عیسائیت
واپس

आमूस 8

1एक बार फिर रब क़ादिरे-मुतलक़ ने मुझे रोया दिखाई। मैंने पके हुए फल से भरी हुई टोकरी देखी।

2रब ने पूछा, “ऐ आमूस, तुझे क्या नज़र आता है?” मैंने जवाब दिया, “पके हुए फल से भरी हुई टोकरी।” तब रब ने मुझसे फ़रमाया, “मेरी क़ौम का अंजाम पक गया है। अब से मैं उन्हें सज़ा दिए बग़ैर नहीं छोड़ूँगा।

3रब क़ादिरे-मुतलक़ फ़रमाता है कि उस दिन महल में गीत सुनाई नहीं देंगे बल्कि आहो-ज़ारी। चारों तरफ़ नाशें नज़र आएँगी, क्योंकि दुश्मन उन्हें हर जगह फेंकेगा। ख़ामोश!”

4ऐ ग़रीबों को कुचलनेवालो, ऐ ज़रूरतमंदों को तबाह करनेवालो, सुनो!

5तुम कहते हो, “नए चाँद की ईद कब गुज़र जाएगी, सबत का दिन कब ख़त्म है ताकि हम अनाज के गोदाम खोलकर ग़ल्ला बेच सकें? तब हम पैमाइश के बरतन छोटे और तराज़ू के बाट हलके बनाएँगे, साथ साथ सौदे का भाव बढ़ाएँगे। हम फ़रोख़्त करते वक़्त अनाज के साथ उसका भूसा भी मिलाएँगे।” अपने नाजायज़ तरीक़ों से तुम थोड़े पैसों में बल्कि एक जोड़ी जूतों के एवज़ ग़रीबों को ख़रीदते हो।

7रब ने याक़ूब के फ़ख़र की क़सम खाकर वादा किया है, “जो कुछ उनसे सरज़द हुआ है उसे मैं कभी नहीं भूलूँगा।

8उन्हीं की वजह से ज़मीन लरज़ उठेगी और उसके तमाम बाशिंदे मातम करेंगे। जिस तरह मिसर में दरियाए-नील बरसात के मौसम में सैलाबी सूरत इख़्तियार कर लेता है उसी तरह पूरी ज़मीन उठेगी। वह नील की तरह जोश में आएगी, फिर दुबारा उतर जाएगी।”

9रब क़ादिरे-मुतलक़ फ़रमाता है, “उस दिन मैं होने दूँगा कि सूरज दोपहर के वक़्त ग़ुरूब हो जाए। दिन उरूज पर ही होगा तो ज़मीन पर अंधेरा छा जाएगा।

10मैं तुम्हारे तहवारों को मातम में और तुम्हारे गीतों को आहो-बुका में बदल दूँगा। मैं सबको टाट के मातमी लिबास पहनाकर हर एक का सर मुँडवाऊँगा। लोग यों मातम करेंगे जैसा उनका वाहिद बेटा कूच कर गया हो। अंजाम का वह दिन कितना तलख़ होगा।”

11क़ादिरे-मुतलक़ फ़रमाता है, “ऐसे दिन आनेवाले हैं जब मैं मुल्क में काल भेजूँगा। लेकिन लोग न रोटी और न पानी से बल्कि अल्लाह का कलाम सुनने से महरूम रहेंगे।

12लोग लड़खड़ाते हुए एक समुंदर से दूसरे तक और शिमाल से मशरिक़ तक फिरेंगे ताकि रब का कलाम मिल जाए, लेकिन बेसूद।

13उस दिन ख़ूबसूरत कुँवारियाँ और जवान मर्द प्यास के मारे बेहोश हो जाएंगे।

14जो इस वक़्त सामरिया के मकरूह बुत की क़सम खाते और कहते हैं, ‘ऐ दान, तेरे देवता की हयात की क़सम’ या ‘ऐ बैर-सबा, तेरे देवता की क़सम!’ वह उस वक़्त गिर जाएंगे और दुबारा कभी नहीं उठेंगे।”

ذریعہ: किताबे-मुक़द्दस

WEBREATH · 11:11

«He himself gives everyone life and breath and everything else» — Acts 17:25

Breath is one for all: everyone lives by it, whoever they are and whatever they believe. Every day at 11:11 local time people stop for sixty seconds, breathe, and thank GOD for the breath — each in their own words, each within themselves. In that minute we are One Breath.

WEBREATH — the Minute at 11:11, your own local time — we are One Breath