عیسائیت
واپس

आस्तर 5

1तीसरे दिन आस्तर मलिका अपना शाही लिबास पहने हुए महल के अंदरूनी सहन में दाख़िल हुई। यह सहन उस हाल के सामने था जिसमें तख़्त लगा था। उस वक़्त बादशाह दरवाज़े के मुक़ाबिल अपने तख़्त पर बैठा था।

2आस्तर को सहन में खड़ी देखकर वह ख़ुश हुआ और सोने के शाही असा को उस की तरफ़ बढ़ा दिया। तब आस्तर क़रीब आई और असा के सिरे को छू दिया।

3बादशाह ने उससे पूछा, “आस्तर मलिका, क्या बात है? आप क्या चाहती हैं? मैं उसे देने के लिए तैयार हूँ, ख़ाह सलतनत का आधा हिस्सा क्यों न हो!”

4आस्तर ने जवाब दिया, “मैंने आज के लिए ज़ियाफ़त की तैयारियाँ की हैं। अगर बादशाह को मंज़ूर हो तो वह हामान को अपने साथ लेकर उसमें शिरकत करें।”

5बादशाह ने अपने मुलाज़िमों को हुक्म दिया, “जल्दी करो! हामान को बुलाओ ताकि हम आस्तर की ख़ाहिश पूरी कर सकें।” चुनाँचे बादशाह और हामान आस्तर की तैयारशुदा ज़ियाफ़त में शरीक हुए।

6मै पी पीकर बादशाह ने आस्तर से पूछा, “अब मुझे बताएँ, आप क्या चाहती हैं? वह आपको दिया जाएगा। अपनी दरख़ास्त पेश करें, क्योंकि मैं सलतनत के आधे हिस्से तक आपको देने के लिए तैयार हूँ।”

7आस्तर ने जवाब दिया, “मेरी दरख़ास्त और आरज़ू यह है,

8अगर बादशाह मुझसे ख़ुश हों और उन्हें मेरी गुज़ारिश और दरख़ास्त पूरी करना मंज़ूर हो तो वह कल एक बार फिर हामान के साथ एक ज़ियाफ़त में शिरकत करें जो मैं आपके लिए तैयार करूँ। फिर मैं बादशाह को जवाब दूँगी।”

9उस दिन जब हामान महल से निकला तो वह बड़ा ख़ुश और ज़िंदादिल था। लेकिन फिर उस की नज़र मर्दकी पर पड़ गई जो शाही सहन के दरवाज़े के पास बैठा था। न वह खड़ा हुआ, न हामान को देखकर काँप गया। हामान लाल-पीला हो गया,

10लेकिन अपने आप पर क़ाबू रखकर वह चला गया। घर पहुँचकर वह अपने दोस्तों और अपनी बीवी ज़रिश को अपने पास बुलाकर

11उनके सामने अपनी ज़बरदस्त दौलत और मुतअद्दिद बेटों पर शेख़ी मारने लगा। उसने उन्हें उन सारे मौक़ों की फ़हरिस्त सुनाई जिन पर बादशाह ने उस की इज़्ज़त की थी और फ़ख़र किया कि बादशाह ने मुझे तमाम बाक़ी शुरफ़ा और अफ़सरों से ज़्यादा ऊँचा ओहदा दिया है।

12हामान ने कहा, “न सिर्फ़ यह, बल्कि आज आस्तर मलिका ने ऐसी ज़ियाफ़त की जिसमें बादशाह के अलावा सिर्फ़ मैं ही शरीक था। और मुझे मलिका से कल के लिए भी दावत मिली है कि बादशाह के साथ ज़ियाफ़त में शिरकत करूँ।

13लेकिन जब तक मर्दकी यहूदी शाही महल के सहन के दरवाज़े पर बैठा नज़र आता है मैं चैन का साँस नहीं लूँगा।”

14उस की बीवी ज़रिश और बाक़ी अज़ीज़ों ने मशवरा दिया, “सूली बनवाएँ जिसकी ऊँचाई 75 फ़ुट हो। फिर कल सुबह-सवेरे बादशाह के पास जाकर गुज़ारिश करें कि मर्दकी को उससे लटकाया जाए। इसके बाद आप तसल्ली से बादशाह के साथ जाकर ज़ियाफ़त के मज़े ले सकते हैं।” यह मनसूबा हामान को अच्छा लगा, और उसने सूली तैयार करवाई।

ذریعہ: किताबे-मुक़द्दस

WEBREATH · 11:11

«He himself gives everyone life and breath and everything else» — Acts 17:25

Breath is one for all: everyone lives by it, whoever they are and whatever they believe. Every day at 11:11 local time people stop for sixty seconds, breathe, and thank GOD for the breath — each in their own words, each within themselves. In that minute we are One Breath.

WEBREATH — the Minute at 11:11, your own local time — we are One Breath