मैंने उन्हें मुंतशिर कर दिया था। तब वह अपने वतन में जा बसेंगे, उस मुल्क में जो मैंने अपने ख़ादिम याक़ूब को दिया था।

26वह हिफ़ाज़त से उसमें रहकर घर तामीर करेंगे और अंगूर के बाग़ लगाएँगे। लेकिन जो पड़ोसी उन्हें हक़ीर जानते थे उनकी मैं अदालत करूँगा। तब वह जान लेंगे कि मैं रब उनका ख़ुदा हूँ।”

ذریعہ: किताबे-मुक़द्दस

WEBREATH · 11:11

«He himself gives everyone life and breath and everything else» — Acts 17:25

Breath is one for all: everyone lives by it, whoever they are and whatever they believe. Every day at 11:11 local time people stop for sixty seconds, breathe, and thank GOD for the breath — each in their own words, each within themselves. In that minute we are One Breath.

WEBREATH — the Minute at 11:11, your own local time — we are One Breath