عیسائیت
واپس

वाइज़ 10

1मरी हुई मक्खियाँ ख़ुशबूदार तेल ख़राब करती हैं, और हिकमत और इज़्ज़त की निसबत थोड़ी-सी हमाक़त का ज़्यादा असर होता है।

2दानिशमंद का दिल सहीह राह चुन लेता है जबकि अहमक़ का दिल ग़लत राह पर आ जाता है।

3रास्ते पर चलते वक़्त भी अहमक़ समझ से ख़ाली है, जिससे भी मिले उसे बताता है कि वह बेवुक़ूफ़ है।

4अगर हुक्मरान तुझसे नाराज़ हो जाए तो अपनी जगह मत छोड़, क्योंकि पुरसुकून रवैया बड़ी बड़ी ग़लतियाँ दूर कर देता है।

5मुझे सूरज तले एक ऐसी बुरी बात नज़र आई जो अकसर हुक्मरानों से सरज़द होती है।

6अहमक़ को बड़े ओहदों पर फ़ायज़ किया जाता है जबकि अमीर छोटे ओहदों पर ही रहते हैं।

7मैंने ग़ुलामों को घोड़े पर सवार और हुक्मरानों को ग़ुलामों की तरह पैदल चलते देखा है।

8जो गढ़ा खोदे वह ख़ुद उसमें गिर सकता है, जो दीवार गिरा दे हो सकता है कि साँप उसे डसे।

9जो कान से पत्थर निकाले उसे चोट लग सकती है, जो लकड़ी चीर डाले वह ज़ख़मी हो जाने के ख़तरे में है।

10अगर कुल्हाड़ी कुंद हो और कोई उसे तेज़ न करे तो ज़्यादा ताक़त दरकार है। लिहाज़ा हिकमत को सहीह तौर से अमल में ला, तब ही कामयाबी हासिल होगी।

11अगर इससे पहले कि सपेरा साँप पर क़ाबू पाए वह उसे डसे तो फिर सपेरा होने का क्या फ़ायदा?

12दानिशमंद अपने मुँह की बातों से दूसरों की मेहरबानी हासिल करता है, लेकिन अहमक़ के अपने ही होंट उसे हड़प कर लेते हैं।

13उसका बयान अहमक़ाना बातों से शुरू और ख़तरनाक बेवुक़ूफ़ियों से ख़त्म होता है।

14ऐसा शख़्स बातें करने से बाज़ नहीं आता, गो इनसान मुस्तक़बिल के बारे में कुछ नहीं जानता। कौन उसे बता सकता है कि उसके बाद क्या कुछ होगा?

15अहमक़ का काम उसे थका देता है, और वह शहर का रास्ता भी नहीं जानता।

16उस मुल्क पर अफ़सोस जिसका बादशाह बच्चा है और जिसके बुज़ुर्ग सुबह ही ज़ियाफ़त करने लगते हैं।

17मुबारक है वह मुल्क जिसका बादशाह शरीफ़ है और जिसके बुज़ुर्ग नशे में धुत नहीं रहते बल्कि मुनासिब वक़्त पर और नज़मो-ज़ब्त के साथ खाना खाते हैं।

18जो सुस्त है उसके घर के शहतीर झुकने लगते हैं, जिसके हाथ ढीले हैं उस की छत से पानी टपकने लगता है।

19ज़ियाफ़त करने से हँसी-ख़ुशी और मै पीने से ज़िंदादिली पैदा होती है, लेकिन पैसा ही सब कुछ मुहैया करता है।

20ख़यालों में भी बादशाह पर लानत न कर, अपने सोने के कमरे में भी अमीर पर लानत न भेज, ऐसा न हो कि कोई परिंदा तेरे अलफ़ाज़ लेकर उस तक पहुँचाए।

ذریعہ: किताबे-मुक़द्दस

WEBREATH · 11:11

«He himself gives everyone life and breath and everything else» — Acts 17:25

Breath is one for all: everyone lives by it, whoever they are and whatever they believe. Every day at 11:11 local time people stop for sixty seconds, breathe, and thank GOD for the breath — each in their own words, each within themselves. In that minute we are One Breath.

WEBREATH — the Minute at 11:11, your own local time — we are One Breath