عیسائیت
واپس

हिज़क़ियेल 10

1मैंने उस गुंबद पर नज़र डाली जो करूबी फ़रिश्तों के सरों के ऊपर फैली हुई थी। उस पर संगे-लाजवर्द का तख़्त-सा नज़र आया।

2रब ने कतान से मुलब्बस मर्द से फ़रमाया, “करूबी फ़रिश्तों के नीचे लगे पहियों के बीच में जा। वहाँ से दो मुट्ठी-भर कोयले लेकर शहर पर बिखेर दे।” आदमी मेरे देखते देखते फ़रिश्तों के बीच में चला गया।

3उस वक़्त करूबी फ़रिश्ते रब के घर के जुनूब में खड़े थे, और अंदरूनी सहन बादल से भरा हुआ था।

4फिर रब का जलाल जो करूबी फ़रिश्तों के ऊपर ठहरा हुआ था वहाँ से उठकर रब के घर की दहलीज़ पर रुक गया। पूरा मकान बादल से भर गया बल्कि सहन भी रब के जलाल की आबो-ताब से भर गया।

5करूबी फ़रिश्ते अपने परों को इतने ज़ोर से फड़फड़ा रहे थे कि उसका शोर बैरूनी सहन तक सुनाई दे रहा था। यों लग रहा था कि क़ादिरे-मुतलक़ ख़ुदा बोल रहा है।

6जब रब ने कतान से मुलब्बस आदमी को हुक्म दिया कि करूबी फ़रिश्तों के पहियों के बीच में से जलते हुए कोयले ले तो वह उनके दरमियान चलकर एक पहिये के पास खड़ा हुआ।

7फिर करूबी फ़रिश्तों में से एक ने अपना हाथ बढ़ाकर बीच में जलनेवाले कोयलों में से कुछ ले लिया और आदमी के हाथों में डाल दिया। कतान से मुलब्बस यह आदमी कोयले लेकर चला गया।

8मैंने देखा कि करूबी फ़रिश्तों के परों के नीचे कुछ है जो इनसानी हाथ जैसा लग रहा है।

9हर फ़रिश्ते के पास एक पहिया था। पुखराज जैसी किसी चीज़ से बने यह चार पहिये

10एक जैसे थे। हर पहिये के अंदर एक और पहिया ज़ावियाए-क़ायमा में घूम रहा था,

11इसलिए यह मुड़े बग़ैर हर रुख़ इख़्तियार कर सकते थे। जिस तरफ़ एक चल पड़ता उस तरफ़ बाक़ी भी मुड़े बग़ैर चलने लगते।

12फ़रिश्तों के जिस्मों की हर जगह पर आँखें ही आँखें थीं। आँखें न सिर्फ़ सामने नज़र आईं बल्कि उनकी पीठ, हाथों और परों पर भी बल्कि चारों पहियों पर भी।

13तो भी यह पहिये ही थे, क्योंकि मैंने ख़ुद सुना कि उनके लिए यही नाम इस्तेमाल हुआ।

14हर फ़रिश्ते के चार चेहरे थे। पहला चेहरा करूबी का, दूसरा आदमी का, तीसरा शेरबबर का और चौथा उक़ाब का चेहरा था।

15फिर करूबी फ़रिश्ते उड़ गए। वही जानदार थे जिन्हें मैं दरियाए-किबार के किनारे देख चुका था।

16जब फ़रिश्ते हरकत में आ जाते तो पहिये भी चलने लगते, और जब फ़रिश्ते फड़फड़ाकर उड़ने लगते तो पहिये भी उनके साथ उड़ने लगते।

17फ़रिश्तों के रुकने पर पहिये रुक जाते, और उनके उड़ने पर यह भी उड़ जाते, क्योंकि जानदारों की रूह उनमें थी।

18फिर रब का जलाल अपने घर की दहलीज़ से हट गया और दुबारा करूबी फ़रिश्तों के ऊपर आकर ठहर गया।

19मेरे देखते देखते फ़रिश्तों ने अपने परों को फैलाया और ज़मीन से उड़कर पहियों समेत निकल गए। चलते चलते वह रब के घर के मशरिक़ी दरवाज़े के पास रुक गए। ख़ुदाए-इसराईल का जलाल उनके ऊपर ठहरा रहा।

20वही जानदार थे जिन्हें मैंने दरियाए-किबार के किनारे ख़ुदाए-इसराईल के नीचे देखा था। मैंने जान लिया कि यह करूबी फ़रिश्ते हैं।

21हर एक के चार चेहरे और चार पर थे, और परों के नीचे कुछ नज़र आया जो इनसानी हाथों की मानिंद था।

22उनके चेहरों की शक्लो-सूरत उन चेहरों की मानिंद थी जो मैंने दरियाए-किबार के किनारे देखे थे। चलते वक़्त हर जानदार सीधा अपने किसी एक चेहरे का रुख़ इख़्तियार करता था।

ذریعہ: किताबे-मुक़द्दस

WEBREATH · 11:11

«He himself gives everyone life and breath and everything else» — Acts 17:25

Breath is one for all: everyone lives by it, whoever they are and whatever they believe. Every day at 11:11 local time people stop for sixty seconds, breathe, and thank GOD for the breath — each in their own words, each within themselves. In that minute we are One Breath.

WEBREATH — the Minute at 11:11, your own local time — we are One Breath