عیسائیت
واپس

इस्तिसना 26

1जब तू उस मुल्क में दाख़िल होगा जो रब तेरा ख़ुदा तुझे मीरास में दे रहा है और तू उस पर क़ब्ज़ा करके उसमें आबाद हो जाएगा

2तो जो भी फ़सल तू काटेगा उसके पहले फल में से कुछ टोकरे में रखकर उस जगह ले जा जो रब तेरा ख़ुदा अपने नाम की सुकूनत के लिए चुनेगा।

3वहाँ ख़िदमत करनेवाले इमाम से कह, “आज मैं रब अपने ख़ुदा के हुज़ूर एलान करता हूँ कि उस मुल्क में पहुँच गया हूँ जिसका हमें देने का वादा रब ने क़सम खाकर हमारे बापदादा से किया था।”

4तब इमाम तेरा टोकरा लेकर उसे रब तेरे ख़ुदा की क़ुरबानगाह के सामने रख दे।

5फिर रब अपने ख़ुदा के हुज़ूर कह, “मेरा बाप आवारा फिरनेवाला अरामी था जो अपने लोगों को लेकर मिसर में आबाद हुआ। वहाँ पहुँचते वक़्त उनकी तादाद कम थी, लेकिन होते होते वह बड़ी और ताक़तवर क़ौम बन गए।

6लेकिन मिसरियों ने हमारे साथ बुरा सुलूक किया और हमें दबाकर सख़्त ग़ुलामी में फँसा दिया।

7फिर हमने चिल्लाकर रब अपने बापदादा के ख़ुदा से फ़रियाद की, और रब ने हमारी सुनी। उसने हमारा दुख, हमारी मुसीबत और दबी हुई हालत देखी

8और बड़े इख़्तियार और क़ुदरत का इज़हार करके हमें मिसर से निकाल लाया। उस वक़्त उसने मिसरियों में दहशत फैलाकर बड़े मोजिज़े दिखाए।

9वह हमें यहाँ ले आया और यह मुल्क दिया जिसमें दूध और शहद की कसरत है।

10ऐ रब, अब मैं तुझे उस ज़मीन का पहला फल पेश करता हूँ जो तूने हमें बख़्शी है।” अपनी पैदावार का टोकरा रब अपने ख़ुदा के सामने रखकर उसे सिजदा करना।

11ख़ुशी मनाना कि रब मेरे ख़ुदा ने मुझे और मेरे घराने को इतनी अच्छी चीज़ों से नवाज़ा है। इस ख़ुशी में अपने दरमियान रहनेवाले लावियों और परदेसियों को भी शामिल करना।

12हर तीसरे साल अपनी तमाम फ़सलों का दसवाँ हिस्सा लावियों, परदेसियों, यतीमों और बेवाओं को देना ताकि वह तेरे शहरों में खाना खाकर सेर हो जाएँ।

13फिर रब अपने ख़ुदा से कह, “मैंने वैसा ही किया है जैसा तूने मुझे हुक्म दिया। मैंने अपने घर से तेरे लिए मख़सूसो-मुक़द्दस हिस्सा निकालकर उसे लावियों, परदेसियों, यतीमों और बेवाओं को दिया है। मैंने सब कुछ तेरी हिदायात के ऐन मुताबिक़ किया है और कुछ नहीं भूला।

14मातम करते वक़्त मैंने इस मख़सूसो-मुक़द्दस हिस्से से कुछ नहीं खाया। मैं इसे उठाकर घर से बाहर लाते वक़्त नापाक नहीं था। मैंने इसमें से मुरदों को भी कुछ पेश नहीं किया। मैंने रब अपने ख़ुदा की इताअत करके वह सब कुछ किया है जो तूने मुझे करने को फ़रमाया था।

15चुनाँचे आसमान पर अपने मक़दिस से निगाह करके अपनी क़ौम इसराईल को बरकत दे। उस मुल्क को भी बरकत दे जिसका वादा तूने क़सम खाकर हमारे बापदादा से किया और जो तूने हमें बख़्श भी दिया है, उस मुल्क को जिसमें दूध और शहद की कसरत है।”

16आज रब तेरा ख़ुदा फ़रमाता है कि इन अहकाम और हिदायात की पैरवी कर। पूरे दिलो-जान से और बड़ी एहतियात से इन पर अमल कर।

17आज तूने एलान किया है, “रब मेरा ख़ुदा है। मैं उस की राहों पर चलता रहूँगा, उसके अहकाम के ताबे रहूँगा और उस की सुनूँगा।”

18और आज रब ने एलान किया है, “तू मेरी क़ौम और मेरी अपनी मिलकियत है जिस तरह मैंने तुझसे वादा किया है। अब मेरे तमाम अहकाम के मुताबिक़ ज़िंदगी गुज़ार।

19जितनी भी क़ौमें मैंने ख़लक़ की हैं उन सब पर मैं तुझे सरफ़राज़ करूँगा और तुझे तारीफ़, शोहरत और इज़्ज़त अता करूँगा। तू रब अपने ख़ुदा के लिए मख़सूसो-मुक़द्दस क़ौम होगा जिस तरह मैंने वादा किया है।”

ذریعہ: किताबे-मुक़द्दस

WEBREATH · 11:11

«He himself gives everyone life and breath and everything else» — Acts 17:25

Breath is one for all: everyone lives by it, whoever they are and whatever they believe. Every day at 11:11 local time people stop for sixty seconds, breathe, and thank GOD for the breath — each in their own words, each within themselves. In that minute we are One Breath.

WEBREATH — the Minute at 11:11, your own local time — we are One Breath