عیسائیت
واپس

ख़ुरूज 18

1मूसा का सुसर यितरो अब तक मिदियान में इमाम था। जब उसने सब कुछ सुना जो अल्लाह ने मूसा और अपनी क़ौम के लिए किया है, कि वह उन्हें मिसर से निकाल लाया है

2तो वह मूसा के पास आया। वह उस की बीवी सफ़्फ़ूरा को अपने साथ लाया, क्योंकि मूसा ने उसे अपने बेटों समेत मैके भेज दिया था।

3यितरो मूसा के दोनों बेटों को भी साथ लाया। पहले बेटे का नाम जैरसोम यानी ‘अजनबी मुल्क में परदेसी’ था, क्योंकि जब वह पैदा हुआ तो मूसा ने कहा था, “मैं अजनबी मुल्क में परदेसी हूँ।”

4दूसरे बेटे का नाम इलियज़र यानी ‘मेरा ख़ुदा मददगार है’ था, क्योंकि जब वह पैदा हुआ तो मूसा ने कहा था, “मेरे बाप के ख़ुदा ने मेरी मदद करके मुझे फ़िरौन की तलवार से बचाया है।”

5यितरो मूसा की बीवी और बेटे साथ लेकर उस वक़्त मूसा के पास पहुँचा जब उसने रेगिस्तान में अल्लाह के पहाड़ यानी सीना के क़रीब ख़ैमा लगाया हुआ था।

6उसने मूसा को पैग़ाम भेजा था, “मैं, आपका सुसर यितरो आपकी बीवी और दो बेटों को साथ लेकर आपके पास आ रहा हूँ।”

7मूसा अपने सुसर के इस्तक़बाल के लिए बाहर निकला, उसके सामने झुका और उसे बोसा दिया। दोनों ने एक दूसरे का हाल पूछा, फिर ख़ैमे में चले गए।

8मूसा ने यितरो को तफ़सील से बताया कि रब ने इसराईलियों की ख़ातिर फ़िरौन और मिसरियों के साथ क्या कुछ किया है। उसने रास्ते में पेश आई तमाम मुश्किलात का ज़िक्र भी किया कि रब ने हमें किस तरह उनसे बचाया है।

9यितरो उन सारे अच्छे कामों के बारे में सुनकर ख़ुश हुआ जो रब ने इसराईलियों के लिए किए थे जब उसने उन्हें मिसरियों के हाथ से बचाया था।

10उसने कहा, “रब की तमजीद हो जिसने आपको मिसरियों और फ़िरौन के क़ब्ज़े से नजात दिलाई है। उसी ने क़ौम को ग़ुलामी से छुड़ाया है!

11अब मैंने जान लिया है कि रब तमाम माबूदों से अज़ीम है, क्योंकि उसने यह सब कुछ उन लोगों के साथ किया जिन्होंने अपने ग़ुरूर में इसराईलियों के साथ बुरा सुलूक किया था।”

12फिर यितरो ने अल्लाह को भस्म होनेवाली क़ुरबानी और दीगर कई क़ुरबानियाँ पेश कीं। तब हारून और तमाम बुज़ुर्ग मूसा के सुसर यितरो के साथ अल्लाह के हुज़ूर खाना खाने बैठे।

13अगले दिन मूसा लोगों का इनसाफ़ करने के लिए बैठ गया। उनकी तादाद इतनी ज़्यादा थी कि वह सुबह से लेकर शाम तक मूसा के सामने खड़े रहे।

14जब यितरो ने यह सब कुछ देखा तो उसने पूछा, “यह क्या है जो आप लोगों के साथ कर रहे हैं? सारा दिन वह आपको घेरे रहते और आप उनकी अदालत करते रहते हैं। आप यह सब कुछ अकेले ही क्यों कर रहे हैं?”

15मूसा ने जवाब दिया, “लोग मेरे पास आकर अल्लाह की मरज़ी मालूम करते हैं।

16जब कभी कोई तनाज़ा या झगड़ा होता है तो दोनों पार्टियाँ मेरे पास आती हैं। मैं फ़ैसला करके उन्हें अल्लाह के अहकाम और हिदायात बताता हूँ।”

17मूसा के सुसर ने उससे कहा, “आपका तरीक़ा अच्छा नहीं है।

18काम इतना वसी है कि आप उसे अकेले नहीं सँभाल सकते। इससे आप और वह लोग जो आपके पास आते हैं बुरी तरह थक जाते हैं।

19मेरी बात सुनें! मैं आपको एक मशवरा देता हूँ। अल्लाह उसमें आपकी मदद करे। लाज़िम है कि आप अल्लाह के सामने क़ौम के नुमाइंदे रहें और उनके मामलात उसके सामने पेश करें।

20यह भी ज़रूरी है कि आप उन्हें अल्लाह के अहकाम और हिदायात सिखाएँ, कि वह किस तरह ज़िंदगी गुज़ारें और क्या क्या करें।

21लेकिन साथ साथ क़ौम में से क़ाबिले-एतमाद आदमी चुनें। वह ऐसे लोग हों जो अल्लाह का ख़ौफ़ मानते हों, रास्तदिल हों और रिश्वत से नफ़रत करते हों। उन्हें हज़ार हज़ार, सौ सौ, पचास पचास और दस दस आदमियों पर मुक़र्रर करें।

22उन आदमियों की ज़िम्मादारी यह होगी कि वह हर वक़्त लोगों का इनसाफ़ करें। अगर कोई बहुत ही पेचीदा मामला हो तो वह फ़ैसले के लिए आपके पास आएँ, लेकिन दीगर मामलों का फ़ैसला वह ख़ुद करें। यों वह काम में आपका हाथ बटाएँगे और आपका बोझ हलका हो जाएगा।

23अगर मेरा यह मशवरा अल्लाह की मरज़ी के मुताबिक़ हो और आप ऐसा करें तो आप अपनी ज़िम्मादारी निभा सकेंगे और यह तमाम लोग इनसाफ़ के मिलने पर सलामती के साथ अपने अपने घर जा सकेंगे।”

24मूसा ने अपने सुसर का मशवरा मान लिया और ऐसा ही किया।

25उसने इसराईलियों में से क़ाबिले-एतमाद आदमी चुने और उन्हें हज़ार हज़ार, सौ सौ, पचास पचास और दस दस आदमियों पर मुक़र्रर किया।

26यह मर्द क़ाज़ी बनकर मुस्तक़िल तौर पर लोगों का इनसाफ़ करने लगे। आसान मसलों का फ़ैसला वह ख़ुद करते और मुश्किल मामलों को मूसा के पास ले आते थे।

27कुछ अरसे बाद मूसा ने अपने सुसर को रुख़सत किया तो यितरो अपने वतन वापस चला गया।

ذریعہ: किताबे-मुक़द्दस

WEBREATH · 11:11

«He himself gives everyone life and breath and everything else» — Acts 17:25

Breath is one for all: everyone lives by it, whoever they are and whatever they believe. Every day at 11:11 local time people stop for sixty seconds, breathe, and thank GOD for the breath — each in their own words, each within themselves. In that minute we are One Breath.

WEBREATH — the Minute at 11:11, your own local time — we are One Breath