عیسائیت
واپس

वाइज़ 12

1जवानी में ही अपने ख़ालिक़ को याद रख, इससे पहले कि मुसीबत के दिन आएँ, वह साल क़रीब आएँ जिनके बारे में तू कहेगा, “यह मुझे पसंद नहीं।”

2उसे याद रख इससे पहले कि रौशनी तेरे लिए ख़त्म हो जाए, सूरज, चाँद और सितारे अंधेरे हो जाएँ और बारिश के बाद बादल लौट आएँ।

3उसे याद रख, इससे पहले कि घर के पहरेदार थरथराने लगें, ताक़तवर आदमी कुबड़े हो जाएँ, गंदुम पीसनेवाली नौकरानियाँ कम होने के बाइस काम करना छोड़ दें और खिड़कियों में से देखनेवाली ख़वातीन धुँधला जाएँ।

4उसे याद रख, इससे पहले कि गली में पहुँचानेवाला दरवाज़ा बंद हो जाए और चक्की की आवाज़ आहिस्ता हो जाए। जब चिड़ियाँ चहचहाने लगेंगी तो तू जाग उठेगा, लेकिन तमाम गीतों की आवाज़ दबी-सी सुनाई देगी।

5उसे याद रख, इससे पहले कि तू ऊँची जगहों और गलियों के ख़तरों से डरने लगे। गो बादाम का फूल खिल जाए, टिड्डी बोझ तले दब जाए और करीर का फूल फूट निकले, लेकिन तू कूच करके अपने अबदी घर में चला जाएगा, और मातम करनेवाले गलियों में घूमते फिरेंगे।

6अल्लाह को याद रख, इससे पहले कि चाँदी का रस्सा टूट जाए, सोने का बरतन टुकड़े टुकड़े हो जाए, चश्मे के पास घड़ा पाश पाश हो जाए और कुएँ का पानी निकालनेवाला पहिया टूटकर उसमें गिर जाए।

7तब तेरी ख़ाक दुबारा उस ख़ाक में मिल जाएगी जिससे निकल आई और तेरी रूह उस ख़ुदा के पास लौट जाएगी जिसने उसे बख़्शा था।

8वाइज़ फ़रमाता है, “बातिल ही बातिल! सब कुछ बातिल ही बातिल है!”

9दानिशमंद होने के अलावा वाइज़ क़ौम को इल्मो-इरफ़ान की तालीम देता रहा। उसने मुतअद्दिद अमसाल को सहीह वज़न देकर उनकी जाँच-पड़ताल की और उन्हें तरतीबवार जमा किया।

10वाइज़ की कोशिश थी कि मुनासिब अलफ़ाज़ इस्तेमाल करे और दियानतदारी से सच्ची बातें लिखे।

11दानिशमंदों के अलफ़ाज़ आँकुस की मानिंद हैं, तरतीब से जमाशुदा अमसाल लकड़ी में मज़बूती से ठोंकी गई कीलों जैसी हैं। यह एक ही गल्लाबान की दी हुई हैं।

12मेरे बेटे, इसके अलावा ख़बरदार रह। किताबें लिखने का सिलसिला कभी ख़त्म नहीं हो जाएगा, और हद से ज़्यादा कुतुबबीनी से जिस्म थक जाता है।

13आओ, इख़्तिताम पर हम तमाम तालीम के ख़ुलासे पर ध्यान दें। रब का ख़ौफ़ मान और उसके अहकाम की पैरवी कर। यह हर इनसान का फ़र्ज़ है।

14क्योंकि अल्लाह हर काम को ख़ाह वह छुपा ही हो, ख़ाह बुरा या भला हो अदालत में लाएगा।

ذریعہ: किताबे-मुक़द्दस

WEBREATH · 11:11

«He himself gives everyone life and breath and everything else» — Acts 17:25

Breath is one for all: everyone lives by it, whoever they are and whatever they believe. Every day at 11:11 local time people stop for sixty seconds, breathe, and thank GOD for the breath — each in their own words, each within themselves. In that minute we are One Breath.

WEBREATH — the Minute at 11:11, your own local time — we are One Breath